शनिवार, 25 मई 2013

लंदन में ब्रिटिश सिपाही का सरेआम, बर्बर व पाशविक कत्ल : असली दुश्मन कौन है ?

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हम वह पाशविकता झेल रहे हैं दशकों से कश्मीर में... जहाँ आये दिन आम शहरी सरकारी या भारतीय फौज के जासूस-खबरी कह गोलियों से भून दिये जाते हैं या कभी कभी सरेआम जिबह किये जाते हैं... भीड़ भरे बाजारों-जगहों पर धमाके किये जाते हैं... पर यह नजारा ब्रिटेन ने हाल ही में देखा... इस से पहले बोस्टन, अमेरिका में भी कुछ ऐसा ही हुआ...

दिमाग सवाल करता है कि कोई क्यों करता है यह सब... कौन है असली दुश्मन...

लेखिका जवाब दे रही हैं यहाँ पर (लिंक)... वह कहती हैं...


Some will rush to blame Muslims or Islam for what happened, but it's important to be clear and not to mince words.
Islam is not the enemy. Muslims are not the enemy. Terrorism is not the enemy.

फिर आगे वह कहती हैं...

The enemy is the radical Islamist ideology that justifies any atrocity committed for political motives. The enemies are the people who promote this dogma and encourage others to engage in actions that offend and assault our humanity -- and theirs.

वह चेताती हैं...

Their political/religious ideology has motivated killers in Madrid, London, Jerusalem, Tel Aviv, as well as Syria, Nigeria, Indonesia and Iraq. The creed that demands murder, sometimes murder-suicide, for perceived offenses against Islam and against Muslims constitutes a threat to societies at large, not just to Westerners and non-Muslims. In fact, a study finds that Muslims are its most numerous victims. 

वह यह भी बताती हैं...

Most Muslims strongly oppose this kind of brutality. But a recent Pew poll showed significant minorities favor actions such as suicide bombings "in defense of Islam." A troubling 29% of Egyptian Muslims say suicide bombings can be justified, so do 40% of Muslims in the Palestinian Territories, 15% in Jordan and 18% in Malaysia.

वह कहती हैं कि इस विचारधारा को हल्के में नहीं लिया जा सकता...

An important element in the fight against this pernicious, callous enemy is a campaign to undermine the ideology's appeal within Muslim communities everywhere.

इस दुश्मन से निबटने के लिये शाँति चाहने वाले अधिसंख्य मुस्लिमों को आगे आना होगा...

There is much work to do, particularly by the vast majority of Muslims who reject extremism, by their leaders who must be pressured by all of us to make the ironclad case that nothing, nothing in the world, justifies the kind of viciousness that assaulted our senses in London and has done so in too many places for too many years.

अपना सवाल सीधा सादा है आज भी...


क्या आप लेखिका से सहमत हैं ?




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4 टिप्‍पणियां:

  1. any ideology which justifies killing innocent unknowns for zero reason is basically flawed.

    moreover, the people who passively support it in the name of ANY RELIGION are also flawed deep within....

    it does NOT mean that i am against capital punishment of people guilty of heinous enough crimes to deserve it - but blind killing of innocents can simply not be condone able....

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  2. और अब भारतीय नक्सल हमला -दोनों कृत्यों में है बहुत कुछ!

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  3. वैसे तो मैं भी कश्मीर में केवल सेना की भूमिका को दोष देने और वैश्विक आतंकवाद के लिए एकतरफा इजरायल के जन्म और इसके कारनामों को कोसने वालों के खिलाफ ही हूँ।कई बार तो ऐसे लोग बिना जमीनी सच्चाई को समझे कुछ भी बोल देते हैं।किसी एक को ही दोषी नही ठहराया जा सकता।आमतौर पर एक कट्टरपंथ को जस्टिफाई करने के लिए दूसरे कट्टरपंथ का ही बहाना बनाया जाता है।भारत में भी यही होता है और बाकी दुनिया में भी।

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  4. मुझे इसके पीछे राजनैतिक साज़िश ज्यादा नज़र आती है जो अपने फायदे के लिए धर्म की गलत जानकारियां / विश्लेषण के द्वारा लोगो को बेवक़ूफ़ बनाकर अपना मोटिव पूरा करते हैं।

    आप सही कह रहे हैं, इसके खिलाफ ज्यादा से ज्यादा तादाद में लोगो को आगे आना चाहिए।

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