सोमवार, 6 मई 2013

क्या इससे साबित नहीं होता कि यह दोनों मुल्क दो जिस्म और एक जान हैं ?

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कहने वालों के मुताबिक उनके पूरे मुल्क ने बाकायदा प्लानिंग बनाकर सरबजीत को जेल के अंदर मारा... कई कई दिन हम सबने गलियों, चौराहों, अखबारों, टीवी और नेट पर उस बेईमान पड़ोसी को कोसा और अपनी अच्छाई के लिये गाल बजाये...

और दो दिन भी नहीं बीते कि जम्मू जेल में सनाउल्लाह को मार दिया गया... वह वेंटीलेटर पर भले ही है पर बचने की कोई उम्मीद नहीं... और वह सियापा करने वाले-गाल बजाने वाले अब चुप हैं, सबको सांप सूंघ गया है...

खैर, जाने दीजिये...

पॉजीटिव देखिये...

क्या इन दो वाकयों से यह साबित नहीं होता कि यह दोनों मुल्क दो जिस्म और एक जान हैं ?
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11 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सहमत हूँ , दोनों पट्टीदार जो है , दो भाई जो एक जैसे माहौल एक ही परिवार में पले बढे है उनकी आदते सोच सब एक जैसे ही होते है , भले ही वो अलग हो जाये | दुश्मनों से तो एक बार दोस्ती हो जाये किन्तु पट्टीदारो से तो आदमी खुद के बर्बाद हो जाने तक भी दुश्मनी निभाता है | अभी तो ये कम हो गया है कुछ समय पहले आप ने सुना होगा की यहाँ या वहा दूतावास के कर्मचारियों को अज्ञात लोगो ने पिटा और छोड़ दिया प्रतिक्रिया में दुसरे दिन ही दूसरी जगह के उसके एक ज्यादा कर्मचारी को पिट कर छोड़ दिया जाता है या जासूसी के आरोप में देश से निकाल दिया जाता है , हद तो ये है की बलात्कार से पीड़ित लड़की को विदेश भी उसी तर्ज पर भेज दिया जाता है जैसे वहा मलाल को विदश भेजा जाता है इलाज के लिए , दोनों बिकुल एक जैसा सोचते है इसलिए तो उन्हें पता है की दोनों कितने बड़े ........और क्या है और उनके खिलाफ क्या करने वाले है |

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  2. वाकई यार ...
    क्या लिखते हो अनूप शुक्ल जैसा :(
    बधाई :)

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  3. वाकई!!! कम से कम दुश्मनी का रिश्ता तो पूरी इमानदारी से निभाते हैं...

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  4. बिलकुल साबित हो गया है.

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  5. सच ! जब एक को दर्द होता है तो दूसरे को भी दर्द होने में देर नहीं लगती।

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  6. विशेष लोगों की महत्वाकांक्षा में आम लोगों की बलि होती ही आई है, हो रही है. बड़े लोग आपस में अच्छे से मिलते हैं. उमर कम है. मुहब्बत में बीते तो सार्थक है.

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  7. अब तो लज्जा भी नहीं आती. वह भी आते आते थक गई. समझ नहीं आता कि हम कहाँ जा रहे हैं. हम, वे, हम सब. किसी का पैर भी हमसे जरा सा दब जाए तो सौरी कहते नहीं थकते हम तो किसी को यूँ कैसे पीट देते हैं?
    घुघूतीबासूती

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  8. ऊपर से एक जैसा दिखने वाली बातों में भी बहुत फर्क है।

    सच है कि दोनों देशों के दुर्दांत कैदी एक जैसे सोचते हैं और दोनों देशों का जेल-प्रशासन एक जैसा कमजोर है लेकिन एक बड़ा फर्क फिर भी रहता है। पाकिस्तान एक निर्दोष सिविलियन को 23 साल जेल में प्रताड़ित करने के बाद एक हिंसक मौत देता है, विदेशी सैनिकों का अंग-भंग सामान्य समझता है और अपने सैनिकों की लाशे स्वीकारने तक से मुकर जाता है। हिंसा उनके जीवन का जितना सामान्य अंग है वैसा भारत में सहज-स्वीकारी नहीं है। यहाँ हिंसा को सिरे से अस्वीकार करने वालों की भी एक ख़ासी बड़ी तादाद है।

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  9. अहिंसा की भावना को बार बार हतोत्साहित करने के पहले और किसी भी अत्याचार पर प्रतिशोध और आक्रोश फैलाने के पहले हमें यह सब सोच लेना चाहिए था.

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