रविवार, 28 अक्तूबर 2012

गाय का गोबर और दही का सम मात्रा में मिलना घातक है... बिच्छू डंक मार सकता है आपको...

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वे एक वैज्ञानिक चेतना संपन्न ज्योतिषी-ब्लॉगर व राजनीतिज्ञ हैं... वे ज्योतिष की वैज्ञानिकता व वैज्ञानिक नियमों का लाभ दुनिया को देते एक क्रांतिकारी स्वर हैं... एक जगह वे लिखते हैं...

प्रकृति में सत रज और तम के परमाणुओं का सम्मिश्रण पाया जाता है और ये विषम अवस्था में होते हैं तभी सृष्टी का संचालन होता है.इन तीनों की सम अवस्था ही प्रलय की अवस्था है.प्रकृति में हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और कोई भी दो तत्व मिल कर तीसरे का सृजन करते हैं.उदाहरण के लिए गाय के गोबर और दही को एक सम अवस्था में किसी मिटटी के बर्तन में वर्षा ऋतु में बंद कर के रख दें तो बिच्छू का उद्भव हो जायेगा जो घातक जीव है (लिंक),

डिग्री स्तर तक जीव विज्ञान का विद्मार्थी मैं भी रहा हूँ... यह मेरे लिये अनूठी जानकारी है...

मैं सोच में पड़ गया हूँ...


बिच्छू अगर ऐसे पैदा होता है तो गाय कैसे हुई होगी... और आदमी ?

आपको कुछ आईडिया है ?






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गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

हमें लोकपाल से पहले 'मीडिया के लिये लोकपाल' की जरूरत है...

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चाहे आप कुछ भी कहें आज भी अखबार व टेलीविजन की आम जन की नजरों में साख है... अखबार में कुछ छपा है या टीवी पर कुछ आया है तो उसे पूरा नहीं तो अधिकाँश सच तो मानता ही है आम आदमी...

आदर्श स्थिति तो यह होती कि हमारा मीडिया अपनी इस जिम्मेदारी को समझ घटनाओं व प्रकरणों के एक निष्पक्ष रिपोर्टर, व आम जन के हितों के रखवाले का काम करता... पर मीडिया को एक मिशन सा मान काम करना आज चलन में नहीं है... आज चैनल या अखबार निकालना भी अन्य धंधों जैसा ही है जिसमें मुख्य उद्देश्य है अधिक से अधिक मुनाफा कमाना... ज्यादा मुनाफा कमाने के लालच से उपजा है सत्ता व मीडिया के बीच का भ्रष्ट गठजोड़... सत्तासीन व भविष्य में सत्ता पाने के आकाँक्षी मीडिया को एक तरह से पाल सा लिये हैं... मीडिया भी अपने को किंगमेकर व सत्ता के इनामों का बराबरी का हकदार मानने लगा है... नतीजा है पेड-प्रायोजित न्यूज व मीडिया का कॉरपोरेट व पॉलीटिकल लाबीइस्ट-डीलमेकर की तरह से काम करना... हर गड़बड़झाले में मीडिया की बेशर्म हिस्सेदारी के आरोप भी सामने आने लगे हैं ... २ जी घोटाले का राडिया काँड अब सामूहिक याद्दाश्त से गायब सा हो गया है... कोयला खदानों के मामले में एक मीडिया समूह पर अपने योगदान के बदले शेयर हिस्सेदारी लेने के आरोप हैं तो आज कोयला खदानों का आवंटी एक बड़ा बिजनेस समूह एक बड़े न्यूज चैनल समूह पर चुप रहने की एवज में १०० करोड़ की विज्ञापन रूपी रंगदारी माँगने का खुला इल्जाम लगा रहा है...

ऐसे में एक आम पाठक या दर्शक के सामने एक सबसे बड़ा सवाल जो उठ गया है वह यह है कि जो खबर अखबार में छपी है या टीवी पर दिखाई जा रही है, उसकी विश्वसनीयता कितनी है... आज जन के सामने संकट खड़ा हो गया है कि वह अपनी राय किस पर बनाये जब उसके सामने जो सूचना है उसकी ही कोई विश्वसनीयता नहीं है...

क्या हमारे प्रिंट-इलेक्ट्रानिक मीडिया में अपनी विश्वसनीयता पर आये इस संकट को मिटाने की इच्छा शक्ति है... क्या मीडिया की काली भेड़ें भी चिन्हित कर घेरे से बाहर की जायेंगी... क्या मुनाफाखोर मालिक ऐसा होने देंगे... क्या हमारा मीडिया आत्मावलोकन करेगा... क्या मीडिया के वो लोग जिनका ईमान अभी भी कायम है मुखर होकर अपने घर की सफाई के लिये सामने आयेंगे...

अगर मीडिया यह सब खुद करने को तैयार नहीं तो क्या यह सही नहीं होगा कि...



हमारे लोकतंत्र को लोकपाल से पहले 'मीडिया के लिये लोकपाल' लाने की जरूरत है...

आप  क्या सोचते हैं ?








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