शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

ब्लॉगवुड के नारीवादी इस तरह के दोहरे मानक (Double Standards) क्यों रखते हैं ?

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उनका नाम यहाँ पर लेना मैं उचित या आवश्यक नहीं समझता, सिर्फ इतना बताना चाहता हूँ कि वह ब्लॉगवुड के ही किरदारों में से एक हैं, प्रात: स्मरणीय, स्टेनलेस स्टील से बना और टेफ्लॉन कोटेड भी, आजकल वह भारतमाता का भेष धारण किये है...

यहाँ बात उनके लिखे की हो रही है...

एक जगह उन्होंने लिखा...

पति को, देवर को, सास को मार गयी... 
कौन से नक्षत्र ले आई थी धरा पे तुम... 
कालसर्प योग कब जायेगा भारत का ?

पोस्ट आई दस सितम्बर को... मैंने इंतजार किया कि ब्लॉगवुड में नारीवाद, नारी सशक्तिकरण व नारी सम्मान के पुरोधाओं में कोई तो आपत्ति या विरोध करेगा एक नारी के ही खिलाफ सरासर अपमानजनक व अनर्गल इस प्रलाप का... पर देखता हूँ कि ऐसा होना तो दूर, पाँच स्त्री बलॉगर वहाँ तारीफ के पुलिंदे बाँध रही हैं...

मेरा सीधा सा सवाल है यहाँ पर...



ब्लॉगवुड के नारीवादी इस तरह के दोहरे मानक (Double Standards) क्यों रखते हैं ?







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90 टिप्‍पणियां:

Shah Nawaz ने कहा…

:-)

यहाँ नारी-पुरुष-धर्म-समाज-राजनीति-भाषा इत्यादि-इत्यादि से जुड़े मुद्दों पर एतराज़ करने से पहले यह देखा जाता है कि गलत लिखने वाला अपने गुट का है या नहीं!

रचना ने कहा…

पहली बात नारी सश्क्तिकर्ण का अर्थ हैं अगर आप स्त्री हैं , तो हर हाल में स्त्री के साथ खड़ी दिखे फेमिनिस्म से मै परिचित ही नहीं हूँ
दूसरी बात दोहरे मानदंड , आप के ब्लॉग पर कभी भी आप के "देव" के खिलाफ क़ोई पोस्ट नहीं देखी ?? आज तक .
जैसे आप के लिये उनका हर कृत्य उनके "देव" होने यानी जो वो हैं वही वो हैं , अन्दर बाहर एक से { ये आप के ही शब्द हैं आप की पोस्ट पर मेरे प्रश्न के उत्तर में } का प्रमाण पत्र हैं वैसे ही होसकता हैं किसी के लिये क़ोई "देवी " हो ???
तीसरी बात आप के कमेन्ट नारी ब्लॉग पर नहीं दिखते हैं मै फिर भी कर रही हूँ , क्या केवल और केवल आप ही व्यस्त हैं

राजन ने कहा…

प्रवीण जी,सोनिया गाँधी के बारे में और भी बहुत कुछ लिखा जा रहा है और पुरुष भी लिख रहे हैं लेकिन वहाँ भी महिलाओं ने कोई विरोध नहीं किया।वैसे सोनिया और अरुन्धति जैसी महिलाएँ मुझे भी किन्हीं कारणों से नापसंद है।पर एक बार अरुन्धति के कश्मीर पर दिए बयान के बाद काफी कुछ लिखा गया था लेकिन जब कुछ लोगों ने अश्लीलता की हद ही पार कर दी यहाँ तक कि अपनी टिप्पणी में उनके बलात्कार तक की कामना करने लगे तो एक जगह मैंने भी इसका विरोध किया।वैसे आपको थोड़ा अजीब लगे लेकिन इन महिलाओं के बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि जिस पर आप आपत्ति कर रहे है उसमें कुछ विशेष लगता ही नहीं।इसके अलावा दिव्या जी का स्वभाव भी एक कारण हो सकता है असहमति से वे आपा खो बैठती हैं।फिर भी जहाँ तक बात है दोहरे मानकों की तो हाँ कुछ हद तक यह नारीवादियो में भी होता है।

राजन ने कहा…

रचना जी की इस बात से भी सहमत हूँ कि यदि आपके लिए कोई देव हो सकता है तो किसी और के लिए कोई देवी क्यों नहीं हो सकता वैसे कुछ विषयों पर यहीं महिलाओं का भी खूब विरोध देखा है जैसे इस विषय पर कि विवाहित महिला अविवाहित क्यों दिखना चाहती है बल्कि आपने देखा होगा नारी ब्लॉग पर कैंसर को लेकर एक पोस्ट आई जिसमें किसे और महिला के नजरिए का बहुत आक्रामक तरीके से विरोध किया जा रहा था इसलिए मैंने वहाँ विरोध में कहा कि उनकी मानसिकता गलत नहीं थी आप इतना क्रोध प्रतिरोध क्यों दिखा रही हैं ।पर फिर भी कहूँगा कि दोहरे मापदंड वाली बात भी कुछ लोगों के लिए सही है कई बार ऐसा जान बूझकर होता है तो कभी अनजाने में।

राजन ने कहा…

रचना जी की 'स्त्री को हर हाल में स्त्री के साथ ही खड़ा होना चाहिए वाली बात से असहमत ।

राजन ने कहा…

रचना जी की 'स्त्री को हर हाल में स्त्री के साथ ही खड़ा होना चाहिए वाली बात से असहमत ।

प्रवीण शाह ने कहा…

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@ रचना जी,

१- "पहली बात नारी सश्क्तिकर्ण का अर्थ हैं अगर आप स्त्री हैं , तो हर हाल में स्त्री के साथ खड़ी दिखे"

मतलब स्त्री चाहे गलत ही हो, अनर्गल लिखे, किसी दूसरी अपने जैसी ही स्त्री को अपमानित करे, फिर भी साथ खड़ा होना होगा...

मुझ मूर्ख-अज्ञानी को इस परिभाषा से परिचित करवाने के लिये आभार...

२- अरविन्द मिश्र जी से आपका पुराना ख़टराग है, मैं इसमें भागीदार होने को तैयार नहीं, जहाँ मुझे लगता है वह गलत हैं उन्हें उन्हीं के ब्लॉग पर टोक देता हूँ... इस से ज्यादा की जरूरत नहीं समझता...

३- मैं टिप्पणियों का बार्टर नहीं करता, यह मैंने अपने ब्लॉग पर लिखा भी है... नारी ब्लॉग में वैसे भी अभी एक आयोजन चल रहा है... मैं दिमाग लगा रहा हूँ कि क्या मैंने इस आयोजन में देने लायक कोई पोस्ट लिखी है कभी...


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Anti Virus ने कहा…

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आप किसी का नाम न लें और वह किसी और का नाम धारण करके ख़ुद अपनी टिप्पणी में अपना नाम ले तो यह देखना सुखद लगता है। वैसे तो पहचानने में आप स्वयं ही दक्ष हैं परंतु हम भी यक्ष हैं।
ब्लॉगिंग में लिंग परिवर्तन करके भी टिप्पणी दी जाती है और एक से ज्यादा बार दे दी जाती है।
बेफिक्री रहती है कि कौन पहचान रहा है ?

नारीवाद के लिए काम करना सराहनीय है चाहे वे ही क्यों न करें जिनकी वजह से नारी की गरिमा पर आंच के बजाय लपटें आती हों।

धन्यवाद मैं करूंगा नहीं।
किस बात का धन्यवाद ?
आपने दिया क्या है सिवाय एक टेंशन भरी पोस्ट का लिंक देने के.
खबरदार जो कभी अपनी ऊर्जा किसी सार्थक कार्य में खर्च की तो ...

Anti Virus ने कहा…

एक स्त्री को स्त्री के साथ खड़े होने मात्र से ही काम चलने वाला नहीं है। दुख दर्द बांटने के लिए उसके साथ बैठना भी चाहिए और हो सके तो लेटना भी चाहिए। विश्व स्तरीय ख्याति प्राप्त कुछ स्त्रियां स्वयं को पुरूष की छाया से पूर्णतः सुरक्षित रखे हुए हैं। बच्चे को जन्म देने के लिए पुरूष पर अपनी निर्भरता से भी उन्होंने मुक्ति पा ली है।
नारीवाद की चरम परिणति ऐसी होती है जी.

Er. Shilpa Mehta : शिल्पा मेहता ने कहा…

आदरणीय प्रवीण जी
बहुत, बहुत, बहुत ही चकित हूँ | जब मैंने इन्ही की, संविधान के बारे में लिखी कुछ बातों पर आपत्ति की थी, जिस पर इन्होने अपने ब्लॉग पर मेरे खिलाफ निजी अपमानों की मुहीम छेड़ दी थी, तब मेरी उस पोस्ट पर आपका कमेन्ट था :

"
अपना तो ऐसे मामलों में फंडा है...

लाइट लो यार ! किसी दूसरे को या खुद को भी, इतना सीरियसली लेने की जरूरत नहीं !

आपको भी यही सलाह दूँगा...

आभार!
"
और आज आप श्रीमती सोनिया गांधी जी के लिए लिखे शब्दों पर "आपत्ति क्यों नहीं की गयी" - यह प्रश्न कर रहे हैं ? calling it double standards ?

राजन जी के हर कमेंट से सहमत हूँ |

anshumala ने कहा…

जहा तक मेरे ख्याल है की ये पूरी तरह से राजनीतिक सोच का मामला है सिर्फ स्त्री का नहीं वहा कांग्रेस से जुड़े बाकि लोगों के बारे में भी ऐसा लिखा जाता है और बहुत लोग लिख रहे है अपने राजनैतिक सोच के हिसाब से अपने विरोधी पार्टियों के बारे में जो बहुत ही गलत है , फिर सवाल सिर्फ दिव्या जी पर ही क्यों है ? ( राजनैतिक सोच को भी ध्यान में रखे तो पहली लाइन मुझे भी पसंद नहीं आई चाहे वो स्त्री पुरुष किसी के लिए भी लिखा जाये )
एक सवाल आप से इसी ब्लॉग जगत में नारी के खिलाफ बहुत कुछ लिखा गया लिखा जाता है फिर सवाल किसी एक पर ही क्यों :)
याद करू तो मेरे ध्यान में ये ४-५ पोस्ट है किसी एक व्यक्ति के विरोध में ,( चर्चा के लिए नहीं) आप के ब्लॉग पर :)

रचना ने कहा…

प्रवीण जी
नारी ब्लॉग पर मैने बहुत पोस्ट लिखी हैं की स्त्री को स्त्री के साथ हर हाल में खड़े होना चाहिये , वही यहाँ भी कहा , आप ने उसको अपनी पोस्ट के सन्दर्भ में लिया और कह दिया की अगर स्त्री गलत हैं तो भी क्या होना चाहिये ??? लीजिये आप ने बात नहीं समझी , अगर जील जी सोनिया के साथ बतौर महिला खड़ी होती तो आप हो सकता हैं कहते की सोनिया के साथ उनका खडा होना गलत हैं अब उन्होने एक तरह से तो आप की ही बात का मान रख कर सोनिया के खिलाफ लिख दिया और स्त्री होते हुए भी वो उसके साथ नहीं खड़ी हुई . फिर आपत्ति क्यूँ हुई आप को महज इस लिये क्युकी उनकी अभिव्यक्ति की भाषा गलत { मेरी नज़र , उनकी नहीं } लगी , अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हैं कौन क्या लिख रहा हैं , किस के खिलाफ लिख रहा हैं क्यूँ लिख रहा हैं ये सब आप खुद ही कहते हैं नहीं सोचना चाहिये ?? वो आप ने कहा था " कर लो क्या करोगे " दो तीन पोस्ट पहले ज़रा अपने ब्लॉग पर ही झांके .

रचना ने कहा…

राजन
नारी को हर हाल में नारी के साथ होना चाहिये , ज़रा सोच कर देखिये मैने किस से ये कहा हैं ??? असहमत होने से पहले ज़रा कमेन्ट के शब्दों को समझिये अब आप तो मेरे लिखे को हमेशा सही समझते , सही यानी जो मैने लिखा हैं , सही , रजामंदी वाला सही नहीं ,
कभी कभी सटायर होता हैं जैसे यहाँ था नारी को हर हाल में नारी के साथ होना चाहिये , मै तो होती ही हूँ

रचना ने कहा…

जहाँ मुझे लगता है वह गलत हैं उन्हें उन्हीं के ब्लॉग पर टोक देता हूँ... इस से ज्यादा की जरूरत नहीं समझता...

then why dont you this for every one , because u dont have same equation with everyone or because one u feel like ignoring and one u want to highlight

पूरण खंडेलवाल ने कहा…

जिस पोस्ट की चर्चा की जा रही है वो पोस्ट करने वाली भी एक महिला है और हालांकि उन्होंने जिसके बारे में पोस्ट की है उसका नाम तो नहीं लिया है लेकिन सब लोग समझ तो गए ही है कि किसके बारे में पोस्ट की गयी है वो भी एक महिला ही है और वो पोस्ट राजनैतिक है इसलिए इस पर सवाल उठाने कि कोई आवश्यकता भी नहीं थी ऐसी छोटी छोटी नुक्ताचीनी के बजाय किसी सार्थक मुद्दे पर बहस की जाती तो शायद ज्यादा अच्छा होता !!

Arvind Mishra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Arvind Mishra ने कहा…

प्रवीण जी,
नारी लेखन भी एक विधा है जहां सास देवर ननद भौजाई आदि भावों -शब्दों का जिक्र होता ही रहता है -इसलिए ही नारी लेखन को ज्यादा तवज्जो विद्वतजन नहीं देते ....
मैं नारी साहित्य पढता नहीं -नारी साहित्य नारियां ही लिखती हों ऐसा नहीं है कई पुरुष भी ऐसा लेखन चोरी छिपे करते पाए जाते हैं और कुछ स्त्रैण लेखक तो धड़ल्ले से और पूरी निर्लज्जता से ऐसा करते हैं .....मैं यह मानता हूँ कि जैसे दलित लेखन केवल दलित का ही लिखा नहीं होता उसी तरह नारी लेखन केवल नारी ही नहीं करती -मगर आलोच्य मामला एक आत्मघोषित "ब्लॉग जगत की लौह महिला " का है मगर निहायत फूहड़ किस्म का नारी लेखन है यह ! भर्त्सनीय !
और हाँ आपने मुझे टोका है और खूब दिल दहला देने की सीमा तक टोका है मगर तब भी देवि को शीतलता की प्राप्ति नहीं हुयी है आप ऐसा करें मेरा जिबह कर दें और रक्त चामुंडा को समर्पित कर दें -तब शायद लोगों को कुछ रास /राहत हो आये :-)
कम से कम आप तो सशक्तिकरण ठीक से लिख दिए होते.....हिन्दी दिवस पर हिन्दी से रोजी रोटी चलाने वालों से ऐसी भूलें मुझे कैपिटल क्राईम से कम नहीं लगतीं !
हे ,इस टिप्पणी को अगर डिलीट करना हो तो कर दीजियेगा मगर मुझसे सहमति लेकर ,प्लीज!

प्रवीण शाह ने कहा…

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आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

गौर से देखिये दोबारा, मैंने 'सशक्तिकरण' सही ही लिखा है, जहाँ गलत है, वह उद्धरित है।


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Arvind Mishra ने कहा…

@जी....शुक्रिया!

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

...कुछ लोग नारीवादी लेखन के नाम पर महज रंडापा टॉइप स्यापा करते हैं.अपन तो ऐसों से बहुत दूर हैं ।

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

बैकग्राउंड की जानकारी के अभाव में मामला समझ नहीं आया...

रचना ने कहा…

कुछ लोग नारीवादी लेखन के नाम पर महज रंडापा टॉइप स्यापा करते हैं

praveen ji
aap ab is prakaar ki bhasha ko bhi swikaar kar rahae haen apnae yahaan ??

प्रवीण शाह ने कहा…

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अब इस टीप को अच्छी तरह समझाने में तो संतोष त्रिवेदी जी ही समर्थ हैं पर मेरे विचार में वह स्यापा उस प्रलाप को कह रहे हैं, जो देश के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करते आतंकवादियों के हाथों शहीद हुऐ अपने पति व सास को गंवाने वाली महिला के बारे में किया गया है...


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रचना ने कहा…

प्रवीण जी "रंडापा" शब्द का अर्थ एक बार अवश्य पता कर ले
पोस्ट ब्लॉग जगत की नारीवादियों के ऊपर हैं जिन्होने उस पोस्ट को "दोहरे माप दंड " के चलते बिना आपत्ति के स्वीकार किया .
अब ये रंडापा शब्द उन नारीवादियों के लिये हुआ ना की उस पोस्ट लेखिका के लिये और अगर उस पोस्ट लेखिका के लिये भी हैं तो भी क्या आप अपने ब्लॉग पर इस प्रकार की भाषा को स्वीकार कर रहे हैं कमेन्ट में , क्या ये आप को मान्य हैं या अपने अधिकार के साथ आप इस कमेन्ट को डिलीट करना चाहेगे . क्या ये पोस्ट इस लिये लिखी गयी हैं की नारीवादियों को "रांड" कहा जाए . या उस लेखिका को रांड कहा जाए . क्या इस स्तर को आप स्वीकार कर रहे हैं ????? इस कमेन्ट को डिलीट करे तो मेरे सम्बंधित कमेन्ट भी डिलीट कर दे

प्रवीण शाह ने कहा…

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@ रचना जी,

आपकी आपत्ति के बाद 'रंडापा टॉइप स्यापा' के बारे में कुछ ज्यादा जानने का प्रयत्न किया... यह 'विधवा विलाप' का ही देसी या देसज रूप है... शब्द युग्म 'विधवा विलाप' अक्सर इस्तेमाल होता है...

देखिये यहाँ...

http://in.jagran.yahoo.com/news/national/general/5_1_6110772/

और यहाँ भी...

http://dalitrefugees.blogspot.in/2010/07/blog-post_19.html

संतोष त्रिवेदी जी शायद यहाँ वापस नहीं लौट कर आने वाले... मुझे उनके कहे का इंतजार है।



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संतोष त्रिवेदी ने कहा…

प्रवीण जी,
...जिस तरह की नकारात्मक लेखन और टीपन प्रवृत्ति पर आपने सवाल उठाया था,मेरा क्षोभ उसे कड़वे शब्द दे गया बस...।
...यह आपके ही बूते की बात है जो अचूक ब्रह्मास्त्र से अब तक बचा हुआ हूँ।यदि आप कुछ आँच महसूस कर रहे हों तो हम मिटने को तैयार हैं ।

रचना ने कहा…

'विधवा विलाप' का ही देसी या देसज रूप है.
सो कौन सी नारी वादी विधवा हैं प्रवीण जी और ये जो विधवा विलाप कहा गया हैं क्या ये सही हैं
बहुत अफ़सोस हैं की अब तक कमेन्ट नहीं हटा
विधवा का विलाप क्या बात हैं , यानी विधवा , विलाप करती हैं अरे सभ्य लोग काफी समझदार हो चले हैं और विधवा को भी अब विधवा नहीं कहते हैं और यहाँ तो एक सुहागिन को ही विधवा कहा जा रहा हैं
और आप कमेन्ट ना हटा कर उसको सहमति भी दे रहे हैं
किसी भी नारी के किसी भी ब्लॉग पर आप ज़रा एक भी पंक्ति , इस प्रकार की दिखा दे ,जहां किसी पुरुष ब्लोग्गर को इस प्रकार के अपशब्द कहे गए हो
जैसे विधुर , कमीना , निर्लज , इत्यादि इत्यादि
किसी सुहागिन को विधवा कहने से ज्यादा अपमान जनक कुछ नहीं होता और किसी के अनिष्ट की कामना से उसका अनिष्ट हो ना हो पर अपना भी हो सकता हैं . कब किसके घर { भगवान् ना करे } किसी विधवा को रोना पड़ जाए ?? उस समय ये विधवा विलाप शब्द बहुत तंज देगा
सोच कर देखियेगा

रचना ने कहा…

लोग अभी तक आपकी पार्टी का 'विधवा-विलाप' भी नहीं भूले थे जब सन् 2004 के चुनावों के बाद सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री पद को लेकर हो रहा था । उमा भारती और सुषमा स्वराज जब छाती कूट-कूट कर कह रही थी कि वे सिर मुंडवा लेगी या सन्यास ले लेगीं। पता नहीं, किसकी हाय किसको लगी पर देखो वे दोनों आज कहाँ हैं,सोनिया कहाँ हैं और आपका 'मिशन' कहाँ है?http://www.santoshtrivedi.com/2009/05/blog-post.html

These are the views of RESPECTED SHRI SANTOSH TREVEDI AND HE IS TELLING US जिस तरह की नकारात्मक लेखन और टीपन प्रवृत्ति पर आपने सवाल उठाया था,मेरा क्षोभ उसे कड़वे शब्द दे गया बस...।
What is the difference Mr Praveen
I am making a final request to delete this comment and subsequent comments from this post

Arvind Mishra ने कहा…

'Vidhwa Vilap' has been figuratively used here and the term is in fact in usage as a gender neutral expression for exaggerated and showy acts not worthy of any serious attention!

रचना ने कहा…

सधवा नारियों का वैधव्य विलाप और मेरा पश्चाताप पर्व!

http://bharhaas.blogspot.in/2010/09/blog-post_08.html#comment-6656080412826068540

'Vidhwa Vilap'= gender neutral expression
are you sure RESPECTED DR ARIVND MISHRA ??????

प्रवीण शाह ने कहा…

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@ रचना जी,

मैं फिर-फिर कहूँगा कि शब्द युग्म 'विधवा विलाप' हिन्दी में प्रचलन में है... और इसका कतई वह अर्थ नहीं जो आप सोच या बता रही हैं... मैं अनुरोध करूँगा कि किसी विषय विशेषज्ञ से सलाह करें... यदि उसके बाद भी आपको लगता है कि यह शब्द लैंगिक भावनाओं को आहत करता है तो इसे हिन्दी के शब्दकोष से हटाने की मुहिम चले... मुझ अदना गरीब के ब्लॉग की एक टीप हटा देने मात्र से काम नहीं चलने वाला... ब्लॉगवुड में भी कई विषय विशेषज्ञ हैं, क्या उनमें से कोई यहाँ कुछ बोलेगा ?



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रचना ने कहा…

mae koi arth nahin bataa rahii hun
mae aap ko pramaan sahit link dae rahii hun jahaan is shabd kaa ek particular vyakti kae liyae use kiyaa jaa rahaa haen
aur randapa vilap ko vidhva vilap likh daenae sae saumytaa naa pradaan karae

randapaa shabd kaa arth kyaa haen yae kisi sae puchhae dubara jarur aur iskae liyae apni patni sae hi puchh lae ki raand kisae kehtae haen

puchh kar yahaan unka uttar jarur likhae itni immandari ki umeed hae aap sae

anshumala ने कहा…

प्रवीण जी
यदि ये सब कुछ किसी और पोस्ट पर हो रहा होता ( जहा किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ पोस्ट लगती है और वहा पर उससे "नीजि दुश्मनी" रखने वाले आ कर अपने मन की भड़ास निकालते है और हिंदी के एक से एक गिरे शब्दों का प्रयोग करते है एक दूसरे के लिए ) तो मै कुछ नहीं कहती किन्तु आप ने शीर्षक दिया है की
"ब्लॉगवुड के नारीवादी इस तरह के दोहरे मानक (Double Standards) क्यों रखते हैं ?"

इस कारण कह रही हूं , आप को आपत्ति थी की एक सम्मानित महिला के लिए किसी पोस्ट पर गलत शब्द का प्रयोग किया जाता है और आप उसका विरोध कर रहे है और खुद आप की पोस्ट पर किसी महिला के लिए इतने गलत शब्द प्रयोग किये जा रहे और आप को उसमे कोई भी आपत्ति नहीं लग रही है उलटे आप उसकी सफाई दे रहे है उसे ठीक बता रहे है , पढ़ कर अफसोस हुआ | अब कम से कम मुझ बनारसन को ये मत बताइयेगा की रंडवा शब्द कितना सभ्य सुसंकृत है , अब पता चल रहा है की दोहरे मानक किसके है , आप खुद वही काम कर रहे है जिसका आप विरोध कर रहे है | गलत शब्द हमेसा गलत ही होता है समाज में सभी उसका प्रयोग करे तो वो सही नहीं बन जाता है, ये शब्द तो अपने आप में हर उस स्त्री को अपमानित करता है जी विधवा हो जाती है समाज तो बहुत कुछ गिरा हुआ करता है , किन्तु वो सब सही ही हो ये जरुरी नहीं है | पहले जा कर शब्द कोष से हटाइये ये कोई भी तर्क नहीं हुआ समाज में लोगों की जुबान पर और शब्दकोशों में बहुत कुछ लिखा है सब कुछ हम अपने ब्लॉग पर भी लिखे ये जरुरी नहीं है | आप से ये उम्मीद नहीं थी , आप तो दूसरो से अलग थे, इस फर्क को ख़त्म क्यों कर रहे है किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करने भर के लिए :(

रचना ने कहा…

अंशुमाला
रंडवा विलाप शब्द कितना घिनोना हैं ये वो जानते हैं जिन्होने इसका उपयोग किया हैं
और वो केवल किसी व्यक्ति विशेष के लिये नहीं हर उस महिला जिसको वो नारी वादी मानते हैं उसके लिये कर रहे हैं
उस व्यक्ति विशेष के लिये तो ये सब और उससे भी खराब का प्रयोग हमेशा से होता आया हैं और जब पलट कर वो करती हैं तो बाकी नारी से आशा की जाती हैं की उसके साथ ना खड़ी हो
सरे आम अपने को पढ़ा लिखा समझाने वाले हम सब को गाली दे रहे हैं और जस्टिफाई भी कर रहे हैं

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

जिस अर्थ में हमने वह शब्द प्रयुक्त किया था,उसे बखूबी चरितार्थ किया जा रहा है.जो लोग बिना किसी तर्क के,केवल हुजूम बनाकर और लैंगिक आधार पर चीखना-चिलाना शुरू कर देते हैं,उन्हीं कुछ लोगों के लिए यह देसी मुहावरा है.अभी भी वही काम शुरू है.रचना जी ब्लॉग-जगत में जहाँ-तहां ढूँढ-ढूंढकर नकारात्मक और अतार्किक बहस करती हैं,मामला बढ़ने पर अपनी टीपें गायब कर देती हैं.जिसकी तरफदारी में आज ये बोल रही हैं,वहाँ नाम ले-लेकर कई वरिष्ठ ब्लोगर्स को गालियाँ डी गईं,संविधान का मजाक उडाया गया,नेहरु-गाँधी परिवार के बारे में बेहद अश्लील टिप्पणियाँ की गईं,वह इन्हें कभी नहीं अखर.यह नारीवाद और लोहावाद का छद्म-आवरण है.
मेरे यहाँ एक व्यंग्य आलेख में,जिसमें इनका नाम भी नहीं लिया गया था,देखिए कितनी शालीन टिप्पणी की थी इन्होंने :

रचना ने आपकी पोस्ट " तभी पढ़ें जब आपके पास प्रमाण-पत्र हो ! " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:


संतोष त्रिवेदी
कभी आप दिव्या जील पर दिवस को जोड़ कर पोस्ट बनाते हैं और बिना शर्मसार हुए दिवस जिसे वो भाई मानती हैं उनका नाम जोडते हैं और दिव्या को लोमड़ी कहते हैं और फिर आप के मित्र ताली बजाते हैं
उसके बाद आप मेरे आलेख के ऊपर पोस्ट बनाते हैं
और आप अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं ??
अगर हिम्मत हैं और अपनी माँ का दूध पीया हैं तो हम सब महिला पर नाम लेकर पोस्ट बनाए और मैने ये मुद्दा ना अन सी डब्लू मै उठाया तो मैने अपनी माँ का दूध नहीं पीया हैं समझ लीजिये
अग्रीगेटर के मालिक जो हैं वो साधिकार मुझ से कह सकते हैं
अग्रीगेटर आप की निजी संपत्ति नहीं हैं और ना ही मेरा ब्लॉग
मै ब्लॉग लिखती हूँ , पोस्ट लिखती हूँ तो नाम के साथ लिखती हूँ निडर हो कर लिखती और अब उनके लिये लिखती हूँ जो निडरता का प्रमाण पत्र रखते हैं
और अगर मेरा लिखा पढ़ना हैं तो निडरता का प्रमाण पत्र तो लाना ही होगा
नहीं हैं तो अपने ब्लॉग पर रोते रहे

रचना ने कहा…

ji haan maenae yae kament diyaa
tab diyaa jab aap ne maere upar personal post likhii maere blog kaa naam diyaa aur apni pasand kae hisaab sae mera naam nahin diyaa

jab maenae yae kament diyaa to aap ne yae kament hataayaa
aur post me disclaimer diyaa ki yae post kisi vyakti vishesh par nahin haen

अगर हिम्मत हैं और अपनी माँ का दूध पीया हैं तो हम सब महिला पर नाम लेकर पोस्ट बनाए और मैने ये मुद्दा ना अन सी डब्लू मै उठाया तो मैने अपनी माँ का दूध नहीं पीया हैं समझ लीजिये

aaj bhi mera challenge haen aap ko himmat hae to maere yaa kisi bhi mahila ko gaali dae

agar disclaimer pehlae lagaa hotaa to kyaa baat thee
kament daetae hi disclaimer
aur phir kament hataa kae keh diyaa ashaaleel

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

आपके किसी प्रश्न का उत्तर देना मैं ज़रूरी नहीं समझता क्योंकि आप केवल मनचाहा अर्थ निकालती हैं और अपना ही कहा सर्वोपरि मानती हैं.

...यह सब मैं नहीं चाहता था कि प्रवीण जी के यहाँ ऐसा हो,मगर आप केवल वही सब करने पर उतारू हैं,जिसका मैंने जिक्र किया है !अब आप कहती रहें जो कहना है,जो मोर्चा बनाना हैं,बना डालें,हमारे पास और भी काम हैं !

रचना ने कहा…

http://www.santoshtrivedi.com/2012/05/blog-post_29.html?showComment=1338376995951#c7258384147942009056
aap hi kae blog par antar sohail ne yae kament diyaa thaa aur baad mae aap ko mail dae kar usko hataanae kae liyae bhi kehaa thaa

mujh sae khud unhonae kehaa unhonae jaldbaazi me yae kament diyaa aur aap ne mail paakar bhi yae kament nahin hataayaa

रचना ने कहा…

आपके किसी प्रश्न का उत्तर देना मैं ज़रूरी नहीं समझता
waah khud hi mera kament prakshit kiyaa
aur khud hi keh rahey mae jaruri nahin samjhtaa

mae to chahtee hun praveen shah ko sahii chehra dikhae

sahii raj pataa to chahale

maene aap ko prati kament tab diyaa jab aap me maere kament ka jikr kiyaa

mae praveen kae blog par un sae prashn uttar kar rahii thee aur aap tuu kaun mae khamkhaa ki tarah bol padae

:)

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

सशक्तीकरण शब्द सही है....

'शक्ति' शब्द से इसका लेना-देना नहीं ..

यह शब्द 'सशक्त' से निर्मित है. और जब भी दो शब्द मिलकर एक नये शब्द का निर्माण करते हैं तो वे संधि स्थान पर दीर्घ हो जाते हैं.

और जब हिन्दी को सही लिखने की बात ही चली है तो यह पूरी तरह से सही हो तो अच्छा रहेगा.

वैसे चर्चा में 'संवाद' महत्वपूर्ण होता है 'त्रुटियाँ' नहीं.... यहाँ इतने तो सभी समझदार हैं कि

'सार-सार को ग्रहण कर थोथा उड़ा दें'.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

'कुछ लोग हिन्दी भाषा प्रयोग में अपनी विद्वता दिखाने के लिए चर्चा में 'अपशब्दों' का कुछ ऐसा इस्तेमाल करते हैं कि उनके 'नाम' के बाद उनका 'टाइटल' (गोत्र नाम) देखना पड़ता है... तब ये देखकर बहुत दुःख होता कि वे तो तीन-तीन वेदों के ज्ञाता हैं!!! और खेद है कि पढ़े-लिखों को समझाया नहीं जा सकता.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

ऎसी बहसबाजी में, जिसमें कि चर्चा विषय से भटककर कोई दूसरी ही राह चल पड़ती है... और ऐसे चर्चाकर, जिसमें कि वे परस्पर गाली-गौलौज़ पर उतर आते हों... इनसे दूरी बनाकर ही रहें तो अच्छा है...

कभी सोचता था कि इस ब्लॉगजगत में कितने गुरुजन हैं जिनके विचारों से चुपचाप लाभ लिया जा सकता है.... लेकिन अब अफ़सोस होता है कि यहाँ तो घनघोर गुटबाजी है...और सामने वाले को नीचा दिखाकर खुद को श्रेष्ठ बनाने की होड़ मची रहती है. 'विधवा विलाप' का अर्थ 'निरर्थक विलाप' से मेल नहीं खाता... 'विधवा विलाप' का सही अर्थ समझें.... 'संवेदना को झकझोर देने वाला विलाप' .. इतना मार्मिक कि कठोर ह्रदय भी पिघल जाए. यदि वेदों के ज्ञाताओं को सभी स्त्रियों का आलाप भी 'विधवा विलाप' प्रतीत होता है तो समझ में यही आता है कि वे 'संवेदनाओं के स्तर' पर प्रगतिशील हो चले हैं.

राजन ने कहा…

ये क्या बात हुई कि ये शब्द जेन्डर न्यूट्रल की तरह प्रयोग किया जाता है?माँ बहन की गालियाँ भी स्त्री पुरुष दोनों के लिए प्रयोग की जाती हैं तो क्या इसलिए कहें कि इनका प्रयोग सही है और अगर की भी जाती है तो लक्ष्य कौन होता है?माँ या बहन यानी कोई न कोई स्त्री ही।यहाँ भी विधवा शब्द के कारण ये बात लागू होती है।रचना जी का कहना सही है कि आजकल किसी विधवा के लिए भीलोग जल्दी से विधवा शब्द नहीं प्रयोग करते इसके लिए देशी शब्द तो दूर की बात।एक बार चलिए मान लें कि एक मुहावरे के तौर पर विधवा विलाप शब्द का प्रयोग कर लिया(वैसे ऐसे बहुत से मुहावरे और कहावते रही है जिनमें जातिसूचक शब्दों का प्रयोग होता था लेकिन उन्हें गलत मानकर उनका प्रयोग अब बंद कर दिया गया है)लेकिन यहाँ तो जिस देशी शब्द का इस्तेमाल हुआ है वह तो निहायत ही अश्लील है और जिस लहेजे में प्रयोग किया है वह तो इसे और अश्लील बना देता है।

राजन ने कहा…

ये क्या बात हुई कि ये शब्द जेन्डर न्यूट्रल की तरह प्रयोग किया जाता है?माँ बहन की गालियाँ भी स्त्री पुरुष दोनों के लिए प्रयोग की जाती हैं तो क्या इसलिए कहें कि इनका प्रयोग सही है और अगर की भी जाती है तो लक्ष्य कौन होता है?माँ या बहन यानी कोई न कोई स्त्री ही।यहाँ भी विधवा शब्द के कारण ये बात लागू होती है।रचना जी का कहना सही है कि आजकल किसी विधवा के लिए भीलोग जल्दी से विधवा शब्द नहीं प्रयोग करते इसके लिए देशी शब्द तो दूर की बात।एक बार चलिए मान लें कि एक मुहावरे के तौर पर विधवा विलाप शब्द का प्रयोग कर लिया(वैसे ऐसे बहुत से मुहावरे और कहावते रही है जिनमें जातिसूचक शब्दों का प्रयोग होता था लेकिन उन्हें गलत मानकर उनका प्रयोग अब बंद कर दिया गया है)लेकिन यहाँ तो जिस देशी शब्द का इस्तेमाल हुआ है वह तो निहायत ही अश्लील है और जिस लहेजे में प्रयोग किया है वह तो इसे और अश्लील बना देता है।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

aapase sahmat lekin yahan to sarthak muddon par bhi aisi ghamasan hua karti hai.

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

यहाँ पर लेख पर जो आपत्ति जताई गयी उसमें इस शब्द "रंडापा टाइप स्यापा " लिखने का मंतव्य कुछ समझ नहीं आया है . वैसे लिखने वाले विद्वजन ब्लोग्गर है लेकिन वाणी संयम के साथ लेखनी संयम भी एक लेखक की गरिमा में आता है i. वह चाहे नारी हो या पुरुष . दूसरों पर अंगुली उठना बहुत आसान है . नारीवादी जो लिखते हें वह स्यापा में आता है और आप जो लिखते हें वह सर्वसम्मत हुआ. अगर ऐसी बहस सार्थक विषयों पर की जाये तो शायद बहुत से विवादों का हल मिल जाये लेकिन अपनी ऊर्जा निरर्थक बातों में खर्च करने के बाद सार्थक के लिए शक्ति ही नहीं बचती है.

सुज्ञ ने कहा…

इस विषय और चर्चा पर मात्र इस सूत्र से ही काम चला लें……

क्रोध, ईर्ष्या,वैर और बुराई अपने को पराया कर देते है जबकि मन से शुभ भावना वचन से मधुरता और काया से सेवा पराए को भी अपना बना देते है।

प्रवीण शाह ने कहा…

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@ सभी से,

आरोप मुझ पर भी लग रहे हैं दोहरे मानक रखने के... मैं अपनी सफाई में कुछ नहीं कहूँगा सिवाय इसके कि ऐसे सभी मामलों में समय ही सबसे बड़ा निर्णायक होता है... बहरहाल जाने-अनजाने में ही हम सभी के दोहरे मानकों का एक अच्छा खासा दस्तावेजी सबूत सी बन गयी है यह पोस्ट...



...

anshumala ने कहा…

प्रवीण जी
ब्लॉग जगत संवाद की जगह है किन्तु आप इसे ख़त्म कर रहे है आप स्वयं तो दूसरो से सवाल करते है और जब सब जवाब के साथ आप से कोई सवाल करे तो आप अपना कोई भी पक्ष स्पष्ट नहीं करते है, ये गलत परंपरा है ,मै बहस करने के लिए नहीं कह रही किन्तु जब संवाद और चर्चा आप ने छेड़ी है तो उससे उपजे सवालो का भी जवाब देना चाहिए यदि ये नहीं कर सकते है तो सवाल उछालना भी बंद कीजिये | हम दूसरो पर बड़ी जल्दी सवाल अंगुली उठा देते है किन्तु खुद पर उठाये सवालो पर कन्नी काटने लगते है , ये गलत है | और अपनी दूसरे ब्लॉग सहित इस ब्लॉग की टिप्पणी बाक्स के ऊपर ये भी लिख दे की यहाँ जवाब और संवाद बस जिसे ब्लॉग स्वामी खास आदरणीय, बुद्धिजीवी देवी देवता आदि आदि समझता है उसी को दी या की जाती है आम लोगों की बातो का यहाँ जवाब नहीं दिया ना उनसे संवाद किया जाता है ताकि आगे से कोई साधारण आम सा ब्लोगर टिप्पणी चर्चा करने से पहले सोच ले |

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

'रंडापा टॉइप स्यापा' या और किसी शब्द या उसके निहितार्थ पर dispute की स्थिति में अजीत जी से एक्सपर्ट राय की रिक्वेस्ट की जा सकती है| शायद स्थिति कुछ स्पष्ट हो जाए|

रचना ने कहा…

i had contacted him on day one via email and do it often when i need to clarify
his email had clear response and as it was a personal email i am not putting it here
he is short of time and cant put his comment here but I WOULD BE MORE THEN HAPPY IF HE DOES because it would be a eye opener for pseudo literates

रचना ने कहा…

mahila par taj kasna bahut aasan haen
naarivadiyon ko raand kehna aur phir raand ko vidhva kehna aur vidhwa kae villap ko sehaj abhivyakiti sae swikaar kar lena sab aasan haen anshumala

aagae aanae sae pehlae mae bhi sochungi

प्रवीण शाह ने कहा…

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मैं इस मामले को यहीं खत्म करना चाह रहा था... परंतु अंशुमाला जी मुझ पर संवाद खत्म करने का आरोप लगा रही हैं... रचना जी हम में से कुछ को 'छद्म साक्षर' मानती हैं... अब सिलसिलेवार बात कर ही ली जाये...

१- पोस्ट है कि क्या...

पति को, देवर को, सास को मार गयी...
कौन से नक्षत्र ले आई थी धरा पे तुम...
कालसर्प योग कब जायेगा भारत का ?

किसी नेत्री के लिये, खासकर कि देश के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करते आतंकवादियों के हाथों शहीद हुऐ अपने पति व सास को गंवाने वाली महिला के बारे में इस तरह का प्रलाप क्या उचित है ?

२- अब हुआ क्या है, कि इस बात से तो किनारा कर लिया गया और नारी-सशक्तीकरण की एक अनूठी परिभाषा मुझ 'छद्म साक्षर' को थमा दी गयी, साथ में यह उलाहना भी कि मैं अरविन्द मिश्र जी को तो कुछ नहीं कहता...

३- संतोष त्रिवेदी जी की सबसे पहली टीप केवल और केवल पोस्ट पर थी, उन्होंने इस प्रकार के लेखन को 'रंडापा टाइप स्यापा' यानी 'विधवा विलाप' लिखा... फिर बाद में उन्होंने खुद भी कहा कि "जिस तरह की नकारात्मक लेखन और टीपन प्रवृत्ति पर आपने सवाल उठाया था,मेरा क्षोभ उसे कड़वे शब्द दे गया बस..."... मेरी समझ में बात यहीं पर खत्म हो जानी चाहिये थी...

४- मैं ब्लॉगवुड में किसी से भी फोन-ई मेल या फेसबुक के जरिये संपर्क में नहीं रहता जिसे भी कुछ कहना चाहता हूँ या कोई मुझे कुछ कहना चाहता है तो इसका एकमात्र जरिया है टिप्पणी बक्सा, मेरी समझ से यही एकमात्र सही तरीका भी है... अब यदि रचना जी यहाँ आने से पहले 'सोचेंगी'... तो इसमें मैं यही कहूँगा कि हम में से हर कोई अपनी अपनी समझ व सुविधा से नतीजे निकालने के लिये आजाद है... मैं जैसा भी हूँ आपके सामने हूँ और अपने पाठकों का हर निर्णय मुझे स्वीकार है...

५- अंशुमाला जी लिखती हैं...

"अपनी दूसरे ब्लॉग सहित इस ब्लॉग की टिप्पणी बाक्स के ऊपर ये भी लिख दे की यहाँ जवाब और संवाद बस जिसे ब्लॉग स्वामी खास आदरणीय, बुद्धिजीवी देवी देवता आदि आदि समझता है उसी को दी या की जाती है आम लोगों की बातो का यहाँ जवाब नहीं दिया ना उनसे संवाद किया जाता है ताकि आगे से कोई साधारण आम सा ब्लोगर टिप्पणी चर्चा करने से पहले सोच ले |"

मुझे दुख है इस बात का कि वह ऐसा कह रही हैं क्योंकि मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा... लेकिन वह भी अपनी समझ व सुविधा के मुताबिक इस तरह का नतीजा निकाल रही हैं... मैं क्या कर सकता हूँ सिवाय यह कहने के कि उनका यह सोचना गलत है...

आखिर में हम सभी को यह भी सोचना चाहिये कि दूसरा भी एक पक्ष एक तर्क रखता है और हमेशा 'हम ही' सही नहीं हो सकते...

आभार आपका और अगली बार ब्लॉग पर रात दस बजे के बाद ही आ पाउंगा...



...




राजन ने कहा…

प्रवीण जी,उन्होंने केवल दिव्या जी के बारे में बात नहीं की है।उन्होंने साफ साफ नारीवादी लेखन करने वालों के बारे में लिखा है।वैसे तो दिव्या जी को भी कहा गया होता तब भी ये गलत ही होता लेकिन जरा ये भी बताएँ कि दिव्या जी की पोस्ट किस तरह से नारीवाद के तहत आती है।सोनिया गाँधी की आलोचना कब से नारीवाद होने लगा।

anshumala ने कहा…

प्रवीण जी
यदि आप को दिव्या जी की पोस्ट से कोई भी परेशानी थी आप को उनकी आलोचना करनी थी आप साफ उन पर कर सकते थे किन्तु आप ने उन पर सवाल ना करके आप नारीवादियो पर सवाल कर रहे है कि उनका विरोध क्यों नहीं किया गया , इसका कोई अर्थ ही नहीं बनता है, सभी ने अपनी तरफ से जवाब दिया जिसमे साफ था की उनका विरोध किसी नारी का नहीं बल्कि उनका राजनैतिक दृष्टिकोण है सोनिया की जगह कोई पुरुष होता तो उनके लिए भी ऐसे ही शब्दों का प्रयोग करती | मै नहीं मानती की आप उस राजनैतिक दृष्टि कोण को नहीं समझ रहे थे आप ने बस उनका विरोध करने के लिए इसे जानबूझ कर नारीवाद से जोड़ा और उनका विरोध करने की जगह नारीवादियो का विरोध करने लगे , आप मानिये या ना मानिये आप सच्चाई अच्छे से जानते है | कोई आप के लिए देव है नेत्री है तो क्या जरुरी है सभी उनको वैसा ही समझे सभी अपनी समझ रखने के लिए स्वतंत्र है |
@ ३- संतोष त्रिवेदी जी की सबसे पहली टीप केवल और केवल पोस्ट पर थी,
बिल्कुल सही कहा आप ने और आप ने पोस्ट में नारीवादियो पर सवाल उठाया था तो टिप भी उन्ही के लिए थी , कोई भी नारीवादी अपने लिए ऐसे शब्द बर्दास्त नहीं करेगी | एक तरफ तो आप पूछ रहे है की दिव्या जी ने इतना कुछ लिखा कोई उसका विरोध क्यों नहीं कर रहा है, वही सवाल तो हम भी आप से कर रहे है की आप के ब्लॉग पर समस्त नारीवादियो के लेखन के लिए इतने गंदे शब्द का प्रयोग किया गया जो बहुत ही अभद्र है जिसे गाली की तरह प्रयोग किया जाता है और अब आप उसे सही ठहरा रहे है , ये बिल्कुल भी गलत है | दिव्या जी का लिखा नारी विरोध नहीं था फिर भी मैंने साफ लिखा है की उनकी पहली लाईन किसी के लिए भी लिखा जाये गलत है किन्तु आप ने एक बार भी ये नहीं कहा की रंडवा जैसे शब्द का प्रयोग गलत है आप स्वयं उसे सही कर के विधवा विलाप बना रहे है और बाद में जब त्रिवेदी जी खुद बता रहे है की उन्होंने उसे नाराजगी में लिखा है उसके बाद भी ना तो उन्होंने अपनी टिप वापस ली और ना ही आप ने उसे हटाय |
नारीवादी लेखन के लिए ऐसे शब्द का प्रयोग करने के लिए और उसे सही ठहराने और अपने ब्लॉग से नहीं हटाने के लिए मै त्रिवेदी जी और आप की घोर निंदा करती हूं और अपना विरोध जता रही हूं | सभी से कहती हूं की किसी को कुछ कहते हुए शब्दों की मर्यादा रखिये ना मुझे गाली देने की आदत है और ना ही मुझे सुनने की अपना नीजि फ्रस्टेशन सार्वजनिक ब्लॉग पर ना निकाले |

anshumala ने कहा…

@ मैं ब्लॉगवुड में किसी से भी फोन-ई मेल या फेसबुक के जरिये संपर्क में नहीं रहता जिसे भी कुछ कहना चाहता हूँ या कोई मुझे कुछ कहना चाहता है तो इसका एकमात्र जरिया है टिप्पणी बक्सा, मेरी समझ से यही एकमात्र सही तरीका भी है...
यही बात तो मैंने भी कही है , मै भी किसी से ब्लॉग के अलावा कोई संपर्क नहीं रखती हूं यदि आप हमारी टिप्पणियों का भी जवाब नहीं देते है कोई संवाद नहीं रखते है, आप वहा भी ये कह कर बच रहे है कि समय सभी का जवाब देगा तो टिप्पणी बाक्स का मतलब ही क्या है उसे हटा दे ना, जवाब लोगों से ले ना दूसरो के सवालो का जवाब दे ब्लॉग जगत मै बहुत से लोग ऐसा ही करते है जब उनके पास लोगों के किये सवालो का जवाब नहीं होता है तो टिप्पणी बाक्स बंद कर देते है और मुझसे आप की संवादहीनता काफी समय से चल रही है एक बार वापस पलट कर अपनी पोस्टे देखीये मेरे उठाये गये सवालो और टिप्पणियों में से कितने के आप ने जवाब दिये है जबकि कुछ खास लोगों के मामूली सी टिप्पणियों पर फट से जवाब दिया है, किन्तु ये ना सोचियेगा की इस कारण मैंने आप के लिए ये सब लिखा है उससे मुझे फर्क नहीं पड़ता है यदि पड़ता तो पहले ही शिकायत कर देती लेकिन आज आप ने मेरी जैसी सही नारी पर लिखने वाली महिलाओ पर अंगुली उठाई और एक गंदे शब्द की तरफदारी की तो मुझे हर हाल में आप से जवाब चाहिए था इसलिए लिखा, मुझे पता है की मेरे ना आने से आप के ब्लॉग पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है |
@ आखिर में हम सभी को यह भी सोचना चाहिये कि दूसरा भी एक पक्ष एक तर्क रखता है और हमेशा 'हम ही' सही नहीं हो सकते...
जब आप अपने तर्क रखेंगे ही नहीं तो फिर तो हम भी स्वतंत्र है अपनी तरफ से कुछ भी सोचने के लिए

प्रवीण शाह ने कहा…

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राजन जी,

आप मेरी यह पोस्ट कृपया दोबारा पढ़ें, मैंने एक नारी के ही खिलाफ सरासर अपमानजनक व अनर्गल प्रलाप का विरोध न करने को नारीवादियों के दोहरे मानक कहा है न कि नेत्री की आलोचना को नारीवाद कहा है...


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प्रवीण शाह ने कहा…

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अंशुमाला जी,

इरादतन मेरी ओर से कभी संवादहीनता नहीं हुई है फिर भी यदि आपको ऐसा लगता है तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ...


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mukti ने कहा…

प्रवीण जी,
आप गंभीर विषयों पर लिखने वाले ब्लॉगर हैं. अक्सर आपकी टिप्पणियाँ भी सार्थक होती हैं, फिर आपने ये पोस्ट कैसे लिखी मेरी समझ में नहीं आ रहा है? यदि आपको दिव्या जी के द्वारा सोनिया गाँधी के बारे में लिखे गए शब्दों से परहेज है, तो संतोष जी के शब्दों पर क्यों नहीं, ये भी मुझे समझ में नहीं आ रहा है?
सौ बात की एक बात, अगर आप नारीवादियों पर ये आरोप लगा रहे हैं कि वे जानबूझकर ज़ील द्वारा की गयी गलतियों को अनदेखा कर रही हैं और इस प्रकार 'दोहरे मानदंड' की पोषक हैं. तो आप भी तो ज़ील की बातों पर आपत्ति प्रकट करके और संतोष जी की बातों का समर्थन करके वही कर रहे हैं.
खैर, मैं बहस नहीं करना चाहती. बस 'दोहरे मानदंडों' के लिए नारीवादियों को निशाना बनाए जाने का विरोध करती हूँ. माना कि ज़ील ने जो लिखा वो आपत्तिजनक था और किसी औरत ने विरोध नहीं किया, तो किसी पुरुष ने भी तो विरोध नहीं किया.

दिवस ने कहा…

वही पुराना ढर्रा...दिव्या के नाम पर टीआरपी कमाना।
यह भी न देखा कि पोस्ट का विषय क्या है और नारीवाद का राग अलापने लगे।
प्रवीण शाह, राजिव गांधी किसी आतंकी हमले में नहीं बल्कि उस कथित नारी की इच्छा से उड़ाया गया था जिसके विषय में दिव्या जी ने वह कविता लिखी है। और उसकी सास इंदिरा गांधी भी उस महिला की महत्वाकांक्षाओं पर बलि चढ़ा दी गयी थी। संजय गांधी (असली नाम संजीव गांधी) का हश्र भी वही हुआ था जो राजिव व इंदिरा का हुआ। विषय की जानकारी न हो तो पहले जानकारी जुटाइये न कि बिना सोचे-समझे किसी राष्ट्रवादी का ऐसा अपमान कीजिये।
और अब ऐसी नारी के लिए
"पति को, देवर को, सास को मार गयी...
कौन से नक्षत्र ले आई थी धरा पे तुम...
कालसर्प योग कब जायेगा भारत का ? "
जैसे शब्द ही प्रयुक्त किये जायेंगे।

तुम जैसे मौकापरस्त लोगों को केवल ऐसे मौकों की ही तलाश रहती है जहां किसी सकारात्मकता से भी नकारात्मकता निकाली जा सके। ये पोस्ट लिखकर तुमने कोई नारीवाद नहीं अलापा अपितु एक राष्ट्रवादी का अपमान किया व भारत देश के लिए आफत बनी सोनिया का समर्थन किया। नारीवाद-पुरुषवाद, सब एक कोने में रह गए तुमने राष्ट्रवाद को तमाचा मारने की कोशिश की है। मुझे समझ नहीं आता कि तुम लोग ब्लॉगिंग करते किसलिए हो? तुम्हारा अपना कोई उद्देश्य तो है नहीं अपितु दुसरे को भी अपने उद्देश्यों की पूर्ती में बाधा बन रहे हो।
दिव्या जी ने तो नारी का अपमान नहीं किया पर तुमने राष्ट्र का अपमान अवश्य ही कर दिया।

यदि नारी की इतनी ही चिंता है तो संतोष त्रिवेदी का "रंडापा" क्यों रास आ रहा है तुम्हे? और खुद का "विधवा विलाप" क्यों भूल जाते हो? इन शब्दों के द्वारा तो जैसे तुम नारी को सम्मान के शिखर पर पहुंचा रहे हो न?

संतोष त्रिवेदी को किसी महिला ब्लॉगर के लिए रंडापा शब्द का उपयोग नारीवाद लगता है, क्या यही शब्द वो अपनी माँ-बहन-बेटी-पत्नी के लिए प्रयुक्त कर सकता है? क्या तुम अपनी माँ-बहन-बेटी-पत्नी की बातों को विधवा विलाप कह सकते हो? शर्म आनी चाहिए।

इस प्रकार के घिनौने लेखों द्वारा नारीवाद की आड़ में अपनी खुन्नस निकालना बंद करो। सभी वादों से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद को पहचानों। देश में दुनिया भर की समस्याएं हैं, देश बर्बादी की कगार पर है। परिस्थितियाँ इतनी विकट हैं कि जीवन भर प्रयास करते रहो तब भी जीवन छोटा पड़ जाए। राष्ट्र बचेगा तो नारी स्वत: बच जायेगी।
जो स्त्री राष्ट्रवाद का झंडा उठाकर चल रही है उसे तुम जैसे नारी के कथित शुभचिंतकों से सर्टिफिकेट नहीं चाहिए।

दिव्या के नाम का खौफ कईयों को है। उन्हें भी जो उनका नाम लेकर उन पर छींटे उछाल रहे हैं और उन्हें भी जो बिना नाम लिए अपना डर दर्शा रहे हैं।

http://www.diwasgaur.com/2012/04/blog-post.html

http://www.diwasgaur.com/2012/05/blog-post_25.html

पढो इन दोनों आलेखों को। तुम जैसों के लिए ही लिखे गए हैं।

दिवस ने कहा…

अंशुमाला जी, रचना जी व रेखा जी का आभार जो आपने गलत के विरुद्ध आवाज़ उठाई। नारीवाद की आड़ में एक विदेशी नारी (जो भारत को सच में खा रही है) का समर्थन कर एक रास्ट्रवादी स्त्री का अपमान करने वाले को आपने अच्छा सबक सिखाया।

प्रवीण शाह ने कहा…

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आदरणीय दिवस जी,

बढ़िया...



Patriotism is the last refuge of a scoundrel.



...

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

...प्रवीण जी,
यही सब उसी टाइप का स्यापा है जो मैं समझाना चाह रहा था.भविष्य के लिए यह पोस्ट जिज्ञासुओं को शांत करेगी.
...जो लोग यहाँ ज़बरदस्त और ज़बरिया उपदेश पिला रहे हैं ,उन्हें यह सब नहीं दिखता कि आपके यहाँ विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता है और जिनकी हिमायत कर रहे हैं उनके यहाँ ताले बंद रहते हैं.वहाँ नाम ले-लेकर गाली-गलौज (पोस्ट में भी और टीपों में भी ) होता रहता है और इन उदारवादियों को कुछ भी गलत नहीं दिखता.इन्हें पता भी नहीं लगता और ये भी 'लोही'और बिना लाग लपेट के यहाँ-वहाँ टेसू बहाने वालों के हुजूम में शामिल होकर छाती पीटने लगते हैं.अब इसे दोहरा मापदंड मत कह देना ,प्रवीण जी !

...आप एक गंभीर लेखक हैं.मैंने इन दो दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पा लिया है,आप भी अपनी ऊर्जा वहाँ व्यर्थ न गंवाएं.

आपका पुनः आभार !

Shah Nawaz ने कहा…

पति को, देवर को, सास को मार गयी..

यह वाक्य मुझे तो कुछ वैसा ही लगा जैसा कि कुछ लोग किसी घर में कुछ भी बुरा होने पर घर की वधु को "अशुभ" समझ कर कहते हैं...

चाहे महिला को कहा जाए या पुरुष को, मैं तो किसी को भी अशुभ समझने वाले को जाहिल ही समझता हूँ...

फिर यह तो साथ में मानवधिकार हनन भी है, क्योंकि किसी के भी ऊपर बिना सबूत के ऐसे इलज़ाम नहीं लगाए जाने चाहिए...

Shah Nawaz ने कहा…

संतोष भाई को भी सलाह दूंगा कि संयम और शब्दों के चयन पर ध्यान दिया कीजिये... क्योंकि यह शब्द ही हैं जो बात को बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं...

पंछी ने कहा…

आज काफी दिनों बाद ब्लॉग जगत की सेर पर निकली... सोचा.. अब तो युद्ध पर विराम लगा होगा पर यहाँ के नज़ारे देखकर पता चला ये विराम अब कभी नहीं लगने वाला....ब्लॉग जगत की दुर्दशा करने के लिए ब्लॉगर कटिबद्ध है.... वो ये भी भूल जाते हैं कि उनका लिखा पूरे विश्व को उपलब्ध है.... जहाँ तक double standard की बात है तो मेरी तलाश जारी है शायद इस दुनिया में ऐसा कोई मिल जाये जो double standard वाला ना हो. आज से साल भर पहले जब मैंने ब्लॉगिंग कि शुरुआत की तो मैं सोचती थी मुझे तो कुछ नहीं आता ..यहाँ तो सब कितना अच्छा लिखते हैं ....धीरे-धीरे ब्लॉग जगत की असलियत पता चली...पर अपवाद सभी जगह होते हैं और यहाँ भी कुछ लोग तो ऐसे होंगे ही जो न तो किसी गुट का हिस्सा बनते हैं और न ही जिन्हें प्रभावशाली लेखन के लिए अनुचित, अश्लील शब्दों और गाली गलोच की जरुरत पड़ती है..और मेरा अनुभव तो यही कहता है कि हमेशा ऐसा लेखन ही सकारात्मक रूप से प्रभाव डालता है. नकारात्मक अनुचित शब्द हमेशा अराजकता और अलगाव ही फैलाते है उनसे सार्थक परिणाम कभी नहीं मिल सकते. अब देखिये न आप सब लोग कितने समय से एक दुसरे के पीछे पड़े है अब तक कोई सार्थक परिणाम निकला ? :)

Shah Nawaz ने कहा…

हालाँकि ऐसा विरोध मैंने वहां कभी नहीं देखा जहाँ किसी व्यक्ति विशेष के नाम के साथ इससे भी घटिया शब्दों का प्रयोग किया जाता है... और मेरी यह बात मेरे पहले कमेन्ट के समर्थन में भी है...




Shah Nawaz14 सितम्बर 2012 9:25 am
:-)

यहाँ नारी-पुरुष-धर्म-समाज-राजनीति-भाषा इत्यादि-इत्यादि से जुड़े मुद्दों पर एतराज़ करने से पहले यह देखा जाता है कि गलत लिखने वाला अपने गुट का है या नहीं!


Arvind Mishra ने कहा…

@Praveen ji,
PC par nahin hun,roman Hindi ke liye kshama kariydga:Haan nirantar zari Vidhava Vilap(purush ramahit) ka shravan kar raha hun,swamibhakt shwan bhi isme shamil ho jaate hain-interesting animal behaviour!
Yah bhi ghor aascharya ki logon ko abhidha,lakshana aur vyanjana ki saamaanya samajh bhi nahi hai-bahut afsosnak.
It is astonishing that people cant differentiate between literal and figurative meanings of the term in question and still claim to be a Banarasi :-(

Shah Nawaz ने कहा…

वैसे यह पोस्ट और इस पर आये कमेंट्स से ब्लॉगजगत के उस स्वभाव की झलक दिखती तो है जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर क्या था.... ;-)

नहीं?

पंछी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
राजन ने कहा…

प्रवीण जी,मेरा सवाल एकदम साफ है।संतोष जी ने अपनी सफाई में और आपने भी उनका पक्ष लेते हुए बिन्दू 3 में कहा है कि संतोष जी ने दिव्या जी की पोस्ट के विरोध में गुस्से में ये शब्द कहे।यदि ऐसा है तो उन्होंने अपनी पहली टिप्पणी में ये क्यो लिखा कि 'कुछ लोग नारीवाद के नाम पर...'अतः ये बात तो आप संतोष जी को समझाएँ कि जब आपने दिव्या जी की पोस्ट को नारीवाद या नारीवादी लेखन कहा ही नहीं तो उन्होंने इसे नारीवाद से कैसे जोड लिया।जाहिर है कि उन्होंने नारीवादियो के खिलाफ भडास निकाली है और बहाना बनाया दिव्या जी की पोस्ट को जबकि दोनों का कोई मेल ही नहीं है।और वैसे भी किसी भी कारण से कहा हो ये शब्द तो गलत है ही।

शब्दकोश ने कहा…

अपने मंतव्य साधने के लिये शब्दों के अर्थ अपनी सुविधानुसार बता अन्यों को भड़काने वालों के लिये
'रंडापा' का प्रचलित अर्थ यहाँ देखें।
http://dsal.uchicago.edu/cgi-bin/philologic/contextualize.pl?p.4.platts.1504682

anshumala ने कहा…

प्रवीण जी
मैंने ये सब इसलिए नहीं लिखा था की आप मुझसे क्षमा मांगे, मैंने साफ लिखा है की आज ये कह रही हूं क्योकि आज मुझे आप से एक स्पष्ट जवाब की उम्मीद है , और मुझे नहीं लगता है की आप ने मेरे लिखे को गंभीरता से लिया है, लिया होता तो क्षमा मांगने की जगह मेरे सवालो का जवाब देते जो आप ने अभी भी नहीं दिया है | इसलिए अब हम स्वतंत्र है कुछ भी सोचने के लिए इसलिए आगे उस सोच से उपजे विचारो पर सवाल न खड़ा कीजियेगा | महिलाओ को किसी बात के लिए निशाना बनाना कितना आसन होता है और किसी पुरुष की गलत बात को गलत कह उसका विरोध करना कितना मुश्किल होता है आप जैसे पुरुषो के लिए "भी" ये इस पोस्ट से पता चलता है | अब अंत में एक विनम्र निवेदन ही कर सकती हूँ की यदि आप के लिए संभव हो तो पोस्ट से नारीवादी शब्द को हटा दे नारीवादी के रूप में गाली खाना कम से कम मुझसे तो बिल्कुल भी बर्दास्त नहीं हो रहा है, क्या है जिन्हें अपनी ही घर में माँ बहन की गाली देने की आदत होती है वो ये सब हर जगह कह देते है उन्हें फर्क नहीं पड़ता है किन्तु जिन्हें कहने और सुनने की आदत नहीं होती है उन्हें बहुर बुरा लगता है |

anshumala ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
anshumala ने कहा…

धन्यवाद , की आप को भी ये शब्द बुरा लग रहा है और आप ने उसे खुल कर कहा |

anshumala ने कहा…




शाह नवाज जी
"यहाँ नारी-पुरुष-धर्म-समाज-राजनीति-भाषा इत्यादि-इत्यादि से जुड़े मुद्दों पर एतराज़ करने से पहले यह देखा जाता है कि गलत लिखने वाला अपने गुट का है या नहीं! "
आप के इस कथन से पुर्णतः सहमत हूँ ये बात हर जगह लागु होती है किन्तु आज आप ने इसे गलत जगह लिख दिया है , जिस मुद्दे , पोस्ट और जिन लोगो के लिए आप ने अभी ये लिखा है वो इस पोस्ट पर ही गलत साबित हो गया है , आप किसे नारीवादी गुट का मान रहे है दिव्या जी को जिन्होंने खुल कर कम से कम मेरा और रचना जी का नाम ले कर जम कर बुराई कर चुकी है अपनी पोस्टो में, क्या आप प्रवीण जी को हमारे गुट का ( यदि आप के तथाकथित गुट वाले मुद्दों को ध्यान में रखे तो ) नहीं मानते है जो सदा हमारे द्वारा उठाये गए नारी से जुड़े मुद्दों का जम कर समर्थन करते रहे है, जहा ईश्वर और आडम्बर के मुद्दों पर मैंने उनका सर्थन किया है वही अभी रचना जी ने असीम के मुद्दे पर , बाबा के आन्दोलन जैसे ना जाने कितने मुद्दों पर उनसे सहमत होती रही है , फिर भी हम आज हम उनके विरोध में खड़े है और दिव्या जी की कविता को गलत मुद्दे से जोड़ने पर असहमत हो रहे है जरा अपने लिखे पर फिर से विचार करे की आप कौन सी बात कहा लिख रहे है |

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

शाहनवाज जी ,
आपका आभार कि आपने मुझे संयम के लायक समझा.यह आप भी समझते हैं कि कुछ लोग अपनी खुजली मिटाए बिना नहीं मानते !

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

शाहनवाज जी,
अब वह द्विसदस्यीय गुट न रहकर त्रिसदस्यीय हो गया है.तथाकथित नारीवादी इस पर ठाहके लगा सकते हैं !

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

ठाहके=ठहाके

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

मोनिका जी,आपकी चिंताएं जायज हैं !

आनन्‍द पाण्‍डेय ने कहा…

क्षमा चाहता हूँ पर इस बात पर कुछ ज्‍यादा ही चर्चा हो गई है । यदि इसे यहीं विराम दे दिया जाए तो कदाचित यह वाद जो कि अब तक विवाद बन चुका है, यहीं समाप्‍त हो सकता है, क्‍यूँकि इस विवाद में कुछ सार दिखाई नहीं देता । बेवजह की लडाई सी हो रही है ।

अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई ने कहा…

रंडापा टाइप स्‍यापा
हंसी आ रही है
इतनी सच्‍चाई कौन लिख गया
इतनी टिप्‍पणियां हैं कि
मालूम ही नहीं चल रहा

फिर भी मेरा मानना है
सच्‍चाई ही कही गई है।

समय पास करने के लिए
आजकल ऐसी ही पोस्‍टें
लगाई जाती हैं
अपनी ऊर्जा इसी में

बहाई जाती है।

चल कलम तू कहीं और चल
लिखने को रही है मचल तो
कुछ सकारात्‍मक लिख, पर
इनमें न उलझ, इनसे न उलझ
निकल ले, कट ले
हलकट जवानी उबाल दिखाएगी
पर न हो तो बवाल ही मचाएगी।

अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई ने कहा…

रंडापा टाइप स्‍यापा
हंसी आ रही है
इतनी सच्‍चाई कौन लिख गया
इतनी टिप्‍पणियां हैं कि
मालूम ही नहीं चल रहा

फिर भी मेरा मानना है
सच्‍चाई ही कही गई है।

समय पास करने के लिए
आजकल ऐसी ही पोस्‍टें
लगाई जाती हैं
अपनी ऊर्जा इसी में

बहाई जाती है।

चल कलम तू कहीं और चल
लिखने को रही है मचल तो
कुछ सकारात्‍मक लिख, पर
इनमें न उलझ, इनसे न उलझ
निकल ले, कट ले
हलकट जवानी उबाल दिखाएगी
पर न हो तो बवाल ही मचाएगी।

अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
अविनाश वाचस्‍पति अन्‍नाभाई ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

:)

ashok suryavedi ने कहा…

यह अंत हीन बहस है नारी के सम्बन्ध में ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए कर ही दिया था तो प्रतिक्रिया के बाद क्षमा प्रार्थना सहित हटा लेना था ....... अत्यधिक विद्वत्ता का प्रदर्शन करने की कोशिश की गयी है .... नारी माँ है" अरि" नहीं है की उसके लिए तलवार भांज रहे हो रांड , रखैल छिनाल जैसे शब्द बहुत चुभन पैदा करते हैं .अगर सिर्फ वाद विवाद करने के लिए ही कुछ और किया गया होता तो मैं भी शामिल होता . लेकिन यह स्त्री की अस्मिता से जुड़ा हुआ मुद्दा है ...अतः नारी शक्ति को पुत्रवत प्रणाम कर वापिस होता हूँ .......... "सादर वन्दे "

संतोष त्रिवेदी ने कहा…


....दरअसल कुछ शब्द प्रचलन में इस तरह आ जाते हैं कि उनका प्रयोग लैंगिक आधार पर न होकर ख़ास तरह की प्रवृत्ति या शैली को लेकर होता है।रंडापा टॉइप स्यापा भी ऐसी देसज कहावत है और इसमें स्त्री,पुरुष दोनों शामिल हैं।कहने के पीछे संदर्भ और भाव देखना ज़रूरी है,पर कुछ निहित स्वार्थी लोग समग्रता में इसे लागू करने का कुत्सित अभियान चलाते हैं वो भी कथित नारीवादी बैनर के साथ । अब इस बैनर से जो नारी नहीं जुड़ी वह बिरादरी से बाहर मानी जाती है।यदि कोई मुद्दा वाज़िब है तो ऐसे बैनर की क्या ज़रूरत ?
....इसलिए ऐसे कड़वे बोल केवल दुष्प्रवृत्तियों के लिए ही हैं,पूरे समाज के लिए नहीं जिसमें नारी भी शामिल है । हाँ,ऐसे शब्दों से बचने की ज़रूरत तो फिर भी है !

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

बहुत समय बाद आज फिर से सब देखा।

वो भी क्या दिन थे!

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

बहुत समय बाद आज फिर से सब देखा।

वो भी क्या दिन थे!