शनिवार, 28 जुलाई 2012

मानस में नारी विमर्श के बहाने : मुद्दों को कालीन के नीचे दबा देने से क्या वह हल हो जायेंगे ?

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खापों का राज चल रहा है आजकल, स्त्रियों के कपड़े, मोबाइल रखने, बाजार जाने और घर से बाहर निकलने तक के बारे में फरमान सुनाये जा रहे हैं, उनके हौसले तो देखिये, अपने फरमानों को कानूनी जामा पहनाने की भी माँग कर रहे हैं यह संस्कृति के भ्रमित पहरेदार...


कुछ समय पहले क्वचिदन्यतोSपि पर एक लेखों की सीरिज लेकर आये अरविन्द मिश्र...


नारी सब दुखों की खान है -बोले सियावर रामजी!


का न करै अबला प्रबल?.....


मानस में नारी विमर्श:समापन पोस्ट


जो प्रतिक्रियायें आयीं वह भी रोचक थी, लेकिन सबसे रोचक प्रतिक्रिया थी धर्ममंडकों यानी Apologists की, पहली पोस्ट में तो उन्होंने किसी खास संदर्भ में लिखे को देखने की बात कह, शब्दजाल बुन, व शब्दों व शब्दों के बीच कोमा-फुलस्टॉप की चीरफाड़ कर तुलसी के लिखे को सही ठहराने की कोशिश की...


पर दूसरी पोस्ट में अरविन्द मिश्र जी ने कमाल कर दिया... वह मानस में गोता लगाकर विभिन्न पात्रों द्वारा नारी के विषय में नारी निंदक उद्गार व्यक्त करते हुऐ उद्धरण उठा लाये, फिर क्या था, एक मामले में तो बैटिंग की जा सकती थी पर यहाँ तो पूरे १३ उद्धरणों की बात थी... फिर क्या था तौबा-तौबा करते हुऐ धर्ममंडक यानी Apologists आस्था आदि का हवाला दे या एकाध तुकबंदी सी सुना पलायन कर गये...


मेरा मानना यह है कि आज जो भी सामाजिक समस्यायें हमारे बीच हैं चाहे जातिवाद हो या स्त्री के अधिकारों का दमन... कहीं न कहीं धर्म एक आधार देता है इस प्रकार की मनोवृत्तियों को... और इस सब पर बहस से कतराते हैं हम लोग... धर्म पर चिंतन के मामले में जड़ता के शिकार हैं हम, और असहज करते सवालों को कालीन के नीचे दबा देना चाहते हैं...




आज का मेरा सवाल है...


मुद्दों को कालीन के नीचे दबा देने से क्या वह हल हो जायेंगे ? 





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21 टिप्‍पणियां:

  1. प्रवीण
    धर्म इस की क्या परिभाषा हैं , इसको क़ोई बता दे फिर आगे बात की जाए
    धर्म ग्रन्थ जब लिखे गए तो महज किताब थी
    अब मै एक हिन्दू परिवार में पैदा हुई पली बढी , वहाँ के संस्कारों को जाना , पिता कट्टर "पोंगा पंडित " विरोधी , ईश्वर के अस्तित्व को ना मानने वाले . माँ उनके समान शिक्षित बराबर से नौकरी करती हुई पर सनातन धर्म को अपने जीवन में जीती लेकिन "पाखण्ड विरोधी " होते हुए भी कन्या जीमाती , अपने पितरो को ब्रह्मिन के उदर से खाना भेजती . क्यूँ क्युकी नारी का काम था "धर्म" की रक्षा करना .
    पर उनकी क़ोई भी बात उन्होने अपने तक सिमित रखी क्युकी ये उनकी आस्था का पर्सनल मामला था कभी भी उन्होने इसको अपनी बेटियों या बहू पर लागू नहीं किया .
    आज हम अपनी समझ से अपनी आस्था से जी रहे हैं . मानस इत्यादि पर बहस करना मुझे गैर जरुरी लगता हैं क्युकी कुछ लोगो की पर्सनल आस्था उस से जुड़ी हैं . वैसे ही मेरे लिये कुरआन पर बहस करना या बाइबल पर बहस करना गैर जरुरी हैं .
    बहस होनी चाहिये की इन सब ग्रंथो में जो लिखा हैं क्या "वो हमारी सोच " हैं
    अगर हमारी सोच हैं तो इनमे लिखी हर बात को हम क्यूँ नहीं पत्थर की लकीर मानते हैं .
    if we follow one line , why dont we follow all the lines of that book .
    if one wants a sita in every woman , then one needs to have a ram in every man
    पर आप का प्रश्न ये है ही नहीं आप तो धर्म / ईश्वर की वैधता पर बहस चाहते हैं शायद ही क़ोई करे क्युकी धर्म सबका हैं आप का भी हैं "फौजी धर्म " उस पर आप भी बहस नहीं कर सकते , उस किताब का हर पन्ना आप को रटा दिया गया हैं और "कोर्ट मार्शल " होगा ना मानने पर .
    बस जहा से इतना लम्बा कमेन्ट शुरू किया
    "धर्म क्या हैं " इस को परिभाषित कर दे

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  2. मुद्दों को कालीन के नीचे दबा देने से क्या वह हल हो जायेंगे ?

    nahin lekin pehlae likhane , behas karvaane waalo kaa mudda to clear ho
    mudda kyaa haen , kyun haen bhi jaruri haen vimarsh sae pehlae

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  3. सही कहा प्रवीण जी,

    धर्ममंडक धर्म मण्ड़न करने की बजाय पलायन कर गए!!

    और हमारे हाथ से धर्मनिंदा का अवसर ही फिसल गया :)

    ये धर्म थोपते क्यों नहीं? घेरा कैसे जाय???

    कोई बात नहीं धर्म मण्ड़न से पलायन को आधार बनाकर, इस धर्म की ऐसी तैसी कर दी जाय, क्यों :)

    समस्या यह है कि लोगों को धर्मविमुख बनाने के लिए भी चर्चा में धर्म-जाप की विवशता है। बिना उसके उल्लेख या महत्व दिए धर्मनिंदा भी तो नहीं हो पा रही।

    द्वेषवश मरा मरा रटते कब राम राम प्रेरणा हो जाती है पता भी नहीं चलता। :)

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  4. मुद्दों पे केवल बहस करने से क्या वो समस्याएं हल हो जाएंगी? न कालीन के नीचे दबाव और न केवल बहस करो| तर्क दो और बात करो जिस से उसे लोग मने भी |

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  5. समस्याएं हल चाहती हैं। इन्हें क़ालीन के नीचे दबाने से वे हल नहीं होंगी। इन्हें छींके पर लटकाना पड़ेगा या हो सकता है कि कुछ और करना पड़े लेकिन उससे पहले निष्पक्षता और तार्किकता ग्रहण करना ज़रूरी है।
    ग़लत बात धर्म नहीं होती। इसलिए धर्म में ग़लत बात नहीं होती। जो सच और सही है, जो कल्याणकारी और शुभ है। वही धर्म है।

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  6. आप बाहर निकाल कर बहस, चर्चा, शस्त्रार्थ कुछ भी कर ले तो भी नहीं हल होने वाले है , आप किसी की घटिया सोच मानसिकता कभी नहीं बदल सकते है , लोगो को ग्रंथो में लिखी ऐसी ही बात दिखाई देती है पूरे ग्रन्थ में जो राम का चरित्र है वो किसी को नहीं दिखता है उसका पालन क्यों नहीं करते है लोग उसका एक अंश भी अपना ले तो स्त्री काफी सुरक्षित हो जाएगी समाज में , पर यहाँ तो सब रावण के शिष्य बने पड़े है, दूसरो के कंधे पर रख कर बन्दुक चलाते है |

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  7. "आप किसी की घटिया सोच मानसिकता कभी नहीं बदल सकते है"
    ऐसी ही बयानबाजी ही एक घटिया सोच है!
    मैं तो अभी भी विमूढ़ता की स्थिति में हूँ -ईश्वर को मानता नहीं अन्यथा उनसे ही गुहार लगाता-
    उबारो प्रभु मुझे इस घटाटोप से ..राह दिखाओ प्रभु!
    मेरी आदत साझा करने की है जो कुछ भी अल्प ज्ञान पाता हूँ -समाज को अर्पित कर देता हूँ.....जिस समाज ने मुझे झेला बड़ा किया है -
    त्वदीयं वस्तु गोविन्दम तुभ्येव समर्पयामि ....
    इहाँ न पक्षपात कछु राखहुं वेद पुरान संत मत भाखउं
    रहा आपका प्रश्न तो सामाजिक व्यवस्थाएं कला सापेक्ष है कोई अंतिम सत्य नहीं ....
    मानस जैसे ग्रंथों में बहुत कुछ लम्बे समय -सैकड़ो काल के प्रेक्षण के ज्ञान के ज्ञान के निचोड़ हैं ...
    उदाहरणार्थ -जिमि सुतंत्र भई बिगरहिं नारी ....कहा गया है .....हो सकता है यह हजारो साल का प्रेक्षण हो ? :-)
    इस कथन को मेथड आफ साईंस पर बिना परखे हम कैसे इसका प्रतिकार कर सकते हैं ??
    आप ही बताईये -कब तक हम इसे कालीन की भीतर दबाये रखेगें -आईये हम इस आर्ष वाक्य को विज्ञान पद्धति पर
    परखते हैं -आप एक्पेरिमेंटल डिजाईन तैयार करेगें ,मैं या रचना जी या अंशुमाला जी? ...मैं इसका उत्तर कुछ समय बाद दे सकूंगा ------प्रेक्षण चल रहा है और यहीं ब्लॉग जगत के सैम्पुल पर चल रहा है ! :-)
    तो फिर जब तक इसे विज्ञान पद्धति से रिजेक्ट न कर दें ......कैसे इसका खंडन कर सकते हैं ?

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  8. *कला सापेक्ष नहीं काल सापेक्ष

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  9. प्रश्न आपका बहुत प्रेरक है, कुछ लिखने की इच्छा जाग गई...हो सकता है मैं डिटूर ले रही हूँ...लेकिन कुछ कहना ज़रूर चाहूँगी...
    धर्म और धर्मपुस्तक दो अलग चीज़ें हैं...
    धर्म क्या है...संस्कृति और आध्यात्म का समन्वय ही धर्म है,
    आध्यात्म क्या है...?? सच्ची प्रार्थना और शुद्ध भाव, जिसके लिए आपका अन्तःकरण आपको प्रेरित करेगा, जिससे आपका जीवन न्याय और नीतिपूर्ण होगा...
    संस्कृति क्या है.. ?? संस्कृति में इतिहास, भूगोल, रीति-रिवाज़, प्रथाएं, परम्पराएं, भाषा, खान-पान सभी निहित होते हैं, जो देश, काल और समय के अनुसार बदलते भी रहते हैं...
    लेकिन अध्यात्म वही रहता है...
    समस्या तब तक नहीं आती, जब तक आध्यात्म सर्वोपरि होता है, जब संस्कृति आध्यात्म को डोमिनेट करने लगती है, समस्याएं शुरू हो जातीं हैं...गौर से देखिये तो हमेशा झगडा, पूजा-पाठ, तीज-त्यौहार, मंदिर-मस्जिद का ही है, जो कर्म-काण्ड के अंतर्गत आता है, आध्यत्म का झगडा नहीं है...
    व्यक्तिगत रूप से मैं, धार्मिक पुस्तकों को आवश्यक नहीं समझती..धर्म की व्यापकता इतनी है कि किसी भी पुस्तक में उनको नहीं समोया जा सकता...गौर से देखा जाए तो इन पुस्तकों ने ही, संसार का सारा बेडा गर्क किया हुआ है...
    लोग भूलते हैं कि ये पुस्तकें कब और किसने, किस परिवेश में लिखी है ....चंद लोगों द्वारा लिखी गयी पुस्तकें, जिनमें उनके अपने व्यक्तिगत व्यूज हैं, आज अरबों की आबादी को चला रहे हैं...
    तुलसीदास जी को ही लें, वो एक अकेले व्यक्ति, जिन्होंने मुगलकाल के सामजिक परिवेश में, रामचरित मानस (जो एक पटकथा है ) लिखी, उनकी मानसिक स्थिति क्या थी, उनके हालात क्या थे, वो ज़माना क्या था, उस ज़माने में स्त्रियों की क्या दशा थी, उनका अपना व्यक्तिगत अनुभव क्या था...ये सएया बाहरी माहौल, किसी के भी लेखन पर असर करता है.....एक व्यक्ति के द्वारा लिखी हुई बातें, कुछ सही हो सकतीं हैं, लेकिन ये मान लेना कि उनके सारे विचार सही थे, कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है,
    कुरआन को ही लीजिये, जिस तरह की बातें उसमें लिखीं गयीं हैं, वो उस ज़माने के कबीलों में रहनेवालों की ज़िन्दगी के लिए शायद, सही रहा होगा, हो सकता है स्त्रियों और पुरुषों को अनुशासित करने के लिए और कोई दूसरा तरीका भी शायद नहीं होगा, अगर आप उस समय के कबीले की ज़िन्दगी, उस समय की सोच के बारे में सोचते हुए, कुरआन को देखेंगे तो बहुत कुछ फिट होता है, लेकिन वही कुरआन आज, इस युग में आकर, ऐसे समाज में रह कर, कहीं से फिट नहीं बैठता...बाइबल का ओल्ड टेस्टामेंट अगर आप पढ़ें तो वितृष्णा हो जायेगी, उसमें जिस तरह की बातें लिखी गयीं हैं, आज के समाज में उन बातों को, उन रिश्तों को बिलकुल स्वीकार नहीं किया जाएगा...

    इन सभी धार्मिक पुस्तकों का आज सिर्फ इतना ही महत्त्व है, इनमें वर्णित पात्रों को सिर्फ श्रद्धा-भक्ति देना, और उनको एक कम्पार्मेंट में रख देना, इन पात्रों का पूरी तरह अनुसरण हम चाहे तब भी नहीं कर सकते, क्योंकि, वैसा न तो परिवेश है, न ही ज़रुरत...
    अध्यात्म की ओर ले जाने के लिए हमें इन पुस्तकों की नहीं, अंतःकरण की ज़रुरत है...और अगर सच्ची प्रार्थना, शुद्ध मन, न्याय और नीतिपूर्ण जीवन हो तो फिर कालीन के नीचे रखने के लिए कुछ रहेगा ही नहीं...
    अन्यथा, एक उदाहरण जो नारी निंदा की ली गयी है, या नारी की सदियों से जो बुरी हालत है, वो या तो इन पुस्तकों से प्रेरित है, या संस्कृति के ढकोसले के नाम पर है,
    जब तक हम इन पुस्तकों में लिखी गयी बातों को ब्रह्म वाक्य समझते रहेंगे और जब तक संस्कृति को पुरुष समाज, अपने मन मुताबिक़ रंग-रोगन लगा कर, आध्यत्म को लंघा कर खाप पंचायत जैसी संस्थाएं बनाता रहेगा..कालीन के नीचे आपको नीरीह मुद्दों के शव मिलते रहेंगे...
    आपका धन्यवाद..

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    1. अदा जी, आपने अपने लेख में सारी ही धार्मिक और अधार्मिक पुस्तकों को बिना पढ़े एक ही पल्ले में रख दिया है. जो कि नियाय संगत नहीं है! हो सकता है कि नीचे दी गयी जानकारी आपके लिए बहुत उप्योगी हो और आपके जीवन को सफल बनाने में सहायक हो :
      धर्म : इश्वर के आदेशों को अपने जीवन में धारण करने का नाम धर्म है. इस के सिवा कुछ भी धर्म नहीं है!
      धर्मीं ग्रन्थ : जिस तरह इश्वर ने हमारी सारी भोतिक आवश्यकताओं कि पूर्ति के लिए सारी चीज़ें पैदा कि हैं, उसी प्रकार उसने हमारे मार्ग दर्शन के लिए समय समय पर अपने संदेष्टाओं / नबी / पेगेम्बेर के माध्यम से अपने ग्रंथों को अवतरित किया है. जिससे हम इश्वर कि सिरिष्टि निर्माण योजना को समझ सकते हैं, इस जीवन के उद्देश्य को समझ सकते हैं और इस उद्देश्य को पूरा करने के सत्ये मार्ग को पहचान सकते हैं, और उस मार्ग पर चल कर अपने इस जीवन को सफल बना सकते है!
      इश्वर की ओर से जो भी ग्रन्थ अवतरित हुए हैं उन सब में अंतिम ग्रन्थ कुरान के सिवा सरे ही ग्रंथों में पाखंडी लोगों ने छिपकर या मिलावट कर के सच्चे धर्म को लोगों से छिपा लिया! केवल कुरान ही एकमात्र इश्वार्ये ग्रन्थ है जो आज भी अपने मूल रूप में सुरक्षित है, और पिछले डेढ़ हज़ार साल का इतिहास इस बात की पुष्टि करता है! इसलिए कुरान की तुलना किसी भी मानव रचित ग्रन्थ से नहीं कि जा सकती!
      अतः आपसे निवेदन है कि पहले आप कुरान को धियान पूर्वक पढ़ें, अपनी बुध्दि की आँखें खोलें, इस सिरिष्टि में विचार करें, अपने आप को देखें और उस महान इश्वर कि कल्पना करे जो इस पूरी सिरिष्टि का रचने वाला है! फिर सोचें कि उस इश्वर के आदेशों को मानने में हमारी सफलता है या उसके आदेशो कि अवहेलना करने में!
      कुरान का हिंदी अनुवाद प्राप्त करने के लिए देखें www.goodwordbooks.com If you study and understand Quran with an unbiased mind, your perception towards this life and its purpose will change forever, and you will discover what you have never imagined and seen in any human written books and philosophies.

      हटाएं
  10. प्रवीण शाह जी

    आप को क्या लगता है की इस तरह की पोस्ट बस यु ही अचानक आ गई जी नहीं ये यु ही नहीं आई है इसके पीछे करना है जरा ये देखीये |
    अपनी बेटी का ख्याल आया तो दिल कांप गया चर्चाकारः अनूप शुक्ल गोवाहाटी कांड पर

    http://chitthacharcha.blogspot.in/2012/07/blog-post_13.html

    वहा पर इनकी टिप्पणी देखीये
    Arvind MishraJuly 13, 2012 8:55 AM

    ये घटनाये पूरे समाज का आईना नहीं दिखाती
    मगर इनकी मीडियाई प्रस्तुति ऐसा ही दिखाती है
    जैसे सारा भारतीय समाज ऐसा ही हो उठा हो ..
    आपने भी बहती गंगा में आचमन कर लिया
    और एक शेर की पिटी पिटाई लाईन यहाँ
    झोक दी -कुछ लोगों की भावनाओं को दुलराने के लिए
    पूरे संदर्भ को देखा जाना चाहिए -
    और मौका हो ,उद्दीपन हो तो कई "सभ्य" के दिलों
    में धड़कता वन मानुष उठ खड़ा होगा -
    पुलिस व्यवस्था .कमीने पत्रकार जिम्मेदार हैं और इसे चाशनी बनाकर
    प्रस्तुत करने वाले लोग

    इस पर मैंने टिप्पणी दी

    एक घटना होती है और समाज के अनेक बयान बहादुर हाजिर हो जाते है बयान देने के लिए जैसे यहाँ पर है एक छोटे से ब्लॉग जगत में हम महिलाओ के अपमान को चुपचाप देखते है आपसी घटना बता कर चुप रहने में ही भला समझते है और इस घटना पर बवाल मचाते है | पर समाज की असली सोच क्या है वो भी इस चर्चा मंच में दिख रही है जरा एक तथाकथित महान विद्वान् की राय यही पर देख लीजिये पता चला जायेगा |

    अदा जी ने मुझे ये उत्तर दिया

    अदाJuly 14, 2012 5:42 PM

    राय तो हम सब देख ही रहे हैं अंशुमाला जी..
    कुछ नज़रें ऐसी भी हैं, जिनके लिए यह घृणित कृत्य है ही नहीं, यह तो चाशनी में डूबी हुई मात्र एक ख़बर है, और जिसकी औक़ात बस एक चटखारे भर की है...
    भारत एक महान देश है, जहाँ तकरीबन २० भाषाओं में, सैकड़ों अख़बार प्रतिदिन लाखों (शायद करोड़ों हो ) की तादाद में प्रतियां छपतीं हैं...और हर अख़बार का हर कोना, हत्या, लूट, राहजनी, भ्रष्टाचार, बलात्कार, अपहरण से ही भरा होता है...सिर्फ़ एक दिन का कोई भी अख़बार कोई भी उठा ले तस्वीर मिल जायेगी...भारत की इस छवि के लिए कौन जिम्मेदार है ?
    और क्या यह छवि कभी बदलेगी ??
    हम जैसे लोग, जो बाहर रहते हैं, कई बार सोचते हैं, कि वापस आकार हमने जो भी सीखा है, अपने छोटे तरीके से ही समाज में योगदान दें...लेकिन हर बार ऐसी घटनाएं हमारे कदम रोक देतीं हैं...लगता है, वहाँ ऐसे भय में रहने से लाख बेहतर है, यहाँ के शांत-सुखद वातावरण में रहना...रोज़ सुबह अपनी बच्ची का मुँह देखती हूँ और भगवान् को धन्यवाद देती हूँ, कि वो सुरक्षित है | कम से कम यहाँ आए दिन ये सब तो नहीं देखना पड़ता है..

    और घुघती जी ने इनको ये प्रति उत्तर दिया

    Mired MirageJuly 19, 2012 7:31 PM

    बन्धु, बेशरम न होकर लज्जा को ओढ़ पहन कर आपको, हमें व हमारे समाज को इस खबर को छिपा लेना चाहिए था। बेहतर तो यह होता कि जिसपर यह कहर टूटा उसे अपना चेहरा, अपने अस्तित्व को छिपा लेना चाहिए था, न, न, उसे तो आत्महत्या कर लेनी चाहिए थी ताकि समाज का इतना कुरूप चित्र समाज को देखना ही न पड़ता। हमें तो अपने सुन्दर, पुराने, वैदिक समाज का सुन्दर व काल्पनिक चित्र को ही दर्पण के सामने रख सच कह संसार को दिखाना चाहिए। कुरूप चेहरे को तोड़ देना चाहिए। भला यह भी कोई बात हुई कि पल भर को हम वनमानुष हुए और आप हमारी फोटो खींच संसार को दिखा दें? वे फोटो क्या हुईं जब हम मातृवंदना कर बलात्कार की मन ही मन तैयारी कर रहे थे? वे फोटो संसार को दिखाइए ना! और कहिए कि यत्र नारी पूजयन्ते... ब्ला ब्ला ब्ला....
    घुघूती बासूती

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  11. मैंने अपनी पहले से लिखी पोस्ट में इनकी इस टिप्पणी का जिक्र किया

    यदि मौका हो ,उद्दीपन हो, भड़काऊ तत्व हो तो कई "सभ्य" के दिलों में धड़कता पुरुष जानवर पैजामे से बाहर आएगा ही

    http://mangopeople-anshu.blogspot.in/2012/07/mangopeople_13.html

    इस पर रश्मि जी ने ये टिप्पणी दी
    rashmi ravijaSat Jul 14, 06:46:00 PM
    हमने पोस्ट में उन महान शख्सियत के कमेन्ट का जिक्र देख लिया था और समझ भी गए थे...कोई उनसे पूछे..उन्हीं आधुनिक कपड़ों में, लडकियाँ अगर आपके मित्र की होती हैं..रिश्तेदार की होती हैं....या फिर जब आप महानगरों में जाते हैं तो बड़े होटल..ऑफिस में मिल जाती हैं तब तो आपके भीतर का जानवर नहीं जागता...जहाँ किसी अकेली लड़की को असुरक्षित जगह देखा...झट से जाग जाता है...बड़ा डरपोक जानवर है...कम से कम जानवर भी तो कोई शक्तिशाली पालो...कि जहाँ भी ऐसी लडकियाँ दिखे, झट से जाग जाए..और फिर आपको पागल समझकर पागलखाने में बंद कर दिया जाए.
    क्यूंकि जो लोग अपने भीतर जानवर लिए घूमते हैं..वे सभ्य समाज में रहने के लायक तो हो ही नहीं सकते .
    ना केवल टिप्पणी दी बल्कि पोस्ट भी लगाई
    http://rashmiravija.blogspot.in/2012/07/blog-post_16.html
    अब वहा पर आई टिप्पणी आप खुद ही पढ़ ले जो सभी नारियो ने दिया था |

    उत्तर देंहटाएं
  12. इतनी नारियो से इतना कुछ अपने बारे में सुनने के बाद इन्हें नारी नरक का द्वार ही दिखेगी और ये कहने के लिए सहारा लिया तुलसी दास जी का सीधे अपनी बात कहते तो कई और लोगों से इससे कही ज्यादा सुनना पड़ता फिर भी बच नहीं सके इनकी पोस्ट पर आई टिप्पणिया खुद ही बता देती है की कितने लोग इनके विमर्श से कितना सहमत है ये माने नहीं वो अलग बात है | वैसे किसकी सोच क्या है और कितनी घटिया है ये सारा ब्लॉग जगत जानता है , उदाहरन के लिए उनकी पोस्ट पर आप की टिप्पणी जिसमे आप ने भी एक इशारा किया है इस पोस्ट के आने के कारण पर | मै तो धन्यवाद कहती हूं की मुझे तो इन्होने बस इतना ही कहा की "ऐसी ही बयानबाजी ही एक घटिया सोच है!" वरना तो सारा ब्लोग जगत जानता है की जब ये अपने स्तर पर आते है तो नारी के लिए क्या क्या शब्द बोलते है :)

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  13. अरविंद मिश्र जैसे के बारे में कुछ भी कहना बेकार है सबको पता है कि इसके विचार खापप्रेमियों जैसे ही रहे है.खैर ऐसे लोगों के बारे में कुछ भी कहना मतलब अपना ही मूड ऑफ कर लेना.
    पोस्ट के विषय में अदा जी की ये बात बिल्कुल सटीक है-गौर से देखिये तो हमेशा झगडा, पूजा-पाठ, तीज-त्यौहार, मंदिर-मस्जिद का ही है, जो कर्म-काण्ड के अंतर्गत आता है, आध्यत्म का झगडा नहीं है...

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  14. http://chitthacharcha.blogspot.in/2012/07/blog-post_23.html
    see this link
    see the history of why and when what happened

    उत्तर देंहटाएं
  15. praveen ji - i came here earlier, but somehow missed commenting.

    you have asked us many questions , now i ask you one - do crimes against the women / cruelties to the weaker sections of society / oppression and denial of rights to the poor - do these things happen only in "religious societies" so to say? do these things not happen in the "nonbeliever societies"

    take an example - the russia before it broke and the china of today are the best examples of "officially declared non believers" - and the USA is a declared religious country . Even the dollar note is printed with "... the name of god .. "

    since you are saying that the roots of oppression and cruel behavior are somewhere in "religiosity", can you explain the difference is the level of cruelty in the russian and the american societies ?

    i am not sure you will answer this or not - but dont try to "sweep it under the carpet" as you are saying the "धर्ममंडक यानी Apologists " did at kvachidanyatoapi ...

    no - i don't think the roots to cruelty and oppression are in religion nor in non believing. it is in the inherent human nature to decide whether to be cruel or kind, selfish or compassionate.

    whenever and wherever any "wanted / desired things" are less in "availability" than in "demand", the simple rule of demand and supply will work { the desired thing may be as basic as "roti kapda makan" or as subtle as the thirst to be followed / obeyed / respected / revered }

    these fights / injustices / cruelties will exist, because fundamentally it is a fact that some people ARE stronger and others are weaker - either physically / mentally / socially / financially or in any other way. so when it comes to "grabbing" what "I" want from others who have or do not have it, then whether I am strong or weak will decide my fate in the situation.

    The solution is utter selflessness of every single strong person in society, which is an impossibility - and both of us - (not just you and me but believers and nonbelievers) know it.

    IF a person is afraid of some unknown "god" so to say and of a judgement beyond that rendered by the "masters" ruling the "society" at that particular era of time, the chances of the stronger oppressing the poor may be a bit (just a teeny weeny little bit) reduced.

    i do not think the solution lies in either blindly accepting , or equally blindly denying an imagined god, or in shifting the blame to a god one doesn't even believe exists. IF a person truly believes there is no god, then his responsibility to work towards an improvement in the existing conditions increases many fold. making fun of the "believers" or laughing at the situation of the weaker / oppressed is not a very app laudable course of action for someone who anyway says that there is no god.

    thanks, and no hard feelings

    उत्तर देंहटाएं
  16. .
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    .
    Respected Shilpa ji,

    First and foremost I would like to assure you that i never harbor any hard feeling for a different opinion.

    My question here is " क्या मानस के विभिन्न पात्रों ने अलग अलग मौकों पर ऐसे उद्गार व्यक्त नहीं किये हैं जिन्हें नारी निन्दा की श्रेणी में रखा जा सकता है ?"
    If it is true than it should be accepted and one should say that despite this I consider a particular character as incarnation of God because of my faith.

    Religion got created to maintain 'Status Quo', and, to perform this function it reinforces certain beliefs through its texts. Either you revise these texts or you realign your beliefs, if mankind is not ready to do this, then, i do not forsee any remarkable progress toward the ultimate human goal of 'Equality for all'.

    Thanks... :)



    ...

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. @ My question here is " क्या मानस के विभिन्न पात्रों ने अलग अलग मौकों पर ऐसे उद्गार व्यक्त नहीं किये हैं जिन्हें नारी निन्दा की श्रेणी में रखा जा सकता है ?"
      If it is true ...

      yes - it is true :) not only about "naris" - but about other groups too. and at other places the opposite "udgars" too towards the very same categories...

      But not from the mouths of the so labelled "avtars" - the quotations are oft quoted out of context to suit the need or mindset of the person quoting them.

      eg - if i (a woman / mother ) want to compare men versus woman position - i will quote rama as saying to lakshmana (before going to the jungle) that if the orders of FATHER and MOTHER clash - one has to follow the mothers commands - because HER position is higher. BUT it will be purposely quoted out of context to suit my viewpoint. :)

      hence - yes , yes - it is true :) that the books say a lot of things about a lot of categories and classes of people,
      ---- which DOES NOT go to say that it is acceptable and need not be changed according to the need of the era. there is nothing like the "last book" or "last message" or last messenger etc in this context :)

      हटाएं
  17. प्रवीण, मैं सोचती हूँ कि मुद्दों को बाहर धूप व हवा में लाएँ, झाड़ें, पोछें, चमकाएँ। फिर हर कोण से उनका निरीक्षण करें, उन्हें जाँचें, परखें। उनपर बार बार बात करें। उन्हें टैबू न बनाएँ। यदि बात किसी व्यक्ति, जाति, विशेष श्रेणी या वर्ग के लोगों की, जैसे स्त्री की हो तो अपने आपको उसके स्थान पर रखकर देखें। जो अन्य के लिए निर्धारित कर रहे हैं उस व्यवस्था या स्थिति में स्वयं को भी रखकर देखें।
    मुद्दों को यदि कालीन के नीचे दबाते जाएँगें तो एक दिन उस ऊबड़खाबड़ कालीन पर पैर अटकेगा और स्वयं ही औंधे मुँह गिरेंगे।
    घुघूती बासूती

    उत्तर देंहटाएं
  18. मेरी टिप्पणी कहाँ? कालीन के नीचे? :(
    घुघूतीबासूती

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