शनिवार, 28 जुलाई 2012

मानस में नारी विमर्श के बहाने : मुद्दों को कालीन के नीचे दबा देने से क्या वह हल हो जायेंगे ?

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खापों का राज चल रहा है आजकल, स्त्रियों के कपड़े, मोबाइल रखने, बाजार जाने और घर से बाहर निकलने तक के बारे में फरमान सुनाये जा रहे हैं, उनके हौसले तो देखिये, अपने फरमानों को कानूनी जामा पहनाने की भी माँग कर रहे हैं यह संस्कृति के भ्रमित पहरेदार...


कुछ समय पहले क्वचिदन्यतोSपि पर एक लेखों की सीरिज लेकर आये अरविन्द मिश्र...


नारी सब दुखों की खान है -बोले सियावर रामजी!


का न करै अबला प्रबल?.....


मानस में नारी विमर्श:समापन पोस्ट


जो प्रतिक्रियायें आयीं वह भी रोचक थी, लेकिन सबसे रोचक प्रतिक्रिया थी धर्ममंडकों यानी Apologists की, पहली पोस्ट में तो उन्होंने किसी खास संदर्भ में लिखे को देखने की बात कह, शब्दजाल बुन, व शब्दों व शब्दों के बीच कोमा-फुलस्टॉप की चीरफाड़ कर तुलसी के लिखे को सही ठहराने की कोशिश की...


पर दूसरी पोस्ट में अरविन्द मिश्र जी ने कमाल कर दिया... वह मानस में गोता लगाकर विभिन्न पात्रों द्वारा नारी के विषय में नारी निंदक उद्गार व्यक्त करते हुऐ उद्धरण उठा लाये, फिर क्या था, एक मामले में तो बैटिंग की जा सकती थी पर यहाँ तो पूरे १३ उद्धरणों की बात थी... फिर क्या था तौबा-तौबा करते हुऐ धर्ममंडक यानी Apologists आस्था आदि का हवाला दे या एकाध तुकबंदी सी सुना पलायन कर गये...


मेरा मानना यह है कि आज जो भी सामाजिक समस्यायें हमारे बीच हैं चाहे जातिवाद हो या स्त्री के अधिकारों का दमन... कहीं न कहीं धर्म एक आधार देता है इस प्रकार की मनोवृत्तियों को... और इस सब पर बहस से कतराते हैं हम लोग... धर्म पर चिंतन के मामले में जड़ता के शिकार हैं हम, और असहज करते सवालों को कालीन के नीचे दबा देना चाहते हैं...




आज का मेरा सवाल है...


मुद्दों को कालीन के नीचे दबा देने से क्या वह हल हो जायेंगे ? 





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गुरुवार, 19 जुलाई 2012

क्या 'ब्लॉगवुड' आबाद रहने के लिये 'आइटम' पर निर्भर हो गया है ?

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इस १६ अगस्त को तीन साल अपने भी हो जायेंगे ' ब्लॉगवुड ' में...


एक पैटर्न देखा है शुरू से... जब कभी कोई विवाद चल रहा होता है, चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक, या फिर किसी खास ब्लॉगर या समूह के खिलाफ लामबंद हो बहिष्कार-बहिष्कार का खेल खेला जा रहा हो... अचानक से सोये पड़े ब्लॉगवुड में एक जान सी आ जाती है... खूब पोस्टें आती हैं, पाठक बढ़ते हैं, टिप्पणियाँ गति पकड़ लेती हैं, कुल मिलाकर वीराने में रौनक सी आ जाती है... और जब कहीं कोई विवाद नहीं हो रहा होता तो एक किसिम की वीरानगी सी आ जाती है अपने ब्लॉगवुड में... :(


क्या मेरी तरह आपको भी नहीं लगता कि 




क्या 'ब्लॉगवुड' आबाद रहने के लिये विवाद रूपी ' आइटम ' पर निर्भर हो गया है ?














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सोमवार, 2 जुलाई 2012

क्या हम एक ईमानदार मुल्क हैं ?










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भ्रष्टाचारी का आत्मविश्वास तगड़ा है यह कहते हैं सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी , उनका मानना है कि अब हमारा समाज कदम-कदम पर भ्रष्टाचार से सामना होने पर कतई विचलित नहीं होता, वे सवाल करते हैं कि क्या हमारा समाज 'सादा जीवन उच्‍च विचार' का मंत्र भूलता जा रहा है?



इस पर मेरा आकलन यह है कि खुशामद, सिफारिश, बखशीश व घूस यही चार चीजें ही तो हैं जो हिन्दुस्तान को चला रही हैं सदियों से... ईमानदारी व ईमानदार आदमी का पाया जाना यहाँ हमेशा से अपवाद रहा है...



आप क्या कहते हैं इस बारे में...




क्या हम वाकई एक ईमानदार मुल्क हैं ?
 
 
 
 
 
 
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