शुक्रवार, 15 जून 2012

क्या २१वीं सदी के भारत को इस सजावटी-रस्मी (Ceremonial) पद की कोई जरूरत है, अब भी... ???

.
.
.




 





पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर जिन ममता बनर्जी से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल केन्द्र से अपने राज्य के लिये एक बेहतर आर्थिक पैकेज लेने में करेंगी... परंतु अपने अपूर्वानुमेय (unpredictable) स्वभाव का एक और नमूना दिखाते हुऐ दीदी ने अपनी सनकों व अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद को राज्य के हितों से बढ़कर मान राष्ट्रपति चुनाव को गर्मा दिया है...


फिर भी अपना आज का सवाल यह नहीं कि राष्ट्रपति के तौर पर कौन बेहतर उम्मीदवार है, प्रणव दा या कलाम साहब...


मेरा कहना है कि, क्योंकि राष्ट्रपति का यह पद बहुत हद तक ब्रिटेन की राजशाही की तर्ज व नकल पर एक सजावटी व रस्मी (Ceremonial) राष्ट्र प्रमुख (State Head) के तौर पर बनाया गया है... जिसके पास खुद के कोई अधिकार नहीं... वह चुनी हुई सरकार के रबर स्टाम्प के तौर पर ही कार्य करता है...


मेरा आज का सवाल है कि




क्या २१ वीं सदी के जोशभरे, दुनिया के सबसे बड़े व स्वस्थ लोकतंत्र भारत में इस सजावटी-रस्मी (Ceremonial) पद की कोई जरूरत रह गई है ? क्या इस पद का बने रहना सीधे सीधे उन मूल्यों को आघात नहीं पहुंचाता जिनके आधार पर कोई भी लोकतंत्र पल्लवित-पुष्पित होता है ?


















...

7 टिप्‍पणियां:

अरूण साथी ने कहा…

लोकतंत्र में सबका अपना महत्व है वशर्ते पद पर बैठने वाले लोग उसे समझे...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

देश को एक सजावटी राष्ट्रपति की कोई आवश्यकता नहीं है।

anshumala ने कहा…

देखा जाये तो वास्तव में राष्ट्रपति और राज्यपाल का पद बेकार का ही है किन्तु आज के समय में जब किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिल रहा है तो राष्ट्रपति को ही अधिकार होता है की वो अपने विवेक से और कहने के लिए संविधान के हिसाब से सरकार बनाने के लिए पार्टी या दल को आमंत्रित करे वो ना होगा तो ये कैसे तय होगा की त्रिशंकु सांसद या विधानसभा के होने पर किसे सरकार बनाने के लिए बुलाये | हा आप कहा सकते है की ये काम हाई कोर्ट का जज कर सकता है किन्तु किसी ना किसी की जरुरत तो होगी ही और कार्यपालिका के काम के लिए किसी न्याय पालिका से बुलाना शायद नेताओ को पसंद ना आये जो संविधान और कानून का कुछ जायदा ही जानकार हो |

रचना ने कहा…

प्रेसिडेंट रुल लगाना होगा तो क्या करेगे ???

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (17-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

ali ने कहा…

दिनेश जी से सहमति !

अपूर्वानुमेय :)

वाह ! जी चाहता है ...कहूं 'ममता अपूर्वानुमेय वन्दोपाध्याय' !

lokendra singh rajput ने कहा…

जोरदार बहस का मुद्दा है...