शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

क्या यह साफ-सीधी बात समझने के लिये भी आपको 'जनमत संग्रह' की जरूरत है 'टीम अन्ना' ?

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एक बैनर-पोस्टर-टोपी-टीशर्ट-मोमबत्ती-एसएमएस-फेसबुक वॉल पोस्ट-मिस्ड कॉल आधारित आंदोलन,  तिरंगा लहराती व भजनों पर झूम-झूम नाचती खाई-पीयी-अघाई भीड़ जिसमें जन तंत्र का 'जन' गायब था व नीरा राडिया टेप मामले के सामने आने के बाद अपना मुँह छिपाते व साख को दोबारा हासिल करने को प्रयासरत मीडिया के कैमरो-माइक्रोफोनों व स्याही का अंधा, खुला व जरूरत से ज्यादा समर्थन... फिर क्या था रातोंरात बन गये चंद लोग इस महादेश के 'नागरिक समाज' के स्वयंभू प्रतिनिधि...

जनलोकपाल के मुद्दे पर अपने बनाये बिल पर बिना किसी संशोधन या सोच-विचार के भारतीय संसद की मोहर लगवाने में नाकामयाब रहने के बाद यह टीम किसी न किसी तरह चर्चा में बने रहना चाहती है ... इसिलिये कभी कभी अन्ना भ्रष्टों को चाँटा मारना ही एकमात्र उपलब्ध विकल्प बताने लगते हैं ... और आज टीम अन्ना ने एक विचित्र माँग रखी है जनसंग्रह आयोग बनाने की व ग्रामपंचायतों को संसद के ऊपर अधिकार देने की ...

टीम अन्ना को लगता है कि जो वह चाहते हैं वही देश की जनता भी चाहती है... और क्योंकि संसद उनसे सहमत नहीं इसलिये संसद को बाईपास कर अपने मन की करने के लिये इस महादेश के 'नागरिक समाज' की स्वयंभू प्रतिनिधि इस 'टीम' ने यह नया शगूफा छेड़ा है...

पर अपना आज का सवाल इस पर नहीं है...

मेरा सवाल तो सीधा सादा है...

अभी दिसंबर के महीने में मुंबई में तीन दिन का धरना व उसके बाद देशव्यापी जेलभरो अचानक बिना कुछ वजह बताये समेट दिया गया था क्योंकि मैदान में इज्जत बचाने लायक भीड़ भी नहीं जुट पायी थी...


पब्लिक अब आप लोगों की हकीकत जान आप लोगों से उब गयी है !

क्या यह साफ-सीधी बात समझने के लिये भी आपको जनमत संग्रह की जरूरत है टीम अन्ना ?









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