शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

FDI और लोकपाल मुद्दों के बीच में भुला दी गईं हमारी महिलायें... :(

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सच कहूँ तो मैं भारतीय संसद में महिलाओं के लिये तैंतीस फीसदी सीटें आरक्षित करने के कदम का कभी भी समर्थक नहीं रहा...


मैंने
यहाँ पर
और, एक बार फिर से
यहाँ पर भी...

इस कदम के विरोध में लिखा भी...

पर आज अचानक मैंने नोटिस किया कि...

संसद का शीतकालीन सत्र जारी है...

मल्टी ब्रान्ड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर हंगामा बरपा हुआ है आजकल... जैसे तैसे यह मसला निपटेगा तो फिर लोकपाल-जोकपाल की नोंकझोंक शुरू हो जायेगी... और भी बहुत से मुद्दे हैं जो संसद की बहसों व हंगामों की वजह बनेंगे... पर यह तो बहुत ही आश्चर्यजनक है कि 'महिला आरक्षण बिल' की कोई भी बात तक नहीं कर रहा...



क्या यह मान लिया जाये कि महिला आरक्षण बिल को हमेशा-हमेशा के लिये दफन कर दिया गया है ? 

अगर ऐसा हुआ है तो सही हुआ या गलत,
क्या ख्याल है आपका ?





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9 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप पोस्ट लिखते है तब हम जैसो की दुकान चलती है इस लिए आपकी पोस्ट की खबर हमने ली है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - शहद में छुपे हैं सेहत के अनेक राज - ब्लॉग बुलेटिन

anshumala ने कहा…

ham log bhul gaye hai aap bhi bhul jaiye

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

फिलहाल मुझे तो लगता है कि संसद में लोकपाल बिल से ध्यान हटाने के लिये ही वाल-मार्ट को चर्चा में ले आये हैं.

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

कोई तो मुद्दा चाहिए चर्चा के लिए…

Shah Nawaz ने कहा…

:-) kaahe baithe-bithaay ek aur mudda sujha rahe hain Sansad bhang karne ka... :-))

रचना ने कहा…

sansad bhang kab hongi ???

shilpa mehta ने कहा…

ये सब ध्यान हटाऊ मुद्दे हैं - महंगाई / भ्रष्टाचार/ लोकपाल/ .... आदि से ध्यान हटे, यही सोच कर fdi की रेड हेर्रिंग भेजी गयी होगी | और उसने अपना काम कर भी दिया पूरी efficiency के साथ | अब social networking पर ban की रेड herring आई है |

निजी तौर पर मैं , राजनीति में महिला आरक्षण के बिल के विरुद्ध हूँ |

shilpa mehta ने कहा…

ओह - तो यह "निठल्ला " शब्द का origin यहाँ था - अब जा कर पता चला :) मैं तो खोज रही थी कि यह बात आई कहाँ से है :) .....

अब निठल्ले हैं कि नहीं यह तो नहीं पता - किन्तु ब्लोगर तो हम बिलकुल नहीं हैं - सिर्फ एक circle मिला है - जिसमे अपनी बातें करना / कहना, और औरों की बातें सुनना बहुत अच्छा लगता है | यदि यह ब्लोगिंग है तो ठीक, यदि निठल्लापन है तो भी ठीक, यदि दोनों ही नहीं भी है - तो भी ठीक | it is an extended social circle ..... जहां interactions बिलकुल वैसे ही होते हैं, जैसे real वर्ल्ड में |

(वैसे प्रवीण जी - आप मेरे नए ब्लॉग पर नयी पुरानी टिप्पणियों पर एक टिपण्णी कर के चले गए - उसका उत्तर मैंने लिखा - पर आपने पढ़ा नहीं, पढ़ लीजियेगा please |)

अब आप सब बड़े बड़े ब्लोगर गण इस मसले पर फैसला कर लीजिये कि ब्लोगिंग निठल्लापन है या नहीं - मैं आकर पढ़ जाऊंगी :)

एक बात ज़रूर है - यह भाई / बहन / गुरु / देव .....आदि कहने से कोई फर्क नहीं पड़ता मेरे हिसाब से तो - हर एक की निजी choice है - वह ये संबोधन बनाना चाहता है या नहीं | इससे गुणवत्ता पर कोई फर्क पड़ेगा यह मुझे नहीं लगता है

shilpa mehta ने कहा…

oh no - posted on the wrong click :(