गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

यह अचानक क्यों समेट लिये गये तम्बू-कनात... और लपेट लीं गई दरियाँ भी ?

.
.
.




अपने इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कमी तो नहीं छोड़ी थी कहीं से भी, किसी चैनल ने लगाये थे पचास कैमरे और पचास रिपोर्टर और किसी ने सौ कैमरे और पचास रिपोर्टर... हर पल की खबर भी दी जा रही थी... अन्ना को लगा जुकाम पूरे देश की चिन्ता बनता जा रहा था... चैनलों के क्रीपर दिखा रहे थे... अन्ना का पल्स रेट ७२ प्रति मिनट, ब्लड प्रेशर १५६/९० व तापमान १०० डिग्री फैरनहाइट... तीन दिन के अनशन के बाद सोनिया गाँधी के दरवाजे पर धरना देने की घोषणा भी की गयी थी... जेल भरो भी चलने वाला था...




पर अचानक ही समेट लिया गया सब कुछ... तम्बू, कनात व दरियाँ भी... बिना कुछ ठोस वजह बताये...




कुछ समझ सकें हों, तो आप ही बताइये कि क्यों किया गया ऐसा ?



...

रविवार, 11 दिसंबर 2011

'हिन्दी ब्लागिंग', बोले तो- निट्ठल्ले लोगों का आत्मालाप... समाज के दोयम दर्जा प्राप्त लोगों का प्रलाप ???

.
.
.



सच कहूँ तो ब्लॉगवुड में एकदम खरी-खरी लिखने में अरविन्द मिश्र जी का कोई सानी नहीं... आदरणीय ज्ञानदत्त पान्डेय जी की इस पोस्ट पर लिखी गई उनकी इस टिप्पणी को देखिये जरा...


" हिन्दी ब्लागिंग दरअसल निट्ठल्ले लोगों का आत्मालाप है ..समाज के दोयम दर्जा प्राप्त लोगों का प्रलाप -काम काज के लोग कब का ब्लागिंग छोड़ चुके -कुछ तो काल के बियाबान में खो गए कुछ बेहया यहाँ दिख कर भी अब लिखते नहीं …एक अपरिपक्व पाठक वर्ग के लिए क्यों बहुमूल्य समय जाया किया जाये …"

एक निर्मम आकलन है यह, खास तौर से एक ऐसे ब्लॉगर की ओर से जो स्वयं  हिन्दी ब्लॉगिंग के एक बड़े नाम हैं और पाँच ब्लॉगों से सक्रिय तौर पर जुड़े हैं... और सबसे बड़ी बात यह भी है कि कुछ हद तक हकीकतबयानी भी है यह आकलन...


आज का अपना सवाल इसी बात पर है...




जो न निठल्ला है और न ही समाज से दोयम दर्जा प्राप्त... क्या उसके लिये नहीं है हिन्दी ब्लॉगिंग... और यह 'परिपक्व पाठक' कैसे और कब तक मिलेगा हिन्दी ब्लॉगिंग को ... :))




...

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

FDI और लोकपाल मुद्दों के बीच में भुला दी गईं हमारी महिलायें... :(

.
.
.

सच कहूँ तो मैं भारतीय संसद में महिलाओं के लिये तैंतीस फीसदी सीटें आरक्षित करने के कदम का कभी भी समर्थक नहीं रहा...


मैंने
यहाँ पर
और, एक बार फिर से
यहाँ पर भी...

इस कदम के विरोध में लिखा भी...

पर आज अचानक मैंने नोटिस किया कि...

संसद का शीतकालीन सत्र जारी है...

मल्टी ब्रान्ड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर हंगामा बरपा हुआ है आजकल... जैसे तैसे यह मसला निपटेगा तो फिर लोकपाल-जोकपाल की नोंकझोंक शुरू हो जायेगी... और भी बहुत से मुद्दे हैं जो संसद की बहसों व हंगामों की वजह बनेंगे... पर यह तो बहुत ही आश्चर्यजनक है कि 'महिला आरक्षण बिल' की कोई भी बात तक नहीं कर रहा...



क्या यह मान लिया जाये कि महिला आरक्षण बिल को हमेशा-हमेशा के लिये दफन कर दिया गया है ? 

अगर ऐसा हुआ है तो सही हुआ या गलत,
क्या ख्याल है आपका ?





...