गुरुवार, 15 सितंबर 2011

'अन्ना इफेक्ट' : अंदर की बात कुछ और ही है !

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पिछले सवाल पर आदरणीय रतन सिंह शेखावत जी ने टीपा:-

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…
न तो कहीं नजर आ रहा है और ना ही कभी नजर आएगा| क्योंकि सिर्फ टोपी पहनकर तिरंगा लहराने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होने वाला उसके लिए पहले खुद को सुधरना होगा जो कोई करना नहीं चाहता!! सब को रिश्वत देने में दिक्कत है लेने में नहीं!!

जरा गंभीरता से सोचिये, क्या हम में से अधिकाँश कुछ इसी तरह की सोच नहीं रखते... अन्ना टोपी पहने हम ख्वाब देखते हैं कार के नये मॉडल, ३ डी टीवी, नये फ्लैट, नया किचन, ब्रांडेड कपड़े, नये आइटी उपकरण और भी तमाम उपभोक्तावाद जन्य चाहतों का... और उन्हें पाने के लिये धीरे-धीरे अपने सारे जीवन मूल्य कुरबान करते रहते हैं... व्यवहारिकता के नाम पर... 


मुझे अभी तक तो कहीं से नहीं लगा कि भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने का संकल्प हमारे सामूहिक मानस के दिल से निकला है... यह केवल गाल बजाने-गपियाने-गरियाने-गुर्राने और फिर पहले की तरह ही अपनी अपनी बेईमानियाँ बेरोकटोक करते जाने की प्रवृत्ति सा लग रहा है... मुझे खुशी होगी यदि मैं गलत होऊँ...




आप बताइये, आपके अंदर की बात क्या है ?




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9 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

बहुत लंबी लड़ाई है, भ्रष्टाचार निजि स्वामित्व के अधिकार और वर्ग विभाजित समाज के साथ नाभिनालबद्ध है। लेकिन यह भी सही है कि समाज के विकास की दिशा वर्गों की समाप्ति की ओर है।

anshumala ने कहा…

आप को क्या लगता है की अन्ना टोपी पहनने के बाद आदमी को बिल्कुल सन्यासी बन जाना चाहिए या आप को लगता है की आज के समय में बाजार में मिल रही उभोक्ता वस्तुओ को खरीदने के लिए हर व्यक्ति को भ्रष्ट होना ही पड़ेगा | मुझे तो नहीं लगता है आज देश में निजी क्षेत्र में काम करने वालो की संख्या कही ज्यादा है जहा भ्रष्टाचार करने की जगह ही नहीं होती है और इतना वेतन तो मिल ही जाता है की ये सारी वस्तुए आराम से खरीदी जाये और कर चोरी का तो सवाल नहीं उठता है क्योकि वो तो वेतन मिलने के पहले ही कट जाता है | वैसे आप इन जैसे लोगों की गिनती कही करते है या नहीं या केवल दिमाग देखने के बजाये सर गिनने में विश्वास रखते है |

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

http://biharmedia.blogspot.com --यह लिंक है जिसपर अन्ना और उनके इस भ्रष्टाचार विरोधी तथाकथित आन्दोलन पर अच्छा लिखा गया है। जरा वहाँ जाकर पक्षधर लोग देख आएँ।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

एक बार फिर सरकार काले धन को देश में लाने के लिए एमनेस्टी स्कीम ला रही है । यानि कला धन बनेगा सफ़ेद । सभी खुश । सोचता हूँ काश हमारे पास भी दो चार लाख काले रूपये होते !
फिर सोचता हूँ-- तो क्या होता । डिनर में खाने को तो फिर भी दो चपातियाँ ही मिलती ।

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

मुझे अभी तक तो कहीं से नहीं लगा कि भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने का संकल्प हमारे सामूहिक मानस के दिल से निकला है... यह केवल गाल बजाने-गपियाने-गरियाने-गुर्राने और फिर पहले की तरह ही अपनी अपनी बेईमानियाँ बेरोकटोक करते जाने की प्रवृत्ति सा लग रहा है..

@ हकीकत यही है|

इस देश में सब चाहते है कि ईमानदार पैदा हो जो रिश्वत नहीं ले,देशभक्त पैदा हो जो देश के लिए मर मिटने को तैयार रहे, पर अपने घर में नहीं दूसरे के घर में पैदा हो|

जब तक इस देश के नागरिकों में यह मानसिकता रहेगी तब तक न तो यहाँ से भ्रष्टाचार खत्म होगा ना आतंकवाद|

और राजनैतिक नेतृत्व का तो कहना ही क्या वो हर मुद्दे में वोट बैंक तलाशता है!!

Bhushan ने कहा…

दिनेशराय द्विवेदी जी से सहमत. बढ़ रही मँहगाई भी भ्रष्टाचार जनित है. इस बारे में अन्ना और लोकपाल क्या करेगा. तंग आ चुकी जनता अपना रास्ता खोज निकालेगी.

Shah Nawaz ने कहा…

मैं भी रतन भाई से पूरी तरह सहमत हूँ... बदलाव तो हमें अपने अन्दर को बदलने से ही आएगा... खुद बदलें और चुनाव में भ्रष्टाचारियों को बाहर का रास्ता दिखाएं... मैंने पिछले १५ सालों में कांग्रेस, भाजपा, बसपा, सपा इत्यादि सभी पार्टियों को वोट दिया है, क्योंकि मैं पार्टी देखकर नहीं बल्कि उम्मीदवार देखकर वोट देता हूँ... चाहे किसी साधारण से आज़ाद उम्मीदवार को ही वोट देना पड़े, लेकिन वोट केवल और केवल साफ़-सुथरी छवि वाले उम्मीदवार को ही वोट दें... एक बार 200-300 आज़ाद उम्मीद वार चुनाव जीत गए तो अपने आप ही इन बड़े दलों को अक्ल आ जाएगी...

राजन ने कहा…
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राजन ने कहा…

अब तो विकीलीक्स के किसी खुलासे का ही इंतजार है क्योंकि रतन जी या प्रवीण जी खुद तो बताएँगे नहीं कि ऐसा कौनसा एजेंडा उनके पास है जिससे सारा का सारा समाजरातों रात बदल जाएगा.कोई नहीं सिवाय उपदेशात्मक बातों के या दूसरों को मुँहचिढाने के.हद तो तब है जब आपमान ले रहे है कि वहाँ गये सब लोगों के पास रिश्वत लेने के अवसर भी है और लोग ले भी रहे है.वाह!अब ज्ञानीजनों को समझाना पडेगा कि कैसे आम आदमी का खून व्यवस्था द्वारा चूसा जा रहा है.और जरा अंशुमाला जी की टिप्पणी भी पढिये.फिर भी यदि आपकी बात ज्यों की त्यों मान ले तब भी ये सच हैकि एक सही बात भी गलत समय परकही जाए तो वह दुराग्रह ही बन जाता है.अन्दर से खुद को बदलने वाली बात सही है.सबको पता है कि यदि पुरुष महिलाऔं के प्रति अपनी सोच बदल ले तो बहुत सी समस्याएँखत्म हो जाएँ लेकिन फिर भी कानून तो बनते है अब कोई इनके विरोध में ही अड जाएँ और कहने लगे कि सोच बदले बिना सब बेकार है तो उसे किस तर्क से समझाया जाए कि ये क्यों जरुरी है.इसमें कोई नई बात नहीं कि हिंदु मुस्लिम एक दूसरे के प्रति अपना नजरिया बदल ले तो दंगेफसाद रुक जाएँगे लेकिन यदि कोई कहता है कि जानबूझकर भडकाऊ भाषण देने वाले नेताओं या एकतरफा कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को भीसजा मिले तो मुझे इसमें भी कुछ गलत नहीं लगता.ये कम से कम समस्या को बढने से तो रोकेगा.या फिर@शाहनवाज जी से सहमत हूँ कि लोगों को सोच समझकर ही वोट डालना चाहिए आज तो ज्यादातर लोग ऐसा करते भी है लेकिन फिर भी चुनाव सुधार के लिए ढंग के कदम उठाएँ जाएँ या जनप्रतिनिधियों को अधिक जिम्मेदार बनाने के लिए ढंग के नियम कानूनों के अधीन किया जाए तो मुझे इसके विरोध का भी कोई कारण नहीं नजर आता.किसी भी स्तर पर थोडा भी सुधार आ रहा है तो हमें विरोध क्यों करना है.अब ये सुधार की बात कौन कर रहा है या उनका समर्थन कौन कर रहा है ये ज्यादा महत्तव नहीं रखता.कभी आपने भी व्यवस्था में भ्रष्टाचार के विरोधस्वरूप कुछ लिख दिया होगा.लोगों ने आपका समर्थन भी कर दिया होगा बिना ये जाने कि आप सार्वजनिक जीवन में कितने ईमानदार है या पहले से आपका समर्थन कर रहेबाकी लोग कैसे है.क्योंकि महत्तव तो आपकी बात का ही है.जबकि ये लोग आपसे थोडा आगे जाकर एक उपाय के साथ सुधार की बात कर रहे है.तब इनसे दिक्कत क्यों होनी चाहिये?हाँ उद्देश्य केवल गाल बजाना,गपियाना,गुर्राना या गरियाना ही है तो बात अलग है.लगे रहिए