बुधवार, 6 जुलाई 2011

जिसे पूरी दुनिया का मालिक बताया जाता है, क्या करेगा वह इस तुच्छ खजाने का ?

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त्रिवेन्द्रम (थिरूअनंतपुरम) के पद्मनाभास्वामी मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ का खजाना मिल गया है जबकि एक सबसे बड़ा, सुरक्षित व महत्वपूर्ण कक्ष अभी खोला जाना बाकी है (लिंक) ...


सदियों पहले त्रावणकोर के तत्कालीन राजा ने भगवान पद्मनाभास्वामी को राज्य का स्वामी घोषित कर स्वयं को उनका सेवक मात्र मान राज्य चलाना शुरू किया... वही परंपरा बाकी ने भी निभाई... यह खजाना उसी समय का है...

अब जब यह खजाना सामने आ गया है तो दो विकल्प हैं...


१- खजाने की गिनती व कीमत का आकलन कर, धूप दिखा पहले की ही तरह उसे फिर से वहीं बंद कर दिया जाये... भगवान तो शायद ही कभी उसका प्रयोग करें...


२- देखा जाये तो किसी भी राजा के पास जो संपत्ति होती है उसकी असल मालिक राज्य की जनता होती है... इसलिये यह सारा धन केरल राज्य की जनता का ही है... इसे बाजार भाव पर बेच राज्य की जनता के लिये दीर्घकालीन व दूरगामी महत्व के सर्वजनकल्याण के कार्यों पर खर्च कर दिया जाये...


मैं क्या सोचता हूँ पोस्ट का शीर्षक बता रहा है, आप बताइये सभी को, कि...




खजाने का असली मालिक कौन है व दोनों में से कौन सा विकल्प उचित है ?


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15 टिप्‍पणियां:

रचना ने कहा…

maalik kaun haen yae kanun ki drshti kaa prashn haen

meri nazar me auction karna chaiyae aur paesa sarkaari khajaane mae daalna chahiyae

par hoga nahin

bandar baant hogii aap daekh lijiyaega

Learn By Watch ने कहा…

ये आपने खूब कही,

कौन सा सरकारी खजाना? कलमाडी का, राजा का, सोनिया का स्विस बैंक अकाउंट या इसके अलावा भी कोई सरकारी कोष है

सरकारी बन्दर आपस में बाँट लेंगे इस खजाने को बस इतना ही होगा

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

सुरेश चिपलूनकर जी की नई पोस्ट में दिवस जी टिप्पणी देखिए। बेचारे खिसिआए हुए हैं सब लोग। सुरेश जी ने सवाल उठाया है कि राजा स्विस बैंक में भी पैसा रख सकता था। यह सम्भव नहीं था। समुद्र पार करने पर जहाँ अपवित्र माना जाता हो, वहाँ की बात ध्यान न दी जाय। यह सम्पत्ति देश की है या शोर मचाने वालों के लिए सिर्फ़ उस इलाके की। यह बात सच है कि सम्पत्ति राजा की नहीं प्रजा की है।

सुरेश जी भड़क जाएंगे अगर ज्यादा कहा तो। यहाँ तो मदिरों और निर्जीवों के लिए ही सम्पत्ति है और कोई यह कह दे तो शोर और हमला शुरु। हाँ अगर किसी गर हिन्दू के पास ऐसी सम्पत्ति है तो उसे भी छोड़ना नहीं चाहिए।

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

मेरे कहने का अर्थ यह न लगाया जाय कि मैं सरकार और उसके हिस्सेदारों की सम्पत्ति को अलग मानता हूँ। स्विव बैंकों में पैसा है तो वह तो पहले ही आना चाहिए। लेकिन साधु-संतों को माफ़ नहीं किया जा सकता। किसी को नहीं बख्शा जाय।

sajjan singh ने कहा…

भगवान इतने धन का क्या करेंगें जो करना है वह मंदिर कमेटी और सरकार को ही करना है। इन मंदिरों के पास इतना धन जमा हो चुका है कि इस धन की चिंता में मंदिर प्रबंधकों को नींद नहीं आ रही है इसलिए अब वे बीमा कंपनियों के चक्कर काट रहे हैं। इतने बड़े पैमाने पर जमा सोना पूरी तरह से अनुत्पादक पड़ा रहे इससे तो अच्छा ही है कि इसका इस्तेमाल उत्पादक कार्यों में हो जिसके प्रदेश की जनता का भी कुछ भला होगा।

anshumala ने कहा…

जहा तक इस मंदिर का मामला है तो मुझे तो लगता है की वो केवल सोना नहीं है उनमे से कई बहुत ही पुरातन वस्तु है जिसकी कीमत हम तौल कर नहीं लगा सकते है | फिर इस बात की भी क्या गारंटी है की जो बाते छन कर बाहर आ रही है वो सब सच ही है यहाँ तो हवा में महल खड़े होते देर नहीं लगती है फिर जिस जगह पर कम्युनिस्ट बड़ी संख्या में हो वहा का तो और भी भरोषा नहीं है |

दुसरे इस बात से सहमत हूँ की भगवन पैसे का क्या करेंगे सभी मंदिरों को अपने पैसे का उपयोग अच्छे कामो के लिए करना चाहिए कुछ करते है कुछ उसके नाम पर दिखावा करते है |

दिगम्बर नासवा ने कहा…

पैसा सरकार की तिजोरी में जाना चाहिए पर खेच तभी होना चाहिए जब १००% पैसा जरूरतमंद के हाथ पहुँच सके ... न की १०० में से १० जरूरतमंद के हाथ और ९० इन भ्रष्ट तंत्र के लोगों के हाथ ...

Jeevaswa ने कहा…

पहले तीन ज़रूरी सवाल :

१. यह गारंटी हो की इसका एक एक पैसा देश के विकास और गरीबों की भलाई में लगेगा और किसी भी गलत हाथों में नहीं जाएगा. गारंटी हो की इसमें घपला नहीं होगा.

कौन लेगा यह गारंटी?

२. क्या सैकड़ों हजारों वर्ष पुरानी पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक महत्त्व की कलाकृतियों को भी गलाया या बेचा जाना चाहिए? या उन्हें राष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संग्रहालयों में जगह दी जानी चाहिए?

३. नेहरु-गाँधी डायनेस्टी के स्विस एकाउंट में जमा सैकड़ों लाख करोड़ पर हल्ला मचने के कुछ ही दिनों के अन्दर खजाना खुलवा लिया जाना? जबकि प्राचीन मंदिरों और राजपरिवारों में खजाने हैं यह घोषित रूप से सदियों से सभी जानते हैं? क्या यह जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश है? या एक जवाबी हमला? 'रिटेलीयेटरी एक्शन(?!!!)'.

मुझे नियत पर शक है.

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इतना बड़ा निजी खजाना हाथों में होते हुए भी राजपरिवार ने इसमें हाथ डालने की कोशिश नहीं की, जबकि प्रिवी पर्स बंद हुए ज़माने हो गए. जिसके कारण अन्दर ही अन्दर राजपरिवारों की आर्थिक बुनियाद हमेशा के लिए दरक गई, तब भी किसी ने खजाने पर कुदृष्टि नहीं डाली?! यह एक ईमानदारी की मिसाल लगती है. कोई इस दृष्टी से क्यों नहीं सोचता?

क्या इसी प्रकार चर्चों की संपत्ति का खुलासा और आय-व्यय का औडिट सार्वजनिक होगा? उनकी संपत्ति राष्ट्र की संपत्ति घोषित होगी?

जवाब हमें और आपको पता है.

Jeevaswa ने कहा…

Dr. Subramanian Swamy writes in his article:

Those who have no love for India will not hesitate to plunder her treasures. Mohammed Ghori, Nadir Shah, and the British scum in the East India Company such as Robert Clive, made no secret of it. But Sonia Gandhi has been more discreet, but as greedy, in her looting of Indian treasures. When Indira Gandhi and Rajiv Gandhi were Prime Ministers, not a day passed when the PM’s security did not go to the New Delhi, or Chennai international airport to send crates and crates of Indian antiques and other treasures, unchecked by customs, to Rome. Air India and Alitalia were the chosen carriers. For organizing all this, Mr. Arjun Singh first as CM, later as Union Minister in charge of Culture, was her hatchet man.

Indian temple sculpture of gods and goddesses, antiques, pichwai paintings, shatoosh shawls, coins, and you name it, were transported to Italy to be first displayed in two shops [see Annexure-16] owned by her sister, Anuskha alias Alessandra Maino Vinci. These shops located in blue-collar areas of Rivolta[shop name: Etnica] and Orbassano [shop name: Ganpati] did little business because which blue collar Italian wants to buy Indian antiques ? The shops were there to make false bills, and thereafter these treasures were taken to London for auction by Sotheby’s and Christies.

Some of this ill-gotten money from auction went into the bank accounts of Rahul Gandhi in the National Westminister Bank and Hongkong & Shanghai Bank, London branches, but most of it found it’s way into the Gandhi family account in the Bank of America in Cayman Islands. Rahul’s expenses and tuition fees for the one year he was at Harvard, was paid from that Cayman Island account [see Annexures-17].

What kind of people are these Gandhi-Mainos that bite the very hand of Bharat Mata that fed them and gave them a good life? How can the nation trust or tolerate such greedy thieves of national treasures?

REF: SONIA GANDHI IS THE MODERN ROBERT CLIVE

चोर भी हम, कोतवाल भी हम, क़ाज़ी भी हमीं! यह पढ़कर आप जान लें की हमारी इस धरोहर का भी ठीक यही हाल होना है.

राजन ने कहा…

दूसरा विकल्प सही है.

डा० अमर कुमार ने कहा…

क्या कभी किसी बुद्धिमान को चीलर के डर से लँगोट छुपाते देखा है ? मैंनें तो नहीं देखा !
तो, फिर आभासी भय के वज़ह से इस धन को पुनः अँधेरे तहखानों में सड़ाने से लाभ ?
बेहतर हो कि यह धन एक निश्चित मियाद के लिये त्रावनकोर राजा के बँशज और रिजर्व बैंक के पदेन गवर्नर के सँयुक्त खाते में किसी भारतीय बैंक में जमा कर दिया जाये, और उसके ब्याज़ से जनहित की योजनाओं का सँचालन हो । देश के स्वर्ण-भँडार में अनायास इतनी वृद्धि होने से भारतीय मुद्रा की स्थिति में भी सुधार होगा ।
चिदम्बरम को मैं कभी भी गँभीरता से नहीं लेता, वह ऎसे नाज़ुक मसलों पर अचानक एक थ्योरी लेकर उपस्थित हो जाते हैं !
यदि उनकी बात सत्य है, तो वह किस उम्मीद में अब तक चुप बैठे थे ? उनके दावे की सत्यता सिद्ध होने पर सोनिया के साथ उन्हें भी देशद्रोह के मुकद्दमें को झेलना चाहिये... क्या वह इसके लिये तैयार हैं ?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

दुनिया की सारी संपत्ति दुनिया के मेहनतकरने वालों की है। क्यों कि वे ही और केवल वे ही मूल्य पैदा करते हैं। उन्हें दुनिया की संपत्ति मिल जाए इस के लिए अभी बहुत लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।
फैज का गीत यहाँ जा कर सुनिए ...

http://www.youtube.com/watch?v=dA9AybP6uFk

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

ख़ज़ाना वाक़ई बहुत बड़ा है।
पर एक सवाल यहां खड़ा है।।
सेक्स की बातें या काम की बातें

एस.एम.मासूम ने कहा…

धर्म के नाम पे, मंदिरों या मस्जिदों मैं जो पैसा दिया जाता है वो इस समाज मैं रहने वाले ज़रुरत मंदों की मदद के लिए होता है. धर्म के उपदेशों के लोगों तक पहुँचाने और ज़रुरत मंदों की मदद, अस्पताल और स्कूल गरीबों के लिए इस धन से खोलना चाहिए.
अफ़सोस ऐसा होना आसान नहीं.

अनूप शुक्ल ने कहा…

जनता का पैसा जनता के पास आना चाहिये! :)