गुरुवार, 30 जून 2011

हमारे मुख्यधारा के मीडिया को एक बार यह जरूर सोचना चाहिये कि इस तरह की पक्षपाती व बेईमान सोच से ही भ्रष्टाचार पनपता है ! ... पर क्या यह चैनल वाले या हम भी सोचेंगे इस भेदभाव पर ?

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अभी चंद दिन पहले एक टेलीविजन चैनल अन्ना हजारे व बाबा रामदेव द्वारा चलाये जा रहे भ्रष्टाचार व कालाधन विरोधी आंदोलनों के बारे में प्रख्यात दलित विचारक व चिंतक उदित राज (लिंक) का साक्षात्कार दिखा रहा था...


उदित राज जी का कहना था कि यद्मपि वह इस बात से सहमत हैं कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगनी चाहिये, परंतु उनको इस बात का गिला अवश्य था कि जब वह या अन्य संगठन दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, गरीब या समाज के हाशिये पर डाले गये अन्य समूहों के हितों के लिये लाखों की संख्या में  देश की राजधानी दिल्ली में ही धरना-प्रदर्शन आदि करते हैं... तो यह तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया इन आंदोलनों को बिल्कुल नजरअंदाज कर देता है... किसी किस्म की कोई खबर नहीं लगाता... जबकि अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के इन आंदोलनों को महत्व मिलने में ९९ % तक भूमिका मीडिया कवरेज की ही रही है... मीडिया की कवरेज के कारण ही यह आंदोलन ज्यादा बड़े व व्यापक समर्थन-जनाधार प्राप्त लगते हैं... यदि यह सैकड़ों चैनल कवरेज करना बंद कर दें तो इन आंदोलनों का कोई असर नहीं बचेगा... उनका कहना है कि मुख्यधारा के मीडिया को यह सोचना चाहिये कि इसी तरह की पक्षपाती व बेईमान सोच-आचरण से भी भ्रष्टाचार पनपता है !


उदित राज जी के कहे मुताबिक ही मुझे तो अगले दिन कहीं भी उनके इस बयान का जिक्र प्रिंट मीडिया में नहीं दिखा...


अपने फेसबुक पेज (लिंक) पर उदित राज जी ने जो लिखा है वह आप उनकी Wall-दीवार(लिंक) पर लिखा पढ़ सकते हैं... जस का तस उतारा है नीचे...

If channels stop covering Anna Hazare and others, then what will happen? Thus role of the media is stretched to the extent of 99%.When we demonstrate in hundreds of thousands for the causes of poor, dalits and minorities , no channels and no news, such discriminations. Media person should know that the corruption is due to discriminatory and corrupt thinking.


Yadi channels aur news papers Anna Hazare aur unke sathiyon ko cover karana band kar den to kya hal hoga. 99% taq media ki bhumika hai.Jab hum lakhon ki sankhya me dalits, garib aur minorities etc ke bare me rally adi karate hain , kahan rahati hai yeh media. Media ke logon ko sochna chahiye ki isi bhedbhav ke karan bhrshatachar ka janm hua hai.


अपना आज का सवाल इसी बात पर है, बताइये कि ...


क्या उदित राज कुछ भी गलत कह रहे हैं यहाँ पर ?
 
 
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5 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

उदितराज सही कह रहे हैं।

डा० अमर कुमार ने कहा…

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दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, गरीब जन पर मीडिया की नज़रें इनायत केवल बलात्कार के मामलों के समय ही होती है,
बलत्कृत दलित या आदिवासी महिला की ही न्यूज़-वैल्यू है, ऎसा वह समझते हैं ।
मानों सनसनी उनके ज़लील किये जाने की ख़बरों में ही बसती हो ?

anshumala ने कहा…

सहमत हूँ | किन्तु मिडिया ने भी पहले अन्ना हजारे के आन्दोलन को कवर नहीं किया था यहाँ तक की जब उन्होंने उसके पहले दिल्ली में एक बड़ी रैली की थी तब भी एक दो चैनलों ने ही कुछ मिनट के लिए उन्हें जगह दी थी | इस बार के आन्दोलन में जब पुरे देश में छोटे मोटे रूप में ही भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन होने लगे तब कही जा कर मिडिया को इस आन्दोलन की समझ हुई या ये कहे की उसे इसमे टी आर पी नजर आई और बाबा रामदेव को भी उसका फायदा हुआ | डा अमर जी से सहमत हूँ की दलितों की याद मिडिया को ऐसे ही मौको पर आती है पर वहा भी पुरे घटना को जेसिका रुचिका की तरह अंजाम तक पहुचने की जगह बस सनसनी खड़ा कर छोड़ दिया जाता है इंसाफ दिलाने का प्रयास कभी नहीं किया जाता है |

राजन ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
राजन ने कहा…

उदित जी का कहना बहुत हद तक सही हैं.प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में वैसे भी अभी दलित और अल्पसंख्यकों का प्रतिशत बहुत कम है कारण चाहे जो भी हो.अन्ना के आंदोलन के पीछे जैसे कई तोप किस्म के नाम जुड गये वैसा दलितों के मामले में कम देखने को मिलता है.पर उदित जी की एक जो बात खल रही है वो ये कि वे अन्ना की मेहनत बिल्कुल नजरअंदाज कर रहे है.जबकि अन्ना ने आम लोगों तक खासकर युवाओं तक अपनी बात पहुँचाने के लिये अपने स्तर पर भी बहुत मेहनत की है.एसएमएस और सोशल साईटों या रेलियों के माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुँचाई है यहाँ तक कि उनके सुझावों व प्रश्नों का भी स्वागत किया है.मीडिया को तो बहुत बाद में इस आंदोलन की गंभीरता का अहसास हुआ है.और फिर ये क्या कोई स्वर्ण आंदोलन है.अन्ना को हर वर्ग का समर्थन मिला है जबकि खुद मीडिया के ही एक वर्ग ने अपने आपको सबसे अलग दिखाने के लिये इस मुद्दे की हवा निकालने में कोई कसर नहीं छोडी मगर अन्ना ने हार नहीं मानी.और ये मत भूलिये कि अन्ना एक ठोस फार्मूला लेकर बात कर रहे है न कि उनके पास केवल भ्रष्टाचार मुर्दाबाद के नारे है इसके लिये उन्होने जानकारों की सेवाएँ ली है.आप भी दलितों और अल्पसंख्यकों के हित में ऐसी कोई नीति हो तो सामने लाईये मीडिया देर सवेर उस पर बहस करेगा ही जैसे जातीय आरक्षण या सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लेकर हुई है केवल जय भीम बोलने या सवर्णो और बहुसंख्यको को कोसने से बात नहीं बनेगी.हाँ फिर भी कुछ लोग आलौचना या असहमति के सुर में बोलेंगे ही जैसे कि अन्ना के साथ भी हुआ.उनकी मुहिम को तो स्वर्णवादी हिन्दुत्वादी संविधान के खिलाफ समानांतर सरकार समर्थक न जाने क्या क्या कहा गया है.अन्ना और उनकी टीम बार बार कहती रही है कि हमें देश के युवक युवतियों को अपने साथ लेने के लिये बहुत मेहनत करनी पडी हैं और अभी कर रहे है तभी हमारी मुहिम सफल हो सकती है.दलित चिंतकों ने इसके लिए क्या किया है?