शनिवार, 25 जून 2011

संसद में एक तिहाई महिलाओं के आने से कौन सी अभूतपूर्व क्रांति आ जायेगी... महिला हितों की आड़ में राजनैतिक वंशवाद को बनाये रखने का प्रयास मात्र है यह !

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सबसे पहले तो मैं यह बता दूँ कि मैं महिला आरक्षण का कतई समर्थन नहीं करता... तकरीबन सवा साल पहले मैंने इस विषय पर एक पोस्ट भी लिखी थी   '१४११ बाघ बचे हैं आज और इतनी हायतौबा मचा रहे हो !... १५ साल बाद शायद १४ बेचारे_ _ _ भी न बचें हमारे सर्वोच्च सदन में...!!!'      समय हो तो देखियेगा और मेरे उठाये सवालों पर अपने विचार भी रखियेगा ।


आज फिर खबरें आ रही हैं कि संसद के मानसून सत्र में महिला आरक्षण बिल को पास कराने के प्रयास किये जा रहे हैं (लिंक)


पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण लागू होने से जो हुआ वह सभी के सामने है, पहले से ही प्रधान रहे घरानों की महिलायें महिला सीट होने पर जीत कर आईं, उनका सारा काम परिवार के पुरूष ही करते हैं तथा 'प्रधान पति' नाम का एक ऐसा अनचाहा वर्ग पैदा हो गया जो बिना किसी जिम्मेदारी के सारे अधिकारों का लाभ लेता है...

यदि संसद में महिला आरक्षण लागू हुआ तो इसका सबसे बड़ा फायदा राजनैतिक वंशों को होगा... एक तिहाई सीटें उनके परिवार की महिलाओं के लिये मानो एलॉट सी हो जायेंगी... क्योंकि संसद का चुनाव लड़ने लायक धनबल उन्हीं के पास होगा तथा राजनीतिक पार्टियों में इन राज-वंशों की पकड़ होने के कारण उन्हीं परिवारों की महिलाओं को जिताऊ उम्मीदवार मान कर टिकट भी दिये जायेंगे...

सीधे साफ शब्दों में महिला आरक्षण बिल महिला हितों की आड़ में राजनैतिक वंशवाद को बनाये रखने का प्रयास मात्र है !


क्या आप इस आकलन से सहमत हैं ?


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8 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप के सारे कथन सही होते हुए भी राजनीति में महिलाओं के प्रवेश से स्थिति में परिवर्तन आया है। महिलाएँ अब पंचायत स्तर पर धीरे-धीरे अपने परिवारों के प्रभावों से मुक्त हो कर भी काम करने लगी हैं। संसद में 30 प्रतिशत महिलाओं के आने से तुरंत तो नहीं पर कुछ वर्षों में बदलाव देखने को मिल सकता है। मेरा व्यक्तिगत मत है कि यह बिल जैसे भी हो आना चाहिए।

Bhushan ने कहा…

आपका आकलन सही है. बिल आना भी चाहिए लेकिन शरद यादव आदि द्वारा दिए संशोधनों के साथ.

Aryaman Chetas Pandey ने कहा…

main dinesh ji se sahmati rakhta hun is vishay mein.

ajit gupta ने कहा…

आपने शायद कभी खुली आँखों से देखा नहीं है। यदि देखा होता तो यह कभी नहीं लिखते कि राजनीति में केवल परिवारों की महिलाएं ही आ रही हैं। कभी नगर परिषद और पंचायत में जाकर देखना कितने प्रतिशत नए और प्रतिभाशाली चेहरे आपको मिलेंगे। सरपंच पति हुआ करते थे और शायद कहीं कहीं आज भी हैं लेकिन धीरे-धीरे इनकी संख्‍या कम होती जा रही है।

anshumala ने कहा…

आज से सालो पहले जब ये बिल की बात उठी थी तो मैंने भी इसका यु ही विरोध किया था जैसा की आप कर रहे है उन्ही कारणों के साथ जो आप दे रहे है | किन्तु इन बीच के सालो में पंचायत स्तर में कई महिलाओ ने आगे आ कर खुद अपने दम पर काम किया है हा भले आज उनकी संख्या कम है किन्तु ये भविष्य के लिए अच्छा संकेत है धीरे धीरे ही सही भागीदारी जरुर बढ़ेगी पर हा इसमे भी कोई शक की बात नहीं है की तब तक बड़ी संख्या में नेताओ की पत्निया ही संसद की शोभा बढाती रहेंगी |

Kajal Kumar ने कहा…

कोई कुछ भी कर ले, राजनीति जिनकी बपौती है उनकी ही रहेगी. ये अपने नौकरों को भी जिता कर उनके नाम पर राज कर सकते हैं...

रचना ने कहा…

अगर आप समानता नहीं देगे तो आप को "आरक्षण " देना पड़ेगा ।
अगर भारतीये संस्कृति और परम्पराओं कि बात करे तो हमेशा दिखता हैं कि जो कुछ भी पुरुष के लिये सही हैं वही स्त्री के लिये वर्जित हैं । ये नियम भारतीये संस्कृति मे किसने बनाए ?? क्या अगर कुछ कहीं गलत हुआ हैं तो उसको सुधारना भी हमारा कर्तव्य नहीं बनता हैं । शायद शिक्षा इसीलिये दी जाती हैं कि हम सही और गलत का फैसला करने मे सक्षम हो जाए । फिर गलत जिसके साथ होता हैं आवाज भी वही उठायेगा ना सो अगर नारी अपने साथ हुए / हो रहे गलत के प्रति आवाज उठाती हैं तो इसमे क्या परेशानी हैं ।
कल संसद मे आरक्षण को लेकर बड़ा हल्ला रहा । १४ साल से एक बिल पास होने के लिये बार बार पेश किया जा रहा हैं लेकिन ३३% आरक्षण महिला को क्यूँ मिले इस के लिये महिला को समझाया गया कि " आरक्षण के अन्दर आरक्षण " होना चाहिये ।

आज कल २ लोग मिलकर एक पोलिटिकल पार्टी बना लेते हैं अब २ लोगो कि पार्टी मे ३३% कैसे रहेगा यानी हर पार्टी मे किसी ना किसी पुरुष कि सीट कम हो ही जायेगी { पता नहीं कैसे होगा फिर !!! } । ताकत का बटवारा करना किस को अच्छा लगता हैं ।

मै कभी भी आरक्षण कि हिमायती नहीं रही और व्यक्तिगत तौर पर जो कुछ लिया हैं वो अपनी काबलियत और मेहनत से लेकिन हर जगह समानता नहीं हैं ये बात सच हैं । आज भी बेटे और बेटी मे भेद भाव बना हुआ हैं । अपने कैरियर मे वही लडकियां आगे आपाती हैं जो जुझारू हैं । घर और बाहर दोनों कि जिम्मेदारी संभालना इतना आसान नहीं हैं । कितना टेलेंट केवल घर के काम मे नष्ट होता था इस लिए तो अब बड़ी कम्पनिया महिला को फ्लेक्सी टाइम का काम देने लगी हैं ये भी पाश्चात्य सभ्यता की ही देन हैं लेकिन इसमे किसी को आपत्ति नहीं होती क्युकी घर का काम और बाहर का काम { जिसमे पैसा भी मिलता हैं } दोनों नारी कर रही हैं जबकि विदेशो मे ये बात नारी और पुरुष दोनों पर लागू होती हैं । किसी सभ्यता / संस्कृति कि बुरी करने से पहले उसको जानना जरुरी होता हैं । विदेशो मे केवल होटलों मे औरते वेटर नहीं होती हैं और ना वहाँ नगनता का प्रचार हैं । ये बाते सब भ्रान्तिया हैं उसी प्रकार से जैसे विदेशो मे हमारे देश के लिये कहा जाता हैं "सांप और सपेरो और जाहिल गवारो " का देश ।
जहां बेटे कि नौकरी माता पिता के लिये एक तमगा होती हैं वही बेटी कि नौकरी समय पास करने का साधन होती हैं जब तक विवाह ना हो जाए । ऐसे मे अगर कोई महिला पोलिटिक्स मे अपना मुकाम बनाना चाहती हैं तो ये आरक्षण उसके लिये कुछ आसानी जरुर ले आयेगा ।

आप कहेगे किरण बेदी को देखिये लेकिन क्या आप किरण बेदी के साथ हुए हर पक्षपात को भूल गये । कितने लोग जानते हैं कि किरण बेदी को एक बार रातो रात अपनी बेटी के साथ एक जगह से भागना पडा था । आप कहेगे ये किसी पुरुष के साथ भी हो सकता था , लेकिन जो दर किरण बेदी के मन मे अपनी बेटी को लेकर हुआ था क्या वो डर अगर उनके बेटा होता तो उनको होता ।
लीजिये आप कहेगे यही तो हम भी कहते आ रहे हैं लड़कियों को "डर " कर " ढँक " कर ही रहना चाहिये पर क्या ये समानता हैं अगर आप समानता नहीं देगे तो आप को "आरक्षण " देना पड़ेगा । जितनी जल्दी समाज मे आप "समानता " ले आयेगे जहां हर वर्ग का लोग , हर जाति के लोगो को संविधान और न्याय मे दी हुई समानता मिल सके उतनी ही जल्दी हम इस आरक्षण जैसी चीजों से छुटकारा पा सकते हैं ।
right to equality को लाये और reservation से मुक्ति दिलवाये .
http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2010/03/blog-post_10.html

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

मैं आपकी बात से सहमत हूँ। वैसे यह ठप्पा लग जाएगा कि नारीविरोधी हूँ। इस ठप्पा से बचने का बस एक ही उपाय है कि महिलाओं के पक्ष में जो कहा जाय सब में हाँ में हाँ मिला दीजिए।

लेकिन सहमति के पीछे आपके कारण जायज मानता हूँ। क्योंकि आरक्षण नहीं समानता होनी चाहिए। इसलिए यह सब आरक्षण का खेल खत्म ही होता तो अच्छा था। ज्यादा, अभी नहीं कहने के मूड में हूँ