मंगलवार, 21 जून 2011

अपने अपने 'कम्फर्ट जोन' में मगन सुविधाभोगी हिन्दुस्तान... क्या इस लड़ाई को लड़ने का दम है हम में ?

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सच कहूँ तो मुझे यह हाल के भ्रष्टावार विरोधी आंदोलन किसी भी एंगल से जनतंत्र की बुनियाद कहे जाने वाले  'जन ' के द्वारा किये जा रहे जनआंदोलन से नहीं दिखे... 


हाँ एक सुविधाभोगी व मुखर मध्यवर्ग, जो अपनी क्षमता व पहुंच से कहीं ज्यादा ऊपर जा हिट करने की हसरत रखता है, को अपने तरीके से देश के लिये कुछ करने का मौका जरूर इन्होंने दिया... चाहे वह मिस-कॉल करना रहा हो या फेसबुक पर पेज बनाना या चेन इ-मेल भेजना या रंग-बिरंगे नारे लिखे पोस्टर डिजाइन करना व टी शर्ट , टोपियाँ पहनना...


एक सबसे बड़ी हकीकत यह भी है कि अर्थव्यवस्था के लिबरलाइजेशन से शहरी मध्यवर्ग को ही सबसे ज्यादा फायदा हुआ है और इस लिबरलाईजेशन के कारण उत्पन्न हुई नियमों को बेंड करने की प्रवृत्ति भी इस वर्ग में बढ़ी है ...


अब यदि अचानक सभी को सीधे-सीधे चलने को कहा जायेगा तो अपने अपने 'कम्फर्ट जोन' में मगन सुविधाभोगी हिन्दुस्तान का यह मध्यवर्ग अपने नियमों को तोड़ अर्जित सुखों का त्याग करने का हौसला जुटा पायेगा क्या... 




मुझे तो इसमें संदेह है, आप क्या सोचते हैं ?








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6 टिप्‍पणियां:

anshumala ने कहा…

९० के दसक में एक आन्दोलन चला था जिसमे इस सुविधाभोगी मध्यमवर्ग ने अपने बच्चो को खोया था तब से ही इनकी रूहे भी किसी आन्दोलन के नाम से कांप जाती है, बड़ी मुश्किल से ये जागी है कृपया ऐसी बाते कर के उसकी हिम्मत और न तोड़े वो तो पहले से ही रामदेव के आन्दोलन में चले पुलिसिया डंडे से डरा हुआ है और सोच रहा है की 16 अगस्त से होने वाले आन्दोलन में वो जाये की नहीं अब आप ये बाते कर के उसे पीछे हटाने के लिए एक और बहाना प्रदान कर रहे है |

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अंशुमाला जी की टिप्पणी महत्वपूर्ण है और आप की बात का समर्थन करती है।

Rajey Sha राजे_शा ने कहा…

सही बात है कम्‍फर्ट जोन वाले कान्‍सेप्‍ट के कारण ही दुनि‍यां में हजार तरह के भ्रष्‍टाचार हैं। वैसे लगता है कि‍ अन्‍ना हजारे इस जोन के बाहर की चीज हैं लेकि‍न उनसे जुड़े लोग कम्‍फर्ट जोन वाले ही हैं... तो कुछ सैकड़ा भर अन्‍ना हजारे चाहि‍ये ताकि‍ लोगों को पता चले की कम्‍फर्ट जोन वाला कान्‍सेप्‍ट नर्क का मार्ग ही है।

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

बात तो सही लग रही है कि यह आन्दोलन कहीं से जन-आन्दोलन नहीं था या है। जन-आन्दोलन में जब तक भारत का निम्नवर्ग यानि आर्थिक रुप से निम्नवर्ग भाग शामिल नहीं होता तब तक शायद ये सारे आन्दोलन तमाशे जैसे ही हैं जो चलते रहते हैं।

आप बहस में नहीं आए, आते तो कम से कम? हमारी कृपा से ब्लाग पर 200 से ज्यादा टिप्पणियाँ हो गई हैं। नाम लेने की अब जरूरत नहीं रही। आप समझ गए होंगे। बहस थी पुनर्जन्म को लेकर।

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

अंशुमाला जी से सहमत हूँ की इस तरह के लेख लिख कर आप हमें भ्रष्टाचार निवारण के हमारे अडिग विश्वास से डिगा रहे हैं :-))

Bhushan ने कहा…

आज तो यह हालत है कि "जो भ्रष्टाचार से टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा". भ्रष्टाचार कोई अलग वस्तु नहीं है. हमारे 'सिस्टम' का नाम ही 'भ्रष्टाचार' है.