बुधवार, 15 जून 2011

जन-लोकपाल विधेयक पर मामला अब यहाँ आकर अटका है... आप क्या सोचते हैं इस बारे में, बतायेंगे क्या हुजूर...!

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जन लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल नागरिक समाज के प्रतिनिधियों व सरकार के बीच प्रधानमंत्री व उच्च न्याय पालिका को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर गतिरोध आ गया है...


उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने पर अभी मैं कुछ नहीं कहना चाहता परंतु प्रधानमंत्री का पद संसदीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पद है वह एक तरह से हमारे लोकतंत्र का मुखिया है... अपने दायित्वों के तहत प्रधानमंत्री को देश की आंतरिक व वाह्य सुरक्षा से संबंधी मामले भी देखने होते हैं, जिसमें  देश की आंतरिक व वाह्य गुप्तचर एजंसियों पर नियंत्रण व विभिन्न स्थानों व देशों में बैठे सूचनास्रोतों व देशहितसाधकों का ख्याल रखना भी होता है... अंतर्राष्ट्रीय राजनय इतना जटिल है कि कुछ विशेष अनुग्रह भी देने ही पड़ते हैं कुछ को ,राष्ट्र के व्यापक हितों की रक्षा के लिये... इन जटिलताओं को वही समझ सकता है जिसने सत्ता के सर्वोच्च स्तर पर यह सब देखा हो... 


ऐसे में आप बताइये कि...




क्या लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को भी लाने का हठ उचित है ?




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6 टिप्‍पणियां:

sajjan singh ने कहा…

प्रधानमंत्री को तो छोड़िये सरकार तो सांसद, सेना व न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और नौकरशाहों को भी इस बिल के दायरे में नहीं लाना चाहती । कई मंत्री, सांसद, मुख्यमंत्री, अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं । पीजे थॉमस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का मामला पुराना नहीं है जिन्हें सरकार मुख्य सतर्कता आयुक्त की कुर्सी पर बैठाना चाहती है । इस तरह का विधेयक लाकर सरकार अन्ना के साथ खेल खेल रही है ।

अमीत तोमर ने कहा…

एक बार इसे जरुर पढ़े कॉग्रेस के चार चतुरो की पांच नादानियां | http://www.bharatyogi.net/2011/06/blog-post_15.html

Tarkeshwar Giri ने कहा…

Soniya Gandhi isi se bachne ke liye Itly main Bank-Bank khel rahi hain.

Jeevaswa ने कहा…

१. किसी दिन कोई मधु कोड़ा, ए राजा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ गया, और देश के रहस्य बेचने लगा या पद पर रहते हुए गैरकानूनी कार्यों में लिप्त हुआ तो......

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रालय भी लोकपाल के दायरे से बहार होंगे... कोड़ा या राजा जैसे किसी ने गृह, रक्षा, विदेश, वित्त, उद्योग, पर्यावरण, संसदीय कार्य जैसे दस संवेदनशील मंत्रालय अपने पास ही रखे तो वे मंत्रालय अपने आप ही लोकपाल के दायरे से बाहर हो जाएंगे. जांच का कोई सवाल नहीं.

२. प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद पर नाकाबिल और भ्रष्ट लोगों को पहुँचते हम पहले ही देख चुके हैं, कहीं लोकायुक्त पद (समान्तर सत्ता) पर कोई भ्रष्ट पहुँच गया और सरकार पर नाजायज दबाव बनाने लगे तब.........?

मामला इतना सीधा नहीं है की बिना राष्ट्रव्यापी बहस के कुछ मंत्री और तीन चार एनजीओ वाले इसे फ्रेम करके लागू कर दें.

प्रवीण ने कहा…

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@ Jeevaswa,

आपकी चिंता जायज है, मैंने भी इसी ब्लॉग पर कुछ इस तरह से यही सवाल पूछा था...

सोचो अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा...

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anshumala ने कहा…

नहीं बिलकुल भी नहीं आप से सहमत हूँ प्रधानमंत्री को बिलकुल भी इसके दायरे में नहीं लाना चाहिए साथ ही मंत्रालयों को भी इससे बाहर रखना चाहिए कई बार देश चलाने के लिए कुछ फैसले ऐसे लेने पड़ते है जो हम दूसरो को नहीं बता सकते है कभी कभी किसी देश के दबाव में आकर अपराधी छोड़ने पड़ते है उसके देश से बड़े बड़े रक्षा सौदे करने पड़ते है उसके यहाँ की कंपनियों को भारत में अपनी जड़े ज़माने के लिए जमीन तैयार करके देना पड़ता है किसी किस चीज को किस किस को समझाया जाये किसी रक्षा सौदे में कोई कंपनी कुछ एक लाख करोड़ मंत्री के एकाउंट में डाल दे तो क्या बुरा है आखिर पैसा तो देश के अन्दर ही आ रहा है उसी पैसे से आज हमारे देशा का शेयर बाजार इतना ऊपर चढ़ा है देश में इतने बड़ी बड़ी महँगी इमारते खड़ी हो रही है वो सब किस पैसे से हो रहा है इसी पैसे से | और ये तो गलत बात है की मंत्री कमाए और नौकरशाह मुंह देखे ये लोकतान्त्रिक देश है यहाँ सभी को बराबर का मौका मिलाना चाहिए जितना पैसे कमाने का मौका एक मंत्री को मिलता है उतना ही मौका एक नौकरशाह को भी मिलाना चाहिए इसलिए लोकपाल के दायरे से सभी सरकारी करमचारियो को भी बाहर रखना चाहिए मुझे तो लगता है की ये बिल ही बेकार है ये सीधे सीधे हमारे लोकतंत्र पर हमला है क्या आज तक देश इसके बिना नहीं चल रहा था जब आज तक चल रहा था तो आगे भी चल सकता है |