शुक्रवार, 10 जून 2011

हाँ, उस दिन एक भारतीय रूपया पचास डॉलर के बराबर हो जायेगा, अमरीकन हिन्दुस्तान के गाँवों में लाईन लगाकर मजदूरी माँगेंगे, सोने की चिड़िया बस अब उड़ने ही वाली है... कल्पनालोक में जीता एक देश !!!

.
.
.

सबसे पहले तो पढ़िये भारत डोगरा जी का अमर उजाला में छपा यह संपादकीय...


काले धन का ४०० लाख करोड़ का आंकड़ा कितना हकीकत के करीब है ? ... कोई नहीं जानता यह...


पर यह लुभावना सपना कि, ४०० लाख करोड़ रूपये भारत में वापस आयेंगे... ६२४ जिलों में हरेक को मिलेगा साठ हजार करोड़ से ज्यादा... हर गाँव को मिलेगा सौ करोड़... एक भारतीय रूपये की कीमत हो जायेगी ५० अमेरिकी डॉलर... औेर पूरा पश्चिमी विश्व व अमेरिकन हमारे यहाँ काम माँगने आने लगेंगे !... 

क्या यह एक जटिल मुद्दे का अति सरलीकरण  नहीं है... 


भारत डोगरा जी लिखते हैं...

"  जाहिर है, यह ‘अर्थशास्त्र’ तथ्यों पर आधारित नहीं है। यह ऐसी उम्मीदें पैदा करता है, जिसका कोई आधार नहीं है। इसमें विदेशों में जमा धन को जो निर्णायक भूमिका दी गई है, उससे देश में विभिन्न स्तरों पर मौजूद विषमता, अन्याय, शोषण आदि से ध्यान हट जाता है और हमारी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में जरूरी सुधार का मुद्दा कमजोर पड़ जाता है। ऐसा लगता है कि सारी समस्याएं काले धन के देश में आ जाने से ही दूर हो जाएंगी।
काले धन के विरोध का यह ‘अर्थशास्त्र’ उस समाज-दर्शन के बिलकुल अनुकूल बैठता है, जिसमें अपने समाज की कुरीतियों व अन्यायों की ओर ध्यान न देकर केवल विदेशी कारकों को जिम्मेदार माना जाता है। यह सामाजिक सोच उस गौरवशाली अतीत की कल्पना पर आधारित है, जिसमें सब कुछ अच्छा और महान था। आज जरूरत इस बात की है कि इस कल्पनालोक से बाहर निकल कर इतिहास का अध्ययन वैज्ञानिक, तार्किक दृष्टिकोण से किया जाए, ताकि समाज को कमजोर करने वाली जाति-प्रथा, अंधविश्वास जैसी कुरीतियों को खत्म किया जा सके। "


तो इसी पर अपना आज का सवाल भी है...


क्या आज का भारतीय जनमानस इस कल्पनालोक से बाहर आने की इच्छा व क्षमता रखता है ?





...

16 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

अदमी को हमेशा कल्पनाओं मे जीना अच्छा लगता है लेकिन उसे ऐसी कल्पनाओं पर विश्वास तब आने लगता है जब ये सपने कोई भगवां चिला पहन कर उसे दिखाये।ाइसे सपने केवल और केवल अपनी कार्गुजारियाँ छुपाने के लिये होते हैं मै तो कहती हूँ कि देश मे जितना धन भगवाँ चोलों के अन्दर छुपा है अगर वही बाहर आ जाये तो देश मे खुश हाली छा जाये। धन्यवाद।

रचना ने कहा…

aaj kal mehgayii bahut ho gayee haen so nirmala kapila ji ki tippani ko hi meri maan liyaa jayae

ROHIT ने कहा…

अभी अभी हसन अली ने कबूल किया था कि उसका एक लाख करोड़ काला धन स्विस बैँक मे जमा है.

आपको क्या लगता है कि इस 121 करोड़ वाले देश मे 400 हसन अली नही है.

माना कि कांग्रेस 60 सालो से जनता को नीँद की गोली खिला कर सुलाये पड़ी है.

लेकिन जब कोई जगा रहा है तो जागने मे ही बुद्धिमानी है
.
न कि जगाने वाले की टांग खीचे.
नही तो स्थिति ऐसी बन जायेँगी.

कि अगली बार कोई जगाने वाला भी नही आयेगा.
क्यो कि सोने वालो को जगाया जाता है
मुर्दो को नही.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

मेरा मिशन आशा और अनुशासन का मिशन है। लोग बेहतरी की आशा में ही अनुशासन भंग करते हैं और जो लोग अनुशासन भंग करने से बचते हैं, वे भी बेहतरी की आशा में ही ऐसा करते हैं। समाज में चोर, कंजूस, कालाबाज़ारी और ड्रग्स का धंधा करने वाले भी पाए जाते हैं और इसी समाज में सच्चे सिपाही, दानी और निःस्वार्थ सेवा करने वाले भी रहते हैं। हरेक अपने काम से उन्नति की आशा करता है। जो ज़ुल्म कर रहा है वह भी अपनी बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहा है और जो ज़ुल्म का विरोध कर रहा है वह भी अपनी और सबकी बेहतरी के लिए ही ऐसा कर रहा है।
ऐसा क्यों है ?
ऐसा इसलिए है कि मनुष्य सोचने और करने के लिए प्राकृतिक रूप से आज़ाद है। वह कुछ भी सोच सकता है और वह कुछ भी कर सकता है। दुनिया में किसी को भी उसके अच्छे-बुरे कामों का पूरा बदला मिलता नहीं है। क़ानून सभी मुजरिमों को उचित सज़ा दे नहीं पाता बल्कि कई बार तो बेक़ुसूर भी सज़ा पा जाते हैं। ये चीज़ें हमारे सामने हैं। हमारे मन में न्याय की आशा भी है और यह सबके मन में है लेकिन यह न्याय मिलेगा कब और देगा कौन और कहां ?
न्याय हमारे स्वभाव की मांग है। इसे पूरा होना ही चाहिए। अगर यह नज़र आने वाली दुनिया में नहीं मिल रहा है तो फिर इसे नज़र से परे कहीं और मिलना ही चाहिए। यह एक तार्किक बात है।
हमें वह काम करना चाहिए जिससे समाज में ‘न्याय की आशा‘ समाप्त न होने पाए। ऐसी मेरी विनम्र विनती है विशेषकर आप जैसे विद्वानों से।
मान्यताएं कितनी भी अलग क्यों न हों ?
हमें समाज पर पड़ने वाले उनके प्रभावों का आकलन ज़रूर करना चाहिए और देखना चाहिए कि यह मान्यता समाज में आशा और अनुशासन , शांति और संतुलन लाने में कितनी सहायक है ?
इसे अपनाने के बाद हमारे देश और हमारे विश्व के लोगों का जीना आसान होगा या कि दुष्कर ?
इसके बावजूद भी मत-भिन्नता रहे तो भी हमें अपने-अपने निष्कर्ष के अनुसार समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए यथासंभव कोशिश करनी चाहिए और इस काम में दूसरों से आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए।

निम्न लेख भी विषय से संबंधित है और आपकी तवज्जो का तलबगार है :
http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/06/dr-anwer-jamal_8784.html

Pankaj ने कहा…

Kongresi निर्मला कपिला ki Jai HO.. Jai HO..

Jeevaswa ने कहा…

यह कोई हराम का पैसा नहीं है, यह देश का पैसा है जो जनता की खून पसीने की कमाई है. जिसे नेताओं और नौकरशाहों ने अघोषित रूप से जमा किया है. क्या किया जाएगा यह बाद की बात है, सबसे पहले यह वापस आये और जमा करने वालों पर मुकदमा चले. और लूट का पैसा कोई विदेशी करक नहीं है, देश से लूटकर विदेश में जमा किया गया है, ताकि वहा गोपनीय तरीके से सुरक्षित रहे.

पैसे वापस लाने का अशिक्षा, कल्पना, कुरीति, जातीप्रथा ब्ला ब्ला ब्लाह वगैरह से क्या सम्बन्ध?! कुछ भी.....

एक बार सरकारी खजाने में यह पैसा पहुँच जाए फिर वित्त मंत्रालय इससे चाहे विदेशी कर्ज अदा करे, स्कूल कॉलेज खोले, रिसर्च फंड करे या विकास कार्यों में लगाए. यह फिर उसका सिरदर्द है. सुप्रीम कोर्ट भी बार बार कह रहा है की जर्मनी और यूएस की तर्ज पर पैसे वापस लेन की प्रक्रिया शुरू करो. और खातेदारों के नाम सौंपो. पर सरकार सुनाने को राज़ी नहीं है.

विदेशों में जमा धन के अनुमान देश विदेश के वित्तीय विशेषज्ञों के आकलन, स्विस बैंक एसोसियेशन की रिपोर्ट्स, यूरोपीयन मीडिया घरानों की खोजबीन पर आधारित है. ४०० लाख करोड़ नहीं तो कम ही सही, क्यों इस पैसे को वापस नहीं लाया जाना चाहिए?

ROHIT ने कहा…

निर्मला कपिला जी
पहले आप अपनी कांग्रेस से कहिये कि जो हसन अली का एक लाख करोड़ (जो वो कबूल भी कर चुका है)
को ही राष्ट्रीय संपति घोषित करके वापस ले आये.
तो देश मे खुशहाली छा जायेगी.
एक लाख करोड़ जानती है कितना होता है.
इतना होता है कि एक करोड़ लोग लखपति बन सकते है.

डा० अमर कुमार ने कहा…

.हाँ ठीक है.. काला धन वापस आना चाहिये.... उन छिद्रों को बन्द करना चाहिये जहाँ से यह छन कर यह विदेशों को जता रहा है । पर... यदि रोहित जी और पँकज व्यक्तिपरक टिप्पणी न करें , पर यह तो स्पष्ट है कि योगाटीचर रामदेव यादव का तरीका गलत है । उनका अनशन देशहित में कम राजनीति प्रेरित अधिक है ... ्वरना ऎसे गुपचुप समझौते क्या सिद्ध करते हैं, जिसके बाद उनका अनशन अचानक तप में बदल जाता है.. मँच पर किसिम किसिम के रँगों में रँगे हुये राजनीतिज्ञों का जमावड़ा लग जाता है । माना कि दिल्ली प्रशसन ने गलत किया.. पर रामदेव का गलतबयानी के आधार पर रामलीला मैदान में योगशिविर के अनुमति लेकर अनशन का जमावड़ा खड़ा करना किस नैतिकता का द्योतक है ? एक सामाजिक आन्दोलन ( ? ) के अगुआ द्वारा कानून की इस प्रकार अवहेलना करना कहाँ तक जायज है ?

रही बात नारेबाजी की... तो जनता ने शाइनिंग इँडिया का सच भी देखा है, और अब रुपिया पीछे पचास डालर बँटते भी देख लेगी.... भारतीय चरित्र बड़ी जल्दी खामख्याली में बहल जाता है... तदपि जब तब राजनीतिक और धार्मिक बहेलिये जनमानस का आखेट करने निकल पड़ते हैं ।

बस देखते जाइये..... जिन लोगों में स्त्री को यथोचित मान देने की योग्यता नहीं हैं, उन बँधुओं की ओर से मैं निर्मला कपिला जी से क्षमा माँगता हूँ ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

हमें तो इस पोस्ट से अंदाज हो चला है कि बाबा समर्थकों में कितना दम है और वे विदेश से दौलत लाने पर क्या करने जा रहे हैं। वैसे उन्हें ये मौका देगा कौन?

ROHIT ने कहा…

डा .अमर कुमार जी
मैने कहाँ निर्मला कपिला जी का अपमान किया.
मैने तो उनको पूरा सम्मान देते हुये अपनी बात रखी है.
और जो सच बात है वो ही कही है.
इंडिया शाइनिँग हुआ हो या न हुआ हो लेकिन कांग्रेस के राज मे इंडिया बर्निँग जरुर हो रहा है.

Tarkeshwar Giri ने कहा…

रोहित जी से सहमत, वैसे मैं निर्मला जी से कहना चाहूँगा कि निर्मला जी उम्र के साथ- साथ सोच भी बदलिए. भगवा वस्त्र भारत के साधू -सन्यासियों कि पहचान हैं. जिस पूजा घर में आप पूजा करती हैं उस घर में भी कंही ना कंही भगवा रंग होता हैं. लालू यादव का चारा घोटाला , नरसिंह राव का घोटाला , सांसद रिश्वत कांड, बोफोर्स घोटाला कांड जैसे सैकड़ो घोटाले कांग्रेसियों के नाम हैं.

हिन्दू और मुसलमानों को आपस मैं लड़ाने का श्रेय भी कांग्रेस पार्टी को जाता हैं. हिन्दू और सिखों के बीच मतभेद फ़ैलाने मैं भी कांग्रेस का ही हाथ हैं.

बाबा राम देव तो पुरे भारत कि जनता कि बात करते हैं ना कि सिर्फ हिन्दू वर्ग कि.

सोच बदलिए. नहीं आने वाली पीढ़ी गुलाम पैदा होगी.

सलीम ख़ान ने कहा…

great article!

Swachchh Sandesh

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

कोई भी कारोबारी आदमी सरकार के ख़िलाफ़ लड़ ही नहीं सकता और लड़ता भी नहीं । जो ऐसा करता है सरकार उस पर और उसके मददगार व्यापारियों पर ढेर के ढेर मुक़ददमे लगा देती है और ऐसी लड़ाईयों में जानें तक भी गवाँ चुके हैं लोग ।
क्या बाबा जी अपनी जान माल का नुक्सान सह पाएंगे ?

हमारा आकलन यह है कि जल्दी ही बाबा और केंद्र सरकार में फिर से कोई समझौता गुपचुप हो जाएगा और इस बार बाबा पूरी ईमानदारी से उसका पालन भी करेंगे ।
मामले की नज़ाकत योग सेना वाले बाबा अच्छी तरह समझ चुके हैं ।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

कोई भी कारोबारी आदमी सरकार के ख़िलाफ़ लड़ ही नहीं सकता और लड़ता भी नहीं । जो ऐसा करता है सरकार उस पर और उसके मददगार व्यापारियों पर ढेर के ढेर मुक़ददमे लगा देती है और ऐसी लड़ाईयों में जानें तक भी गवाँ चुके हैं लोग ।
क्या बाबा जी अपनी जान माल का नुक्सान सह पाएंगे ?

हमारा आकलन यह है कि जल्दी ही बाबा और केंद्र सरकार में फिर से कोई समझौता गुपचुप हो जाएगा और इस बार बाबा पूरी ईमानदारी से उसका पालन भी करेंगे ।
मामले की नज़ाकत योग सेना वाले बाबा अच्छी तरह समझ चुके हैं ।

sajjan singh ने कहा…

मिथकों को इतिहास और इतिहास को मिथक बनाने का ये खेल अभी भी जारी है।

भाग्य चक्र से दूर

आशीष श्रीवास्तव ने कहा…

हरिद्वार की गंगा में खनन रोकने के लिए कई बार के लंबे अनशनों और जहर दिए जाने की वजह से मातृसदन के संत निगमानंद अब नहीं रहे। साधारण सा धोती-कुर्ता और खड़ाऊं पहने दुबली-पतली काया वाले एक संत बाकी संतों से कुछ अलग हैं। यह न बड़े पण्डाल में बैठ प्रवचन देते हैं, न ही टेलीविजन चैनलों में, पर गांधी को भूल चुके उनके अनुयायियों के लिए ये एक सीख की तरह हैं। देश की स्वाभिमानी पीढ़ी तक शायद यह खबर भी नहीं है कि गंगा के लिए एक संत 2008 में 73 दिन का आमरण अनशन करता है जिसकी वजह से न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का शिकार होता है।