गुरुवार, 9 जून 2011

कोई मुद्दा कितना ही बड़ा या सच्चा हो और उठाने वाला कितना ही कद्दावर भी... पर क्या आप इसे दरकिनार कर सकते हैं...

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पिछले कुछ समय से जो भी हो रहा है वह मुझे विस्तार से आपके सामने बताने की आवश्यकता नहीं लगती...

विगत कुछ समय से एक मनोवृत्ति सी विकसित हो रही है देश में... वह यह कि किसी भी मुद्दे पर जो भी व्यक्ति, संस्था या संगठन लोगों को जुटा पाने की क्षमता रखता है वह उस भीड़ की ताकत के जरिये लोकतंत्र को बंधक बना अपनी मांग पूरी करवाने का ख्वाब पालने लगा है...


हाल के गुर्जर आरक्षण आंदोलन, जाट आरक्षण आंदोलन या जनलोकपाल-काले धन वापसी-भ्रष्टाचार-मुक्ति आंदोलनों में भी यह प्रवृत्ति उभर कर आ रही है...


एक लोक तंत्र हैं हम... और किसी भी लोकतंत्र की दिशा निर्धारण उसका अपना संविधान करता है... और  संसद की सर्वोच्चता ( Supremacy of Parliament ) का सिद्धांत भी... यह सर्वोच्चता Non Negotiable है...

मेरा आज का सवाल है कि...




क्या किसी भी मुद्दे या व्यक्तित्व के लिये संसद की सर्वोच्चता ( Supremacy of Parliament ) के सिद्धांत से समझौता किया जा सकता है ?







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11 टिप्‍पणियां:

योगेन्द्र पाल ने कहा…

जब संसद में कुछ ऐसा होने लगे जो देश के हित में ना हो तो मुझे लगता है कि संसद की सर्वोच्चता से समझौता किया जा सकता है|

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

संसद की सर्वोच्चता का सम्मान तो इस बात पर निर्भर करता है कि उस का गठन करने वाले सांसद क्या कर रहे हैं।

Shah Nawaz ने कहा…

मेरे ख़याल से बिलकुल नहीं.... बल्कि जैसा की योगेन्द्र पाल जी कह रहे हैं, कि अगर संसद में देश हित के खिलाफ कार्य होने लगे तो संसंद के प्रतिनिधियों के बदलने का प्रावधान होना चाहिए... ना कि अपनी ढपली, अपना राग... और भीड़ के ज़रिये ब्लैक-मेलिंग...

संसद सदस्य ही जनता की राय का सही प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए वही जनता के सबसे सही प्रतिनिधि माने जाने चाहिए... और जनता अगर भ्रष्ट नेताओं को चुन कर भेजती है तो यह जनता की कमी है, उसे अपनी इस कमी में सुधार लाना चाहिए. हंगामा खड़ा करने और नाटकबाजी करने से लोकतंत्र तो अगवा हो सकता है लें देशहित तो कम से कम नहीं हो सकता है.


प्रेमरस

रचना ने कहा…

http://mypoeticresponse.blogspot.com/2011/04/blog-post.html

on the above link i have already said the same
reposting it again

खुद ईमानदार होते हुए भी जब इंसान गरीब होता हैं और बेईमान को अमीर देखता हैं तो शायद रास्ता दिखना बंद हो जाता हैं
लोकपाल बिल लाने के लिये अन्ना हजारे जी अनशन पर बैठ गए हैं । सोच रही हूँ जंतर मंतर हो आऊं , दर्शन कर लूँ । कुछ और भी सवाल मन मे उठ रहे हैं
जब गाँधी जी ने civil disobedience कि बात कि थी तब हमारी लड़ाई एक विदेशी शासक से थी
गाँधी जी ने उस विदेशी शासन कि जगह भारतीये लोगो को तैयार कर लिया था कि कौन क्या बनेगा भारतीये मंत्रिमंडल मे ।
यानी वहाँ ट्रान्सफर होना था शासन का
लेकिन इस समय तो ऐसा कुछ अभी कहीं नहीं दिख रहा
कोई भी ऐसा संगठन नहीं तैयार किया गया हैं जो तुरंत देश के शासन को संभल ले ।

ऐसे में civil disobedience से क्या होगा ? कहीं देश मे बजाये सब ठीक होने के मारा -मारी या जिस कहते हैं " anarchy " वो तो नहीं पैदा हो जायेगी ।

क्या हम सेना के हाथ मे शासन सौप देगे ??
क्या डेमोक्रेसी को खतरे मे डाल कर हम भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम लड़ेगे ??
अगर नहीं तो कौन होगा जो उस अव्यवस्थित स्थिति मे शासन कि बाग़ डोर संभालेगा ???

और अगर कल १०० आदमी कहीं अनशन पर बैठ जाये कि जो उनकी मांग हैं वो पूरी हो तब हम कैसे रिअक्ट करेगे जैसे जाट आन्दोलन को ही ले ।

और ये जो हर दिन अलग अलग जगह से राज्यों को बाँट कर नए राज्य बनवाने कि बात उठती हैं या जैसे नये राज्य बनाये जा रहे हैं ये विघटन बिलकुल उस समय से उलटा हैं जब आज़ादी कि लड़ाई के समय राज घरानों को इकठ्ठा कर के राज्यों मे तब्दील किया गया था

पता नहीं अन्ना हजारे जी के लिये मन मे बेहद सम्मान होते हुए भी लग रहा हैं ये रास्ता सही नहीं हैं ।
लेकिन ये भी नहीं पता हैं कि सही रास्ता कौन सा हैं । खुद ईमानदार होते हुए भी जब इंसान गरीब होता हैं और बेईमान को अमीर देखता हैं तो शायद रास्ता दिखना बंद हो जाता हैं

अजय कुमार झा ने कहा…

हाल के गुर्जर आरक्षण आंदोलन, जाट आरक्षण आंदोलन या जनलोकपाल-काले धन वापसी-भ्रष्टाचार-मुक्ति आंदोलनों में भी यह प्रवृत्ति उभर कर आ रही है...


क्या ये तीनों मुद्दे एक समान हैं खासकर जाट गुर्जर आरक्षण आंदोलन , जो रेल की पटरियों पर लडा गया और पूरे उत्तर भारतीय रेल व्यवस्था को प्रभावित कर गया । क्या आप बता सकते हैं कि अन्ना हज़ारे का पांच दिन चला आंदोलन और रामदेव का एक दिन चला आंदोलन कितनी सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान , आम आदमी की कितनी कठिनाई का बायस बना ।

अजय कुमार झा ने कहा…

संसद की सर्वोच्चता ?

संसद की सर्वोच्चता जनता के लिए ही क्यों ? जिस संसद में सांसदों की खरीद फ़रोख्त का नमूना , पटल पर प्रश्न रखने के लिए धन लेने जैसे अनेक उदाहरण हों , क्या आम जनता के मन में अब भी वो सर्वोच्चता बनी रहनी चाहिए । क्या सब कुछ मानने , समझने की जिम्मेदारी आम आदमी पर ही है ? बहुत से प्रश्न निकल गए हैं आपके प्रश्न से यदि मुद्दा खुद संसद की सर्वोच्चता और विशेषकर उसकी निरंकुशता से जुडा हो तब ??????

निर्मला कपिला ने कहा…

बिलकुल नही\ अगर आपकी संसद सही काम नही कर रही तो अगले चुनाव मे आपके पास बदलने का विकल्प मौज़ूद है फिर इतनी अधीरता किस बात पर रचना जी की बात भी सही है।

ROHIT ने कहा…

अगर जनता ने आपको संसद मे भेजा है तो जनता के लिये काम करने के लिये भेजा है.
मौज करने के लिये नही भेजा है.
और अगर कोई ये कहे कि भाई हमे तो जनता ने भेजा है अब हम चाहे जनता का उत्पीड़न करे. जनता का पैसा विदेशो मे भेजे.
और जनता को उसका विरोध करने का हक नही.
तो उसे मूर्ख कहा जायेगा.
जाट, गुर्जर आंदोलनो और बाबा के आंदोलन की कोई समानता नही.
जाट ,गुर्जर आंदोलन हिंसक थे बाबा का आंदोलन अहिँसक था .
और सबसे बड़ी बात सरकार ने जाट,गुर्जर आदि हिँसक आन्दोलनो मे कभी भी लाठीचार्ज नही किया बल्कि मांगे मानी.
लेकिन बाबा के आंदोलन अंहिसक होते हुये भी सरकार ने राक्षसी क्रत्य को अंजाम दिया.

और एक बात और बताता हू कि अगर ये आंदोलन बाबा की जगह किसी मौलाना का होता तो सरकार कभी भी ऐसा नही करती. बल्कि लल्लो चप्पो करती.

......................................
दिग्विजय सिँह के घर बच्चा पैदा हुआ
पत्रकारो ने पूछा तो दिग्विजय ने बताया.

"इसमे RSS और बीजेपी का हाथ है"

हा हा हा

anshumala ने कहा…

संसद सांसदों से है और सांसद कौन लोग बनते है, सांसद लोगो का प्रतिनिधि है किन्तु कितने लोगो का कुछ बीस या पच्चीस % लोगो का कई बार सांसद बने व्यक्ति से कही ज्यादा वोट उसके खिलाफ खड़े कुल प्रतिनिधियों को मिला होता है तो सांसद सभी का प्रतिनिधि नहीं होता है | आज के समय का सांसद जनता के लिए नहीं खुद के लिए अपनी पार्टी के लिए व्यापारियों के लिए काम करता है तो आम जनता इसके बाद भी क्या संसद और लोक तंत्र की इज्जत के नाम पर खड़ा तमाशा देखता रहे कुछ न कहे | अनाज सड रहा है लोग भूखे मर रहे है क्या कर रहे है सांसद घोटाले करने वालो को कोई सजा नहीं होती उलटे फिर से मंत्री बना दिया जाता है क्या करती है संसद कुछ नहीं | क्या आप को सच में लगता है की देश में संसद ही सर्वोच्च है उसके ऊपर कुछ नहीं कभी कभी लोक तंत्र में भी क्रांति की जरुरत होती है ये दिखाने के लिए की जनता वोट दे कर सो नहीं गई है वो जाग रही है उसे अपने हक़ का पता है और यदि आप उसे उसका हक़ नहीं देंगे तो वो बहुत कुछ और भी कर सकती है |

और आप इन दो आन्दोलनों को व्यक्ति विशेष से ही जोड़ कर क्यों देख रहे है ये मुद्दों की लड़ाई है यहाँ आम जनता मुद्दों का साथ दे रही है व्यक्ति विशेष का नहीं जनता किसी के लिए नहीं अपने लिए लड़ रही है | ये लड़ाई सरकार को गिराने के लिए नहीं, उसे हटाने के लिए नहीं लड़ी जा रही है ये सरकार में अपना वाजिब हक़ के लिए और सरकार को जगाने के लिए है उसे यद् दिलाने के लिए है की वो जनता के प्रति जवाबदेह है उसे जनता के लिए कम करना है वो हमारे सेवक है हमारे राजा नहीं हम पञ्च साल बाद का इंतजार नहीं करेंगे अभी सुधर जाओ |

आशीष श्रीवास्तव ने कहा…

प्रवीण जी,
ये जो लोग संसद की सर्वोच्चता पर उंगली उठाते है, क्या मतदान के समय मत देने जाते है?

भारत मे लोकतंत्र की जरूरत क्या है? बाबाओं के हवाले देश कर दो, वही देश चलायेंगे ?

इस देश को लोकतंत्र की जरूरत नही है। लोकतंत्र इसे समय से पहले मील गया है। इस देश को पाकिस्तान जैसे तानाशाहो की जरूरत थी ताकि उसे लोकतंत्र की महत्ता पता चलती!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

काफी विद्वानों की राय आ चुकी है। मुझे लगता हैकि अब मेरे कहने लायक कुछ बचा ही नहीं।

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बाबूजी, न लो इतने मज़े...
चलते-चलते बात कहे वह खरी-खरी।