मंगलवार, 24 मई 2011

चीन, रूस, कोरिया, ताईवान और जापान की तकनीकी महारत के पीछे क्या है....

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खबरें अक्सर मुझे बहुत निराश करती हैं... 

२१ वीं सदी के प्रथमार्ध में, १२१ करोड़ की आबादी वाला, तकरीबन ८-९ प्रतिशत की दर से साल दर साल अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाता, दुनिया के हर धंधेबाज के लिये संभावनापूर्ण बाजार बना हुआ तथा शीघ्र ही बदलते विश्व की एक महाशक्ति बन जाने के सपने पालता एक महादेश...


परंतु तकनीक के मामले में हम छोटे-छोटे देशों कोरिया, जापान, ताइवान यहाँ तक कि इजराईल से भी पिछड़े हैं...


चाहे उन्नत टैंक खरीदने हों या युद्धक विमान या पनडुब्बियाँ या मेट्रो के डिब्बे-इंजन या स्वदेश निर्मित लड़ाकू विमान ढांचे का एवियोनिक्स या तेल के कुंऐ खोदने की मशीनें या रेडीमेड कपड़े के कारखानों की मशीने या अल्ट्रासाउंड, सीटी-एमआरआई मशीनें... सब कुछ हमें विदेश से ही खरीदना होता है वह भी याचक मुद्रा में आकर...


अगर आजादी के तुरंत बाद हमारे नीति निर्धारकों ने उच्च व तकनीकी शिक्षा को देश की भाषा में दिये जाने की व्यवस्था की होती तो ऐसा नहीं होता... यह मेरा सोचना है...


कोई भी इन्सान अपनी मातृभाषा के जरिये काम करने पर बेहतर नतीजे निकालेगा बजाय थोप दी गई अंग्रेजी के... क्योंकि उस दशा में हर बार उसे 'अनुवाद मोड' में जाना होगा...



आपका क्या ख्याल है ?








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6 टिप्‍पणियां:

ajit gupta ने कहा…

आप सही कह रहे हैं, आज देश की अधिकांश प्रतिभाएं अंग्रेजी भाषा के कारण दूसरी पंक्ति में चड़ी दिखायी देती हैं। इसी कारण जो वैज्ञानिक प्रगति होनी चाहिए थी वह नहीं हो पा रही है। काश हम प्रतिभा का उपयोग उसकी भाषा में ही कर पाते?

Shah Nawaz ने कहा…

आपसे पूरी तरह सहमत हूँ..

अन्तर सोहिल ने कहा…

हम आज भी बच्चों के लिये कार्टून फिल्में भूत, भीम, जादू जैसी थीम पर बना रहे हैं।
कु्छ चैनलों पर चीनी या जापानी (पता नहीं) कार्टून सीरियल और फिल्में आती हैं, उनमें (लगभग सभी में) विज्ञान और तकनीकी वाले गैजेट का अहम रोल होता है।
यानि बचपन से ही उनके कार्टूनों द्वारा बच्चे के मन में विज्ञान को बढावा दिया जाता है।

प्रणाम

sajjan singh ने कहा…

एक बार अखबार में एक इंटरनेशनल सर्वे एजेन्सी की एक रिपोर्ट पढ़ी थी जिसमें अलग-अलग देशों द्वारा कराये गये आविष्कारों के पेटेंटों का ब्यौरा था । हम इस बात का बहुत दंभ भरते हैं कि हमारे यहां सबसे ज्यादा वैज्ञानिक और इंजिनियर तैयार होते हैं । सन् 2009 में अमरीका ने अकेले कुल 45000 आविष्कारों का पेटेंट अपने नाम करवाया । जर्मनी ने 26000 । जापान ने 16000 । चीन ने 8000 और भारत कुल मिलाकर सिर्फ 749 आविष्कारों के पेटेंट अपने नाम करा पाया । तकनीकी शिक्षा में कुछ बुनियादी सुधारों की दरकार है ।

anshumala ने कहा…

हमारी परम्परा महान हमारे वेद पुराण महान हमारी संस्कृति हमारा धर्म कितना वैज्ञानिक है, जो है उसमे ही संतोष करी ,भौतिकता वाद से दूर रहो , आधुनिकता बुरी है आदि आदि का प्रलाप करता आपना देश तकनीक में क्या खाक प्रगति करेगा | बाकि कसार भ्रष्टाचार पूरी कर देता है देश में एक आयुद्ध प्रयोगशाला है जिसका कम आधुनिक हथियार बनाना है हर साल करोडो का बजट चट कर जाता है और आज तक एक भी देश में निर्मित स्तरीय त्थियर नहीं दे सका , कृषि से जुड़े विश्व विद्यालयों और रिसर्च करने वाले सरकारी प्रयोगशालाओ पर भी करोडो खर्च होते है क्या दिया है कृषि के लिए, विदेश से आये बीटी बैगन ?

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

एकदम सही सोचा है आपने? भाषा ही समस्या इस देश में।