गुरुवार, 12 मई 2011

भट्टा परसौल से उठता एक सवाल यह भी तो है ही ... जिसका जवाब हम सभी को तलाशना चाहिये...

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आपने अक्सर देखा होगा कि आपके पड़ोस में मारपीट हुई लोगों में या कोई जेबकतरा भीड़ में किसी की जेब काट भागा या फिर किसी आदमी ने नाजायज तरीके से सार्वजनिक रास्ता रोका... तो सबसे पहला काम जो आप करते हैं वह है नजदीकी पुलिस थाने, चौकी, पोस्ट या मोबाइल वैन को खबर देना...

और अक्सर ही सबसे पहले मौके पर पहुंचते हैं दो वर्दीधारी जवान... ज्यादातर मामलों में डंडे के अतिरिक्त उनके पास कोई हथियार नहीं होता !

महज पुलिस में भर्ती होना ही किसी आम इंसान को सुपर-ह्यूमन नहीं बना देता जिसकी वजह से वह तमाम तरह के लफड़ों में निहत्थे कूद पड़े... किसी भी वर्दीधारी बल के जवान को यह साहस-यह शक्ति देता है उसका यह विश्वास कि समाज व्यवस्था बनाये रखने के उसके काम को सहयोग-सम्मान देगा व उसके अपने वर्दीधारी साथी हर हाल में उसकी रक्षा करेंगे, यदि उसके साथ कोई अन्याय हुआ उस पर कोई हमला हुआ तो तंत्र उस अन्याय-हमला करने वाले को हर हाल में कानून के आगे अपराधी के रूप में पेश करेगा ।

कम शब्दों में कहना हो तो इसे इस तरह से कहते हैं कि "  वर्दी का इकबाल हर हाल में बुलंद रहना चाहिये । "

अब बात करते हैं भट्टा परसौल की... किसानों की माँगें सही हैं या गलत, इस बहस में बिना पड़े जानें वहाँ हुआ क्या... तीन रोडवेज कर्मियों को बंधक बना लिया गया... उनको छुड़ाने के लिये प्रशासन ने वार्ता की... छोड़ने की सहमति बनी, पर बंधकों को लेने पहुंचे दल पर योजनाबद्ध तरीके से आटोमेटिक हथियारों से फायरिंग की गई... जिसमें पुलिस के दो जवान मौके पर ही मारे गये व उनके हथियार भी छीन लिये गये...

पुलिस के हमारे यह अधिकतर जवान भी किसान के ही बेटे होते हैं... किसान हितों के नाम पर तो राजनीति हो रही है, खबरिया चैनल चीख-चिल्ला रहे हैं... पर उन जवानों के हत्यारों को कड़ी से कड़ी सजा की माँग क्यों नहीं उठा रहा कोई... क्या कोई उन जवानों के परिवारजनों के आंसुओं की भी खबर देगा कभी..

माना कि हमारे किसानों की जमीनें बेशकीमती हैं...


पर क्या हमारी ही पुलिस के इन जवानों की जान का कोई मोल नहीं है ?



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डिस्क्लेमर : लेखक भी छह साल वर्दीधारी रहा है ।


4 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

प्रेम और राजनीति में इंसान कितना भी उठ-गिर सकता है .

ajit gupta ने कहा…

पुलिसवालों को मारकर हम अव्‍यवस्‍था के प्रति अपना आक्रोश निकाल लेते हैं लेकिन यह कभी नही सोचते कि वो भी इस देश का नागरिक है। हम केवल कूटनीति करना जानते हैं, समस्‍या सुलझाना हमारा मकसद नहीं है।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

आपका सवाल आज के सन्दर्भ में मौंजू है पर आप अपने से विचार करें कि वर्दी धारियों का रवैया कैसा होता है? एक-दो की बात छोड़ दें तो ज्यादातर खुद को ही कानून मानते हैं,
रात में ट्रेन की बर्थ से यात्रियों को उतार कर खुद सो जाना,
सड़क के किनारे खड़े रिक्शे वालों से, आम आदमी से बदतमीजी करना,
रात-विरात टहलने वालों से बिना गाली के बात न करना..
और भी बहुत सी बातें हैं...
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

निवेदिता ने कहा…

पुलिसवालों को मारने से किसी भी समस्या का समाधान नहीं मिल सकता ...कुछ गलत है तो बाकी की अवहेलना कर के उनको गलत हो जाने के लिये प्रेरित नहीं करना चाहिये ....अगर तिरस्कार करना है तो जिन नेताओं को हम चुन कर भेजते हैं और जो व्यवस्था को घुन की तरह नष्ट कर जाते हैं उन को करना चाहिये ....