सोमवार, 30 मई 2011

यस सर ! विल डू सर !! सॉरी सर !!! आल्वेज एट युवर सर्विस सर !!!! And that too, without any hint of having even a single bone in my spine Sir !!!!!

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आज सबसे पहले तो एक  खबर देखिये यहाँ पर... 


पब्लिक सेक्टर ( सरकारी ) के एक बड़े बैंक ' इंडियन बैंक ' के मुम्बई जोन के जोनल मैनेजर बनबिहारी पान्डा जी को पहले निलंबित व फिर स्थानान्तरित किया गया... उनका अपराध यह था कि उनसे भूलवश अपने चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर टी एम भसीन जी का 'लगेज' कार के अंदर बंद हो गया था... पान्डा जी अपने अधिकारी को एयरपोर्ट पर रिसीव करने गये थे...


पर यह पोस्ट पान्डा जी के समर्थन में नहीं है, मुझे उनसे कोई सहानुभूति भी नहीं, क्योंकि वह अपने सीएमडी को सीधे-सीधे "  भाड़ में जाओ और जो करना है कर लो, मैं कानून से न्याय ले लूंगा  "  कहने की बजाय मस्का लगाते स्पष्टीकरण व माफियाँ माँगने में लगे हैं... ( यहाँ देखें ) ... 


अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इन्डिया ने इस पूरे मामले पर संपादकीय लिखा है...

देखें  टाइम्स ऑफ इन्डिया का संपादकीय    "   Sarkari Scourge  "

अखबार लिखता है... " Democracy's representatives are expected to combat outdated ideas of domination and subservience, yet these have been institutionalized ".

यानी लोकतंत्र के प्रतिनिधियों से अपेक्षा तो यह थी कि वो प्रभुत्व व दासता जैसे पुराने विचारों से लड़ेंगे परंतु यह विचार हमारे समाज में संस्थापित हो गये हैं !


मेरा आज का सवाल इसी बात पर है... ऐसा क्यों हो गया है... 


क्यों आज हमारी राजनीति, नौकरशाही, मीडिया, उद्मोग-कॉरपोरेट जगत, साहित्य, कला,  लगभग हर क्षेत्र यहाँ तक कि फौज में भी  आगे बढ़ने के लिये अपने सुपीरियर की आँखें बंद कर बिना सवाल किये व अपनी गरिमा व सम्मान को गिरवी रखे हुऐ हुक्म बजाना व जी-हुजूरी करना जरूरी सा हो गया है ?

कहीं यह सब हमारे डीएनए, हमारी जीन संरचना में तो नहीं है ?







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2 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

कहाँ गया वो प्यार सलोना,
काँटों से है बिछा बिछौना,
मनुज हुआ क्यों इतना बौना,
मातम पसरा आज वतन में।
पंछी उड़ता नीलगगन में।।
-मंयक जी

समूह में रहना हमारा स्वभाव है लेकिन यह भी हमारा ही स्वभाव है कि हम सच को पसंद करते हैं और झूठ से नफ़रत करते हैं। यह सच की प्रकृति होती है वह सही होता है और शुभ परिणाम लाता है और झूठ ग़लत होता है और दुष्परिणाम दिखाता है।
समूह में रहने से हमें सुरक्षा और सुविधा मिलती है और हम दूसरों के साथ मिलकर अपने काम को बेहतर ढंग से अंजाम दे पाते हैं। इसी बेहतरी में इज़ाफ़े के लिए हम अपने काम की सराहना चाहते हैं और दूसरों के काम की सराहना करते हैं। यह भी स्वाभाविक है। इसमें ग़लत कुछ भी नहीं है लेकिन ग़लत तब होता है जब हम सत्य का पालन करके सराहना पाने के बजाय सराहना पाने के लिए मिथ्या लिखने लगते हैं और सार्थक लेख को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। ऐसा करना अपने स्वभाव के विरूद्ध चलना है और जो भी चीज़ अपने स्वभाव और अपने मक़सद के खि़लाफ़ जाती है, वह अंततः मिट जाती है।
हमें अपने स्वभाव के अनुसार ही चलना पड़ेगा। सत्य और न्याय का पालन करना ही पड़ेगा। जो चीज़ इंसानियत को ऊंचा उठाती है, वही चीज़ हिंदी ब्लॉगिंग को भी ऊंचाई पर ले जाएगी। इस यूनिवर्सिटी का मक़सद भी यही है।
आप की अर्थपूर्ण टिप्पणी के लिए आभारी हूं।
http://tobeabigblogger.blogspot.com/2011/05/blog-post_29.html

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

प्रिय प्रवीण जी, आज एक सफ़र के लिए निकलना हो रहा है लिहाज़ा अपनी ही एक टिप्पणी को थोड़ा तरमीम के बााद यहां लगा दिया है। लेकिन फिर दिल में आया कि इतने अच्छे लेख पर मूल में भी कुछ कहना चाहिए। आप बड़े ब्लॉगर हैं कहीं कॉपी पेस्ट की टिप्पणी से नाराज़ हो गए तो ?
रही बात जी हुज़ूरी के जीन में होने या न होने की, यह तो वैज्ञानिक ही बताएंगे लेकिन यह बात बिल्कुल सही है कि अगर हज़ारों साल तक किसी आदत की प्रैक्टिस हो जाए किसी क़ौम को तो वे आदतें उसके जीन ज़रूर चली जाती हैं।
आपको जो आशंका है, वह वास्तव में सच हो सकती है।
आपकी पोस्ट हमें इतनी अच्छी लगी कि आपके पाठकों को हम एक लिंक का कन्सेशन दे रहे हैं वर्ना एक लिंक इसमें भी डाल देता।
:)