बुधवार, 20 अप्रैल 2011

दहकता सवाल : एक कायर कौम, जाति का सम्मान, मोमबत्ती मार्च, मसीहा की तलाश और क्रान्ति ...

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यह खबर पढ़ें... बलात्कार के मामले में सजा पाये हुऐ व फिलहाल पेरोल पर रिहा एक दरिंदे ने गाँव के २०० लोगों की मौजूदगी में दो असहाय विधवाओं को पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया और पूरा गाँव इस काम को जातिगत सम्मान के नाम पर मौन समर्थन देता रहा... क्या इस गाँव के बाशिंदों को जन-पुलिस व जन-प्रशासन के लिये अब जंतर मंतर पर अनशन करना चाहिये ?

उसी जाति-क्षेत्र-धर्म के नाम पर रहनुमा बने हमारे ही बीच से निकले लोग संवैधानिक संस्थाओं की सरेआम हत्या कर रहे हैं/करेंगे, संविधान की आत्मा के साथ बलात्कार होता है/ रहेगा... मोमबत्ती मार्च भले ही हर चौराहे पर हों... जनलोकपाल भी बन जाये कोई... पर कोई क्रान्ति नहीं आने वाली... हमें ईमानदारी पसंद तो है पर अपनी नहीं, पड़ोसी की... मसीहा का इंतजार करती, परंतु नैतिक तौर पर कायर एक कौम क्या इससे बेहतर कुछ का सपना देखने का हक रखती है ?





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2 टिप्‍पणियां:

योगेन्द्र पाल ने कहा…

बहुत सही सवाल उठाया है आपने

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

नया कुछ कह नहीं सकता और पहले जो कह चुका हूँ उससे आप सहमत नहीं हैं .
हालात खराब से खराबतर ही होते जायेंगे. मैंने भी जब क़ानून की मदद ली तो कानून की ही 'मदद' करनी पड़ी.
http://quranse.blogspot.com/