शनिवार, 30 अप्रैल 2011

ईश्वर एक ही है... क्या वाकई ?

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चीख चीख कर कहते हैं सब धर्म कि :-


वह एक ही है !


पर मुझे तो नहीं लगता दोस्तों, कहीं वह जानवरों को जिबह कर/बलि ले खुश होता है तो कहीं अहिंसा से... कहीं वह बुतपरस्ती से खुश होता है कहीं बुतों को तोड़ने से... कहीं आप उसका चित्रण करो तो वह प्रसन्न होगा, कहीं आप अगर उसका चित्र या बुत बना दो तो वह नाराज हो जायेगा... कहीं वह तुरंत न्याय कर देता है तो कहीं वह आखिरी दिन ही आपका हिसाब करेगा... कहीं उसको रोजाना आपसे अपनी पूजा करवाना अच्छा लगता है तो कहीं वह इसी में खुश है कि कभी-कभी आप उसे याद कर लो...


मुझे तो नहीं लगता कि वह एक है...


मेरा तो मानना है कि वह हर किसी के लिये अलग है, जैसा आप चाहते हो वह भी वैसा ही बन जाता है/ बनने को तैयार है...


जैसे कि मेरे लिये वह अस्तित्वहीन हो गया है...

क्यों क्या खयाल है आपका ?




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7 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

कहा गया है तत त्वम् असि -वह तो तुम्ही हो !
तुभ्यं भगवानम स्वयं! प्रवीज जी ...इस पापी को तार दो ..... :)

Arvind Mishra ने कहा…

*तुभ्यं भगवानस्वयं! प्रवीण जी ...इस पापी को तार दो ..... :)

Mired Mirage ने कहा…

बिलकुल नहीं.मेरा वाला यदि होता तो होता नहीं, होती.मेरे मन के अनुरूप मेरे माप के अनुसार बने हुई स्त्री ईश्वर.
सबके ईश्वर अलग अलग हैं. किसी के मांस मांगने वाले, बलि मांगते, किसी के सर्वभक्षी, किसी के किसी विशेष भोजन से परहेज करते,किसी के स्त्री पुरुष को लगभग बराबर मानते, किसी के स्त्री को पुरुष के मुकाबले लगभग आधा मानव मानते,किसी के कहना न मानने पर आग में झोंकते तो किसी के क्षमा करने वाले.
शायद हमारा ईश्वर हमारी परछाई है, या हमारे मन का प्रतिबिम्ब.और दोनो ही वर्चुअल हैं .
घुघूती बासूती

प्रवीण शाह ने कहा…

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शायद हमारा ईश्वर हमारी परछाई है, या हमारे मन का प्रतिबिम्ब.और दोनो ही वर्चुअल हैं

घुघूती जी,

आभार आपका, इससे बेहतर और वह भी इतने कम शब्दों में नहीं कहा जा सकता, भविष्य में कई बार यह वाक्य प्रयोग होगा मुझ द्वारा, जाने-अनजाने... अग्रिम आभार...


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Tarkeshwar Giri ने कहा…

kudha to khud main hi hai, khojo to sahi

sajjan singh ने कहा…

ईश्वर एक हो ही नहीं सकता क्योंकि सभी ने उसे अपनी जरूरत और समझ के अनुसार बनाया है । धर्मों का क्या है धर्म तो बने ही लोगों को बरगलाए रखने के लिए है । सुन्दर पोस्ट , आभार ।
मेरे ब्लॉग पर भी पधारें- http://skepticthinkers.blogspot.com/

अन्तर सोहिल ने कहा…

मेरा तो मानना है कि वह हर किसी के लिये अलग है, जैसा आप चाहते हो वह भी वैसा ही बन जाता है/ बनने को तैयार है...

इन पंक्तियों से बडी राहत मिली।
शायद ऐसा ही है।
इस पोस्ट के लिये आभार
बहुत अच्छी लगी
प्रणाम स्वीकार करें