गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

आज का कुछ गंभीर सवाल : फेविकोल है या गैस कटर ? क्या है यह दोस्तों, बताइये तो जरा......

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अक्सर लोग कहते हैं कि यह दिलों को जोड़ता है, यह न होता तो छिन्न-भिन्न हो चुकी होती हमारी यह दुनिया... वैसे तो इसके अनेक फायदे बताये जाते हैं पर बताने वाले सबसे बड़ा फायदा यह बताते हैं कि इसी की वजह से इंसान की कौम एक है...

खैर यह सब तो कहने की बाते हैं पर जमीनी हकीकत है कि इसी की वजह से दुनिया के सारे झगड़े, लफड़े, फसाद, आतंकवाद, सीमायें, नफरत और इंसान की इंसान से दूरी है... कम से कम मुझ अल्पज्ञ का तो यही आकलन है...

तो जनाब आज का सवाल है :-

निम्न में से कौन सी बात को सही मानते हैं आप ?


१- धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं !

२- धर्म तोड़ता है जोड़ता नहीं !



जवाब देंगे न ?




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6 टिप्‍पणियां:

योगेन्द्र पाल ने कहा…

यदि कोई अपना धर्म किसी पर थोपे नहीं, और दूसरे के धर्म का मजाक ना उडाये तो "धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं" अन्यथा "धर्म तोड़ता है जोड़ता नहीं"

बहुत सही सवाल उठाया है आपने, मैं आज सुबह से इसी पर मनन कर रहा था, कि आपका यह सवाल आ गया|

कोई धर्म नहीं कहता कि परनिंदा करो, धर्म जोड़ना सिखाता है| वो तो उसको पालन करने वाले परनिंदा करते हैं और सिद्ध करते हैं कि धर्म तोडना सिखाता है|

एक सवाल आपसे भी करना चाहूँगा, आप "अपना ब्लॉग" के नियमित पाठक हैं, कृपया बताएं "अपना ब्लॉग" का नया रूप आपको कैसा लगा|

प्रवीण शाह ने कहा…

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@ योगेन्द्र पाल जी,

अपना ब्लॉग का नया रूप बहुत ही सुन्दर है, पर मुझे लगता है कि यह प्रारूप ब्लॉगरों को भा नहीं रहा इसलिये अपना ब्लॉग को ज्यादातर ब्लॉगर अभी इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं... आपने यदि ब्लॉगवाणी को देखा हो तो मैं तो आज भी यही कहूँगा कि यदि कोई एग्रीगेटर ठीक उसी टाइम टैस्टेड प्रारूप में आये तो सुपर-डुपर हिट होगा... आप भी सोचियेगा अवश्य मेरी इस सलाह पर...



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Shah Nawaz ने कहा…

प्रवीण जी, बेशक धर्म जोड़ता है... और जो व्यक्ति या समूह तोड़ने का कार्य कर रहे हैं वह गलत फ़हमी में रहते हैं की वह धर्म का पालन कर रहे हैं... केवल नाम किसी धर्म के साथ जोड़ देने भर से कोई व्यक्ति उस धर्म से जुड़ा हुआ नहीं माना जाना चाहिए... बल्कि धर्म से जुड़ा हुआ वही हो सकता है जो सही मायने में धर्म का मर्म समझता हो... आजकल तो हर ओर धर्म की दुकाने चल रही हैं... यह लोग धार्मिक नहीं बल्कि धर्म के क्षत्रु हैं, बल्कि धर्म ही क्या पूरी इंसानियत के क्षत्रु हैं...

Kavita Prasad ने कहा…

प्रवीणजी, इस प्रश्न का जवाब व्यक्तिगत सोच और हमारे आचरण पर निर्भर करता है, धर्म तो बाद मैं है पहले इंसानियत है| जो व्यक्ति दूसरे के जीवन की कद्र करता है, वह धर्मानुसार आचरण करेगा और एक दूसरे को जोड़ेगा| जो व्यक्ति सिर्फ अपने जीवन और उपभोगों को प्रार्थमिकता देता है वह धर्म मैं भी स्वार्थ ढूँढेगा|

निशांत मिश्र - Nishant Mishra ने कहा…

कोई भी धर्म केवल अपने-अपने वालों को ही जोड़ता है, यदि वह वाकई जोड़ सकता हो तो.

अन्तर सोहिल ने कहा…

एक धर्म में जो वर्जना है दूसरे में आवश्यक बना दी जाती हैं। तीसरे धर्म में जो जरुरी है, चौथे में उसे अनावश्यक और फालतू समझा जाता है।
कुछ ने कुछ नियम बनाये, उन्हें धर्म कहा। जो तुम करते हो हम ऐसा नहीं करेंगे। ये मेरे धर्म में गलत है।
इससे तो यही लगता है कि धर्म तोडता है।

प्रणाम