सोमवार, 18 अप्रैल 2011

क्या आपको यह नहीं लगता कि जंतर-मंतर पर बैठे अन्ना के अनशन का इस्तेमाल भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे व भ्रष्टों के साथ मिले व उनको बेशर्मी से प्रमोट करने वाले हमारे तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया ने 2G घोटाले मे्ं उसकी भूमिका के कारण आये दागों को धोने व खुद पर से ध्यान हटाने के लिये किया है व इस तरह एक बार फिर हमेशा की तरह आम आदमी के गुस्से की परिणति के रूप में कुछ आमूलचूल बदलाव होने से पहले कुछ कॉस्मेटिक उपायों के जरिये उस गुस्से को शाँत करने में हमारा तंत्र सफल रहा है ?


6 टिप्‍पणियां:

रचना ने कहा…

लोकपाल बिल लाने के लिये अन्ना हजारे जी अनशन पर बैठ गए हैं । सोच रही हूँ जंतर मंतर हो आऊं , दर्शन कर लूँ । कुछ और भी सवाल मन मे उठ रहे हैं
जब गाँधी जी ने civil disobedience कि बात कि थी तब हमारी लड़ाई एक विदेशी शासक से थी
गाँधी जी ने उस विदेशी शासन कि जगह भारतीये लोगो को तैयार कर लिया था कि कौन क्या बनेगा भारतीये मंत्रिमंडल मे ।
यानी वहाँ ट्रान्सफर होना था शासन का
लेकिन इस समय तो ऐसा कुछ अभी कहीं नहीं दिख रहा
कोई भी ऐसा संगठन नहीं तैयार किया गया हैं जो तुरंत देश के शासन को संभल ले ।

ऐसे में civil disobedience से क्या होगा ? कहीं देश मे बजाये सब ठीक होने के मारा -मारी या जिस कहते हैं " anarchy " वो तो नहीं पैदा हो जायेगी ।

क्या हम सेना के हाथ मे शासन सौप देगे ??
क्या डेमोक्रेसी को खतरे मे डाल कर हम भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम लड़ेगे ??
अगर नहीं तो कौन होगा जो उस अव्यवस्थित स्थिति मे शासन कि बाग़ डोर संभालेगा ???

और अगर कल १०० आदमी कहीं अनशन पर बैठ जाये कि जो उनकी मांग हैं वो पूरी हो तब हम कैसे रिअक्ट करेगे जैसे जाट आन्दोलन को ही ले ।

और ये जो हर दिन अलग अलग जगह से राज्यों को बाँट कर नए राज्य बनवाने कि बात उठती हैं या जैसे नये राज्य बनाये जा रहे हैं ये विघटन बिलकुल उस समय से उलटा हैं जब आज़ादी कि लड़ाई के समय राज घरानों को इकठ्ठा कर के राज्यों मे तब्दील किया गया था

पता नहीं अन्ना हजारे जी के लिये मन मे बेहद सम्मान होते हुए भी लग रहा हैं ये रास्ता सही नहीं हैं ।
लेकिन ये भी नहीं पता हैं कि सही रास्ता कौन सा हैं । खुद ईमानदार होते हुए भी जब इंसान गरीब होता हैं और बेईमान को अमीर देखता हैं तो शायद रास्ता दिखना बंद हो जाता हैं

Shah Nawaz ने कहा…

आपकी बातों में दम तो लगता है!

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

लोग बेईमानी को पाप मानते थे। लोक परलोक में ईश्वर पापों का दंड देता है , ऐसा सोचते थे । आधुनिक शिक्षा ने बताया कि ईश्वर , आत्मा और लोक परलोक सब मन का वहम है। अपने मन से वहम निकाल दो। लोगों ने अपने मन से ईश्वर को निकाला तो उसका डर भी निकल गया। इसके बाद उनके लिए बेईमानी पाप न रही बल्कि जल्दी से समृद्ध होने का जरिया बन गई । जो जितना बड़ा बेईमान है वह आज उतना ही समृद्ध और शक्तिशाली है और कानूनी सज़ाओं से वह बचा रहता है । इस तरह हम पाते हैं कि आज व्यवस्था का डर भी बड़े बेईमानों को नहीं है ।
अन्ना जैसे हज़ार नहीं बल्कि लाख भी आ जाएं तब भी उनके पैटर्न से समस्या का समाधान होने वाला नहीं है। जिन देशों में लोकपाल जैसे क़ानून काम कर रहे हैं , भ्रष्टाचार का ख़ात्मा वहाँ भी न हो सका ।
भ्रष्टाचार मिटाना है तो पहले रब पर ईमान लाना होगा और फिर उसके आदेश का पालन करना होगा, अन्यथा उसकी अवज्ञा का दंड लोक परलोक में भोगना होगा। इस लोक में तो हम भोग ही रहे हैं और आगे का भी सामने आ जाएगा।

आपका विश्लेषण आपकी गहरी नज़र का पता दे रहा है।
शुक्रिया ।

KK Yadav ने कहा…

कुछ ऐसे ही भाव यहाँ भी देख सकते हैं-
http://shabdshikhar.blogspot.com/2011/04/blog-post_09.html

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अन्ना भले ही इस मुहिम के नेता बन कर उभरे हों। पर इसे परवान चढ़ाया है उन नौजवान श्रमजीवियों ने जो आधुनिकतम तकनीक (आईटी) के संपर्क में काम करते हैं। यदि वे संगठित होंगे तो समाज का ढांचा भी बदलेगा और व्यवस्था भी। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि संगठित हुए बिना उन के पास कोई चारा भी नहीं है। हर मंदी सबसे अधिक उन्हें ही बरबाद करती है। मंदी फिर आती है, फिर फिर आती है।

Bhushan ने कहा…

आपके प्रश्न का उत्तर निश्चित रूप से हाँ है. भ्रष्टाचार में डूबी ऐसी बहुत सी एजेंसियाँ/विभाग हैं जो लोकपाल बिल को लागू नहीं होने देंगे और इसके परव्यू से बाहर भी रहेंगे.