गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

यह अचानक क्यों समेट लिये गये तम्बू-कनात... और लपेट लीं गई दरियाँ भी ?

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अपने इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कमी तो नहीं छोड़ी थी कहीं से भी, किसी चैनल ने लगाये थे पचास कैमरे और पचास रिपोर्टर और किसी ने सौ कैमरे और पचास रिपोर्टर... हर पल की खबर भी दी जा रही थी... अन्ना को लगा जुकाम पूरे देश की चिन्ता बनता जा रहा था... चैनलों के क्रीपर दिखा रहे थे... अन्ना का पल्स रेट ७२ प्रति मिनट, ब्लड प्रेशर १५६/९० व तापमान १०० डिग्री फैरनहाइट... तीन दिन के अनशन के बाद सोनिया गाँधी के दरवाजे पर धरना देने की घोषणा भी की गयी थी... जेल भरो भी चलने वाला था...




पर अचानक ही समेट लिया गया सब कुछ... तम्बू, कनात व दरियाँ भी... बिना कुछ ठोस वजह बताये...




कुछ समझ सकें हों, तो आप ही बताइये कि क्यों किया गया ऐसा ?



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रविवार, 11 दिसंबर 2011

'हिन्दी ब्लागिंग', बोले तो- निट्ठल्ले लोगों का आत्मालाप... समाज के दोयम दर्जा प्राप्त लोगों का प्रलाप ???

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सच कहूँ तो ब्लॉगवुड में एकदम खरी-खरी लिखने में अरविन्द मिश्र जी का कोई सानी नहीं... आदरणीय ज्ञानदत्त पान्डेय जी की इस पोस्ट पर लिखी गई उनकी इस टिप्पणी को देखिये जरा...


" हिन्दी ब्लागिंग दरअसल निट्ठल्ले लोगों का आत्मालाप है ..समाज के दोयम दर्जा प्राप्त लोगों का प्रलाप -काम काज के लोग कब का ब्लागिंग छोड़ चुके -कुछ तो काल के बियाबान में खो गए कुछ बेहया यहाँ दिख कर भी अब लिखते नहीं …एक अपरिपक्व पाठक वर्ग के लिए क्यों बहुमूल्य समय जाया किया जाये …"

एक निर्मम आकलन है यह, खास तौर से एक ऐसे ब्लॉगर की ओर से जो स्वयं  हिन्दी ब्लॉगिंग के एक बड़े नाम हैं और पाँच ब्लॉगों से सक्रिय तौर पर जुड़े हैं... और सबसे बड़ी बात यह भी है कि कुछ हद तक हकीकतबयानी भी है यह आकलन...


आज का अपना सवाल इसी बात पर है...




जो न निठल्ला है और न ही समाज से दोयम दर्जा प्राप्त... क्या उसके लिये नहीं है हिन्दी ब्लॉगिंग... और यह 'परिपक्व पाठक' कैसे और कब तक मिलेगा हिन्दी ब्लॉगिंग को ... :))




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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

FDI और लोकपाल मुद्दों के बीच में भुला दी गईं हमारी महिलायें... :(

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सच कहूँ तो मैं भारतीय संसद में महिलाओं के लिये तैंतीस फीसदी सीटें आरक्षित करने के कदम का कभी भी समर्थक नहीं रहा...


मैंने
यहाँ पर
और, एक बार फिर से
यहाँ पर भी...

इस कदम के विरोध में लिखा भी...

पर आज अचानक मैंने नोटिस किया कि...

संसद का शीतकालीन सत्र जारी है...

मल्टी ब्रान्ड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर हंगामा बरपा हुआ है आजकल... जैसे तैसे यह मसला निपटेगा तो फिर लोकपाल-जोकपाल की नोंकझोंक शुरू हो जायेगी... और भी बहुत से मुद्दे हैं जो संसद की बहसों व हंगामों की वजह बनेंगे... पर यह तो बहुत ही आश्चर्यजनक है कि 'महिला आरक्षण बिल' की कोई भी बात तक नहीं कर रहा...



क्या यह मान लिया जाये कि महिला आरक्षण बिल को हमेशा-हमेशा के लिये दफन कर दिया गया है ? 

अगर ऐसा हुआ है तो सही हुआ या गलत,
क्या ख्याल है आपका ?





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शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

देश के हित में है उत्तर प्रदेश के चार हिस्से होना ! आप क्या कहते हैं ?

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 यद्मपि हर कोई अपनी अपनी समझ व सुविधा से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी के उत्तर प्रदेश का विभाजन कर उसके चार प्रदेश बनाने के प्रस्ताव के निहितार्थ तलाश-निकाल रहा है... फिर भी यह निश्वित रूप से एक दूरगामी व सकारात्मक सोच के साथ लिया गया फैसला है...


क्या यह सही नहीं है कि किसी भी प्रशासनिक इकाई का आकार थोड़ा छोटा ही होना चाहिये, जिससे कि सभी पर नियंत्रण व सभी का ख्याल रखा जा सके... चार अलग अलग प्रदेश होने से वहाँ का राजनीतिक नेतृत्व भी स्थानीय ही होगा जो स्थानीय समस्याओं, आकाँक्षाओं व जरूरतों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होगा... विकास की बयार पूरे के पूरे इलाके में एक ही रफ्तार से बहेगी... असमान विकास काफी हद तक रूक पायेगा... कुछ नये शहर, नई राजधानियाँ, नये संस्थान वजूद में आयेंगे... फायदे देखा जाये तो अनेकों हैं... और नुकसान एक भी नहीं...

आज का अपना सवाल है :-


"उत्तर प्रदेश का प्रस्तावित विभाजन निश्चित रूप से एक दूरगामी व सकारात्मक सोच के साथ लिया गया फैसला है" 
आप इस पर क्या कहते हैं ?










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शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

क्या खिलाड़ियों के 'भारत रत्न' पर सचिन तेंदुलकर का 'पहला व सबसे बड़ा हक' बनता है ?

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इस समय जो नियम हैं उनके मुताबिक 'भारत रत्न' खेल में किये गये प्रदर्शन के आधार पर किसी भी खिलाड़ी को नहीं दिया जा सकता...

सचिन तेंदुलकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सैकड़ों के सैकड़े ( Century of Centuries) के बेहद करीब हैं ऐसे में बार बार उनको 'भारत रत्न' देने की माँग उठती है, उठेगी ...

हो सकता है कल नियम बदल दिया जाये और खिलाड़ियों को भी 'भारत रत्न' मिल सके...

ऐसे में मेरा सवाल है ...


क्या खिलाड़ियों के भारत रत्न पर मेजर ध्यानचंद, विश्वनाथन आनंद, कपिल देव व अन्य कईयों का हक सचिन से बढ़कर नहीं है, या सचिन का ही सबसे पहला और सबसे बढ़कर हक बनता है ?





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रविवार, 23 अक्तूबर 2011

मुझे अच्छा लगा यह ' हारम ', आपको क्या लगता है ?

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मेरी पोस्ट बड़ी मुश्किल है भाई, कोई और जुगाड़ जानते हो क्या आप ?  पर प्रिय चंदन कुमार मिश्र ने अपने कमेंट में इसका लिंक दिया था... 





यह अच्छा संकलक है...


सारी नई ब्लॉग पोस्टें आप देख सकते हो यहाँ  ...


जगह जगह हो रही विभिन्न टिप्पणियाँ भी यह दिखाता है यहाँ ...


आप यह भी देख सकते हैं कि पिछले चौबीस घंटे में किसने कितना टिपियाया या कितनी पोस्टें की...


सीधा सरल इन्टरफेस भी है इसका...

कुल मिलाकर मुझे तो बहुत जमा यह ' हार ' ...







आपको क्या लगता है ?




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सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

अब अचानक यह 'मौनव्रत' क्यों ले बैठे हैं अन्ना ?

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यह मेरे लिये एकदम नई जानकारी है कि स्वास्थ्य लाभ के लिये सामान्य बातचीत भी बंद कर मौन व्रत लेने से स्वास्थ्य लाभ होता है...


बहरहाल जो भी हो अपने अन्ना आजकल अनिश्चितकालीन मौन व्रत पर हैं स्वास्थ्य लाभ के लिये... इसके लिये बाकायदा एक कुटिया भी बनाई गई है ( जैसा टी०वी० वालों ने दिखाया )...


अपना आज का सवाल है...





क्या अन्ना के इस अनिश्चितकालीन मौन व्रत का कोई संबंध है ?


* प्रशांत भूषण के हालिया विवादास्पद कश्मीर संबंधी बयानों से...
** राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अन्ना के संबंधों को लेकर लगातार असहज करते सवालों व उद्घाटनों से...
*** भाजपा के कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की जमीन घोटाले में भ्रष्टाचार के आरोप में हुई गिरफ्तारी से...




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रविवार, 16 अक्तूबर 2011

हमारी यह जेलें वाकई ' सुधार ग्रह ' हैं या हैं ' बीमारी का अड्डा ' ???

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बड़ा ही विचित्र संयोग सा है यह...इधर आडवाणी जी का भ्रष्टाचार से मुक्ति हेतु रथ निकाला और उधर लोकायुक्त कोर्ट ने कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा की जमीन घोटाले में गिरफ्तारी का आदेश दे दिया... बहरहाल आज येदियुरप्पा अस्पताल पहुंच गये...




पहले भी आपने देखा ही होगा कि हमारे नेता, अभिनेता, नौकरशाह, उद्योगपति तथा 'प्रभु वर्ग' के अन्य लोग भी अव्वल तो कभी जेल भेजे ही नहीं जाते...और यदि खुदा-ना-खास्ता भेज भी दिये गये तो जाने के अगले दिन ही इतने बीमार हो जाते हैं कि अस्पताल भर्ती कराने की नौबत आ जाती है...


अपना आज का सवाल यही है...


हमारी यह जेलें वाकई ' सुधार ग्रह हैं ' या हैं बीमारी का अड्डा ( जहाँ जाते ही ' प्रभु वर्ग ' को हर अगली-पिछली और नई भी, बीमारियाँ घेर लेती हैं ) ?



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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

इस 'जनमत संग्रह' का नतीजा क्या आयेगा ? अंदाजा लगायेंगे क्या ' नागरिक-समाज-प्रतिनिधि (???) ' प्रशांत भूषण जी...



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टीम अन्ना के सदस्य और भारत महादेश के 'नागरिक-समाज' के जबरिया थोपे गये पाँच प्रतिनिधियों में से एक सुप्रीम कोर्ट के वकील श्री प्रशांत भूषण जी ने 25 सितंबर को वाराणसी में प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में कश्मीर के संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में फरमाया...

जम्मू-कश्मीर को बल के ज़रिए देश में रखना हमारे लिए घातक होगा...देश की सारी जनता के लिए घातक होगा...सिर्फ वहां की जनता के लिए नहीं पूरे देश की जनता के हित में नहीं होगा...मेरी राय ये है कि हालात वहां नार्मलाइज़ करने चाहिए...आर्मी को वहां से हटा लेना चाहिए...आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पावर एक्ट को खत्म करना चाहिए...और कोशिश ये करनी चाहिए कि वहां की जनता हमारे साथ आए...अगर उसके बाद भी वो हमारे साथ नहीं है...अगर वहां की जनता फिर भी यही कहती है कि वो अलग होना चाहते हैं...मेरी राय ये है कि वहां जनमत संग्रह करा के उन्हें अलग होने देना चाहिए...

यह कहते हुए प्रशांत भूषण साहब  देश हित को एकदम दरकिनार करते हुऐ बहुत ही सुविधाजनक रूप से यह भूल गये कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह बयान एक व्यक्ति का नहीं, भारत के पूरे नागरिक समाज की राय मानी जायेगी...


बयान पढ़-सुन खून तो अपना भी बहुत खौला... कश्मीर के बारे में मैं क्या सोचता हूँ इस पर कई बार लिखा है मैंने , सामने प्रशांत भूषण होते तो मैं क्या कर बैठता, खुद मुझे पता नहीं... फिर भी किसी भी प्रकार की हिंसा का विरोध करते हुऐ भी मेरा सवाल है कि...


 भगत सिंह क्रान्ति सेना के उन युवकों ने प्रशांत भूषण जी के साथ जो कुछ किया वह सही था या गलत, इस पर जनमत संग्रह हो तो नतीजा क्या आयेगा ? अंदाजा लगायेंगे आप ?



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मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

बड़ी मुश्किल है भाई, कोई और जुगाड़ जानते हो क्या आप ?

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पहले 'ब्लॉगवाणी' बंद हुआ, फिर 'चिठ्ठाजगत' रूठ गया... 'अपना ब्लॉग' ने भी मुँह फेर लिया और आज 'हमारी वाणी' का अकाउंट भी सस्पेन्ड दिख रहा है...

ले दे कर मेरे पास अब ' हिन्दी ब्लॉग जगत ' ही बचा है कुछ चुनिंदा ब्लॉगों तक पहुँचाने के लिये... बड़ी मुश्किल है भाई...



इसी पर अपना आज का सवाल है :-


कोई और जुगाड़ जानते हो क्या आप ? ढेर सारे उन हिन्दी ब्लॉगों तक पहुंचने का जहाँ कुछ घटित हो रहा हो, यदि हाँ, तो बताइये न सभी को !


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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

'अन्ना इफेक्ट' : अंदर की बात कुछ और ही है !

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पिछले सवाल पर आदरणीय रतन सिंह शेखावत जी ने टीपा:-

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…
न तो कहीं नजर आ रहा है और ना ही कभी नजर आएगा| क्योंकि सिर्फ टोपी पहनकर तिरंगा लहराने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होने वाला उसके लिए पहले खुद को सुधरना होगा जो कोई करना नहीं चाहता!! सब को रिश्वत देने में दिक्कत है लेने में नहीं!!

जरा गंभीरता से सोचिये, क्या हम में से अधिकाँश कुछ इसी तरह की सोच नहीं रखते... अन्ना टोपी पहने हम ख्वाब देखते हैं कार के नये मॉडल, ३ डी टीवी, नये फ्लैट, नया किचन, ब्रांडेड कपड़े, नये आइटी उपकरण और भी तमाम उपभोक्तावाद जन्य चाहतों का... और उन्हें पाने के लिये धीरे-धीरे अपने सारे जीवन मूल्य कुरबान करते रहते हैं... व्यवहारिकता के नाम पर... 


मुझे अभी तक तो कहीं से नहीं लगा कि भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने का संकल्प हमारे सामूहिक मानस के दिल से निकला है... यह केवल गाल बजाने-गपियाने-गरियाने-गुर्राने और फिर पहले की तरह ही अपनी अपनी बेईमानियाँ बेरोकटोक करते जाने की प्रवृत्ति सा लग रहा है... मुझे खुशी होगी यदि मैं गलत होऊँ...




आप बताइये, आपके अंदर की बात क्या है ?




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बुधवार, 14 सितंबर 2011

'अन्ना इफेक्ट' : दिख रहा है क्या आपको कहीं पर भी ?

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अन्ना का आमरण अनशन खत्म हुआ... भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में पचास फीसदी जीत का दावा किया खुद अन्ना ने... भ्रष्टाचार विरोधी टीशर्ट-टोपी धारी भीड़ ने भी खूब पटाखे छोड़े, मिठाई बाँटी... और फिर ???


मुझे तो इस आंदोलन के बाद भी अपने चारों ओर व्याप्त, सर्वव्यापी, चाहते या न चाहते हुऐ भी सब को अपने फंदे में जकड़ते रोजमर्रा की जिंदगी में आम हिंदुस्तानी के द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार में कोई कमी नहीं दिखी अभी तलक... माने खाली जुबानी जमा-खर्च किये भाई लोग...



क्या आपको कहीं दिखाई दे रहा है अन्ना इफेक्ट ?



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रविवार, 14 अगस्त 2011

जी नहीं, हमारे लोकतंत्र के महापर्व 'पंद्रह अगस्त' के दिन अंधेरा करना मुझे तो कतई मंजूर नहीं है, अपनी आप बताइये...

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क्षुब्ध हूँ मैं... खासकर तब, जब मुझे कोई विरोध होते नहीं दिखता... सबसे पहले टीवी के खबरिया चैनलों पर स्क्रीन के नीचे स्क्रॉल होते देखा...       'अरविन्द केजरीवाल ने सभी से पंद्रह अगस्त के दिन रात आठ बजे से नौ बजे तक अपने घरों में बिजली बन्द कर अंधेरा करने की अपील की '... फिर अपने अन्ना ने भी इस अपील को दोहरा दिया...

जरा सोचिये क्या टीम अन्ना इस तरह की अपील दीवाली, ईद, गुरू परब या क्रिसमस के दिन करने की सोच भी सकती है... तो फिर विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के महापर्व १५ अगस्त के दिन अंधेरा करने की यह बेहूदा अपील क्यों... जनलोकपाल बनाने का ठेका अपने ऊपर लादे इस टीम और स्वतंत्रता दिवस ध्वजारोहण समारोहों का बहिष्कार करने की अपील करते विभिन्न अलगाववादियों में आखिर कुछ तो बुनियादी फर्क होना चाहिये... 

जनलोकपाल जैसे अनेकों विधेयक संसद में पेश होंगे, उन पर बहस होगी और संशोधित भी होंगे... व्यक्तित्व आते-जाते रहेंगे... अनेकों अनशनों-खतरों-जिदों-संकटों-चुनौतियों का सामना करेगा हमारा यह लोकतंत्र... और एक दिन ऐसा भी आयेगा ही जब सभी समझ जायेंगे कि आखिर स्वतंत्रता दिवस के इस महापर्व के मायने क्या हैं... क्यों मनाया जाता है यह उत्सव...

जी नहीं, हमारे लोकतंत्र के महापर्व के दिन अंधेरा करना मुझे मंजूर नहीं है... किसी भी सूरत में...


 आप बताइये कि क्या आप अंधेरा करोगे, इस पंद्रह अगस्त को रात आठ से नौ बजे ?



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बुधवार, 27 जुलाई 2011

यह नारियों की चिंता-विंता छोड़ो और सभी को यह बता दो कि तुम्हारा हिडन एजेंडा क्या है पार्टनर ?

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अचानक देख रहा हूँ कि फिर से जुमले उछल रहे हैं कुछ इस तरह के :-

महिलाएं दैहिक आकर्षण के खिलाफ आवाज़ उठाने के जगह खुद तंग कपड़ों मैं शारीरिक प्रदर्शन करके खुश होती हैं ? क्यों महिलाएं फिल्म और विज्ञापनों मैं दिखने वाली अर्धनग्न मोडल और एक्ट्रेस की नक़ल करती हैं?


क्यों सारी आज़ादी कुछ महिलाओं को कम वस्त्रों मैं घूमने और घर के बाहर केवल टाइम पास या ऐश ओ आराम के लिए नौकरी करने में ही नज़र आती है?

क्या अपनी संतान की अच्छी परवरिश करना, उसको दूध पिलाना, घर को संभालना और जब तक ज़रुरत ना हो नौकरी के बदले घर की जिम्मेदारियों को उठाना तो औरत का बुनियादी फर्ज नहीं है ?

क्यों आज की एक औरत  खुद को शरीर की सुन्दरता से तराजू मैं तौलती है? क्यों वो यह नहीं कहती की मेरा शरीर नहीं मेरा किरदार देखो?

परदा, लज्जा, शर्म और हया औरत का गहना है। 



बहुत जरूरी है कि जवान होते ही लड़कियों की शादी हो जाये और शादी से पहले किसी भी सूरत में स्त्री-पुरूष साथ न रहें, पढ़ने के लिये भी नहीं ।




सच कहूँ तो इन जुमलों को उछालने वालों के कपड़ों का कोई विशेष रंग नहीं है... हरा वस्त्र धारी और भगवा धारी दोनों ही एक सुर में यह जुमले उछालते हुऐ आज की नारी के लिये विशेष रूप से चिंतित हैं... उनकी हाँ में हाँ मिलाती नारियों की भी कमी नहीं... 


थोड़ा दूर से जब मैं इस नजारे को देखता हूँ तो मुझे यह जुमले उछालते लोग नारी के लिये चिंतित नहीं लगते उनका असल एजेंडा है अपनी मध्ययुगीन मान्यताओं और सोच को वैधता दिलाना और इसी बनाने बहाने आज की प्रगतिशील औरत को फिर से घूंघट-परदे के पीछे अंधेरों में बच्चे पैदा करने व पालने की मशीन के तौर पर कार्य करने के लिये धकेल देना...


तो क्या आप भी आज मेरे साथ-साथ यह सवाल पूछेंगे...


यह यकायक तुम्हारे दिमाग में उत्पन्न 'नारियों की चिंता' छोड़ो और सभी को यह बताओ कि 'हिडन एजेंडा' क्या है पार्टनर ? 






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रविवार, 24 जुलाई 2011

भाई आप क्लोरमिंट क्यों खाते ... ओह्ह सॉरी, हिन्दी ब्लॉगिंग क्यों करते हैं ???

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बहुत-बहुत वो क्या कहते हैं, कन्फ्युजिया गये हैं अपन... योगेन्द्र पाल जी कहते हैं हो सकती है ब्लॉगिंग से कमाई पर अपने मासूम साहब का विचार दूसरा है वह फरमाते हैं कम से कम अभी तो हिन्दी ब्लॉगिंग से कमाई के ख्वाबों में टाइम खोटी न करो... अपने को तो यह भी लगता है कि अभी तो ब्लॉगवुड के सुपर स्टारों के पास भी पाठकों का टोटा है...

अपनी बताऊँ तो हिन्दी में ब्लॉगिंग कभी भी मैं किसी कमाई आदि की आशा में नहीं करता... लिखता सिर्फ इसलिये हूँ कि दिमाग में जो चल रहा है कहीं तो बाहर निकलेगा ही... ब्लॉग पर इसलिये, क्योंकि पब्लिश बटन दबाते ही छप जाता है... बाकी अपने हमख्यालों के साथ का लालच तो है ही... वह दिन अभी कम से कम दस बरस दूर है जब ज्यादातर हिन्दी वालों के पास नेट सुविधा होगी और दो तीन लाख से अधिक का समर्पित पाठक वर्ग होगा... इसके लिये हमें व्यक्तित्वों के मोह, गुणगान व उन्हीं पर केन्द्रित ब्लॉगिंग से बच मुद्दों और विषयों पर आधारित लिखना होगा... 


 आज तो आप बताईये कि,


आप क्लोरमिंट क्यों खाते ... ओह्ह सॉरी, हिन्दी ब्लॉगिंग क्यों करते हैं ?





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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

यह बुजदिल-हरामी-गद्दार ऐसा कर के आखिर क्या पाना चाहते हैं ?

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मेरे मन में गुस्सा है आज... किसने किया मैं नहीं जानता... अभी तो जाँच एजेंसियाँ भी नहीं जानती ... पर कल शाम मुंबई में एक बार फिर से योजनाबद्ध तरीके से सीरियल बम ब्लास्ट कराये गये (लिंक)... 


एक बार फिर अपने घर से बाहर बाजारों में जिंदगी की जद्दोजहद से जूझते २० से ज्यादा आप और मुझ जैसे ही आम हिन्दुस्तानी मारे गये और १०० से ज्यादा घायल हुऐ...


यह सब करने वाले बुजदिल हरामी कहीं किसी कोने में दुबक अपनी इस हरकत पर इतराते होंगे...


मेरा आज का सवाल है कि...






यह बुजदिल हरामी ऐसा कर के आखिर क्या पाना चाहते हैं ? और ऐसा कर के आखिर उन्हें मिलेगा क्या ?














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सोमवार, 11 जुलाई 2011

हजारों चाहतें हैं मेरी, और हर चाहत के लिये लेना होगा जनम मुझे कई-कई बार... आप ही कुछ मदद करो मेरी...

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इन्टरनेट ज्ञान का खजाना है... हर रोज एक नई बात पता चलती है आपको... कुछ ऐसा ही मुझे मिला अपने ब्लॉगवुड भ्रमण के दौरान... ब्लॉग का नाम नहीं बताऊंगा... आप खुद ही ढूंढिये न... वहाँ लिखे से कुछ जस का तस उद्धरित कर रहा हूँ :- 

"  चाहत या आरजू का जीवन में बहुत महत्व है.हमारी  अनेक प्रकार की चाहतें हो सकतीं हैं, जो  जीवन
के स्वरुप को बदलने में सक्षम हैं.  वासनारूप होकर जब    चाहत   अंत:करण  में वास  करने लगती
है तो  हमारे 'कारण शरीर' का भी  निर्माण  करती रहती है.

'कारण शरीर' हमारी स्वयं की वासनाओं से निर्मित है, जिसके कारण  मृत्यु  उपरांत हमें नवीन स्थूल

व सूक्ष्म  शरीरों  की प्राप्ति होती है.यदि वासनाएं सतो गुणी हैं अर्थात विवेक,ज्ञान  और प्रकाश की
ओर उन्मुख हैं  तो 'देव योनि ' की प्राप्ति हो सकती है.  यदि  रजो गुणी अर्थात अत्यंत क्रियाशीलता,
चंचलता  और  महत्वकांक्षा से ग्रस्त हैं तो  साधारण 'मनुष्य योनि'. की और यदि  तमो गुणी अर्थात
अज्ञान,प्रमाद हिंसा आदि से  ग्रस्त  हैं  तो 'निम्न' पशु,पक्षी, कीट-पतंग आदि की 'योनि'प्राप्त हो
सकती है. इस प्रकार विभिन्न प्रकार की वासनाओं से विभिन्न प्रकार की योनि प्राप्त हो
सकती है. जो हमारे शास्त्रों  अनुसार ८४ लाख बतलाई गई हैं.

उदहारण स्वरुप यदि किसी की चाहत यह हो कि जिससे उसको कुछ मिलता है ,उसको  वह स्वामी  

मानने लगे और  उसकी चापलूसी करे,कुत्ते  की  तरहं उसके आगे पीछे दुम हिलाए.  जिससे उसको
नफरत हो या जो उसे पसंद  न आये,  उसपर वह जोर का   गुस्सा करे ,कुत्ते की तरह भौंके  और जब
यह चाहत'उसकी अन्य चाहतों से सर्वोपरि होकर  उसके अंत:करण में प्रविष्ट  हो वासना रूप में  उसके
 'कारण शरीर' का निर्माण करे ,तो   उस व्यक्ति को अपनी ऐसी चाहत की पूर्ति  के लिए 'कुत्ता योनि'
में भी जन्म लेना पड़ सकता है. इसी  प्रकार जो बात-बिना बात अपनी अपनी कहता रहें यानि बस
टर्र टर्र ही   करे ,मेंडक की तरह कुलांचें भी  भरे तो वह  'मेंडक' बन सकता है..क्योंकि ऐसी वासनायें
अज्ञान ,प्रमाद से ग्रस्त होने के कारण 'तमो गुणी'  ही  है  जो पशु योनि की कारक है.

चाहत यदि सांसारिक है तो  संसार में रमण होगा. पर  चाहत परमात्मा को पाने की हो  तो परमात्मा से

मिलन होगा.इसलिये अपनी चाहतों के प्रति हमें अत्यंत जागरूक व सावधान रहना चाहिये . "   



यह सब पढ़ सोच में डूब गया हूँ मैं तो,... अपनी तो सारी ही चाहतें सांसारिक जो हैं... मरने से पहले कम से कम एक बार पूरा देश व थोड़ी दुनिया घूमने की... दोनों बेटियों के बेहतर भविष्य की... अपने मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य की... समता मूलक व न्यायपूर्ण समाज की... तार्किकता व वैज्ञानिकता के उत्थान व अंधआस्था पर आधारित धर्म-आध्यात्म के नाम पर आगे किये जा रहे उलजलूल विचारों के पराभव की... एक ऐसी दुनिया की जिसमें कर्मफल व न्याय यहीं मिल जाये किसी दूसरे लोक के लिये पेंडिंग न रख दिया जाये... खुद समेत सभी के लिये भर पेट खाने व चैन की नींद की... इस पोस्ट पर किये अपने सवाल के ढेर सारे जवाबों की... क्या क्या लिखूँ ?

ऐसा भी नहीं कि मैं किसी भी योनि में जाने से डरता हूँ... वजह है कि आज सुबह मुझे अपनी कॉलोनी के पार्क में घूमते कुत्ते और टर्राते मेंढक प्रसन्न ही दिखे... किसी कुत्ते को यह नहीं ज्ञात अब, कि, वह पिछले जन्म में ब्यूरोक्रेट था और न ही किसी मेंढक को अपना पिछले जन्म में बातूनी होना याद है... पर फिर भी कुछ अंदाजा नहीं लगा पा रहा मैं... मेरी मदद कीजिये और बताईये... 





मैं क्या बनूंगा अगले जनम में ?

 (बिना किसी कारण मुझसे नफरत या मुझे नापसंद करने वाले सुधर जायें व नीले रंग से लिखे को गौर से पढ़ें) 









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गुरुवार, 7 जुलाई 2011

मुझे तो कतई भरोसा नहीं है इन ' मासूमों ' द्वारा दी गई सफाई पर... क्या आप इनकी बातों में आयेंगे ?

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कल टीवी चैनल TIMES NOW (लिंक) ने एक बड़ा खुलासा किया... चैनल के मुताबिक साल   २००१ तक हमारे २५७ शीर्ष एथलीट डोपिंग के लिये की गई जाँच में प्रतिबंधित दवायें लेने के दोषी पाये गये थे (लिंक)... परंतु न तो इनके नाम जाहिर किये गये और न ही इनके खिलाफ कोई कारवाई भी...

जिस तरह की खबरें निकल कर आ रही हैं, उस से साफ है कि, यह एक पूरी तरह से ' ऑर्गेनाइज्ड रैकेट ' था... जिसमें बराबर के हिस्सेदार थे हमारे खेल संघ, इन्डियन ओलंपिक एसोसियेशन, स्पोर्टस अथारिटी ऑफ इन्डिया, विदेशी कोच व हमारे एथलीट भी... बड़ी खेल प्रतियोगिताओं में पदक लाने से सभी को फायदा जो होता... सरकार द्वारा मुंहमांगा बजट, विदेश यात्रायें, खेलों के आयोजन का मौका, घोटाले करने का मौका और एक गद्गद देश द्वारा इनामों की बरसात भी... खेलों से जुड़े हर किसी को इस की जानकारी भी थी... परंतु कुछ छोटे-मोटे इशारे करने के अलावा किसी ने कुछ भी नहीं किया...


आज फंसने पर जिस तरह से हमारी एथलीट अपनी मासूमियत और बेगुनाही का हवाला देती यह कह रही हैं कि " मैं तो छोटे से गाँव/शहर से आई हूँ, मुझे नहीं पता कि मुझे क्या दिया गया, हमने तो वही सब किया जो कोच ने हमसे कहा "... " हो सकता है कि फूड सप्लीमेंट्स में मिलावट हो  "... आदि आदि... 


तब,

मुझे तो कतई भरोसा नहीं है इन कथित ' मासूमों ' द्वारा दी गई सफाई पर... 

आप बताइये कि,


क्या आप इनकी बातों में आयेंगे ? क्या आप सहमत हैं इस बात से कि डोपिंग के लिये ' लाइफटाइम बैन ' न्यूनतम सजा हो ?






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बुधवार, 6 जुलाई 2011

जिसे पूरी दुनिया का मालिक बताया जाता है, क्या करेगा वह इस तुच्छ खजाने का ?

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त्रिवेन्द्रम (थिरूअनंतपुरम) के पद्मनाभास्वामी मंदिर में अभी तक एक लाख करोड़ का खजाना मिल गया है जबकि एक सबसे बड़ा, सुरक्षित व महत्वपूर्ण कक्ष अभी खोला जाना बाकी है (लिंक) ...


सदियों पहले त्रावणकोर के तत्कालीन राजा ने भगवान पद्मनाभास्वामी को राज्य का स्वामी घोषित कर स्वयं को उनका सेवक मात्र मान राज्य चलाना शुरू किया... वही परंपरा बाकी ने भी निभाई... यह खजाना उसी समय का है...

अब जब यह खजाना सामने आ गया है तो दो विकल्प हैं...


१- खजाने की गिनती व कीमत का आकलन कर, धूप दिखा पहले की ही तरह उसे फिर से वहीं बंद कर दिया जाये... भगवान तो शायद ही कभी उसका प्रयोग करें...


२- देखा जाये तो किसी भी राजा के पास जो संपत्ति होती है उसकी असल मालिक राज्य की जनता होती है... इसलिये यह सारा धन केरल राज्य की जनता का ही है... इसे बाजार भाव पर बेच राज्य की जनता के लिये दीर्घकालीन व दूरगामी महत्व के सर्वजनकल्याण के कार्यों पर खर्च कर दिया जाये...


मैं क्या सोचता हूँ पोस्ट का शीर्षक बता रहा है, आप बताइये सभी को, कि...




खजाने का असली मालिक कौन है व दोनों में से कौन सा विकल्प उचित है ?


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सोमवार, 4 जुलाई 2011

क्या करते हो आप जब ऐसा होता है ?

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चारों ओर बहुत कुछ घट रहा है... आपके दिमाग में आइडिया भी काफी हैं... काफी दिन से ब्लॉग पर कुछ लिखा भी नहीं आपने... पर आपकी तमाम कोशिशों के बावजूद भी की बोर्ड पर आपकी ऊँगलियाँ नहीं चल पाती... आपको लगता है कि कामचलाऊ पोस्ट भी बन नहीं पायेगी आज...

मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है...


और जब भी ऐसा होता है तो लगता है कि कुछ अधूरा सा है आज का दिन...



आप बताइये सबको, कि क्या आपके साथ भी कभी ऐसा होता है कभी ? और यदि होता है तो क्या करते हो आप उस दिन ?




मैंने तो आज ऐसा होने पर यह सवाल उछाल ही दिया है ... :)








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शनिवार, 2 जुलाई 2011

लोकपाल होगा या जोकपाल, समय तो यह बता ही देगा कभी न कभी... पर आपके पास यह बताने का मौका है आज ही, चूकिये मत !

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अपने नाम से ही ' लोकपाल ' एक लोकतंत्र में ' लोक ' के हितों का पहरूआ सा होना चाहिये... जब भी देखे, जहाँ भी देखे कि आम आदमी के हितों को किनारे कर अपने क्षुद्र हितों का हितसाधन किया जा रहा है... वह ' फाउल प्ले ' को बताने-जताने के लिये एक जोर सी सीटी मार दे या ठीक चौकीदार की ही तरह बिजली के खंबे पर लाठी मार आवाज सी पैदा करे... ताकि खुराफात की सोचने वाला असहज हो वह ईरादा ही छोड़ दे... अपराधी को पकड़ने व कानून के मुताबिक सजा देने के लिये लंबा-चौड़ा तंत्र तो है ही हमारे देश में...


आज ' लोकपाल ' के नाम पर सारी जाँच एजेंसियों , सारे राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान, संसद, सारी न्यायपालिका, पूरी कार्यपालिका आदि आदि के ऊपर नियंत्रण व उनको अपनी इच्छा अनुसार सजा देने का हक रखने वाले व किसी के भी प्रति जवाबदेही न रखने वाले एक सर्वशक्तिमान संविधानेतर ' शक्ति केन्द्र ' की कल्पना और इच्छा भी कर रहे हैं हम में कुछ... हम में से कुछ को यह भी लगता है कि ऐसा लोकपाल बनने मात्र से ही देश में से भ्रष्टाचार व भ्रष्ट सोच छूमंतर हो जायेगी... हमें यह सवाल भी परेशान नहीं करता कि ' लोकपाल ' के ग्यारह या इक्कीस सदस्यों के तौर पर किसी भी तरह की राजनीतिक या व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षा विहीन, किसी भी तरह के सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक पूर्वाग्रह से मुक्त, पूरी तरह से ईमानदार, सदाचारी, सभी को मान्य, सर्वज्ञानी, ताकत का दुरूपयोग करने के बारे में सोचने में भी असमर्थ, किसी भी तरह के दबाव व प्रलोभनों से परे व्यक्ति हम लायेंगे कहाँ से... क्योंकि अव्वल तो ऐसा कोई होगा नहीं और यदि होगा तो उसने अपनी जिंदगी का मुकाम पहले से ही तलाश लिया होगा...


खैर छोड़िये, अपनी ही रौ में लिख गया यह सब मैं...


आप तो आज सिर्फ यही बता दीजिये मुझे व अन्य पाठकों को भी...


कि 

आखिर कैसा लोकपाल चाहते हैं आप अपने इस महादेश के लिये ?




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गुरुवार, 30 जून 2011

हमारे मुख्यधारा के मीडिया को एक बार यह जरूर सोचना चाहिये कि इस तरह की पक्षपाती व बेईमान सोच से ही भ्रष्टाचार पनपता है ! ... पर क्या यह चैनल वाले या हम भी सोचेंगे इस भेदभाव पर ?

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अभी चंद दिन पहले एक टेलीविजन चैनल अन्ना हजारे व बाबा रामदेव द्वारा चलाये जा रहे भ्रष्टाचार व कालाधन विरोधी आंदोलनों के बारे में प्रख्यात दलित विचारक व चिंतक उदित राज (लिंक) का साक्षात्कार दिखा रहा था...


उदित राज जी का कहना था कि यद्मपि वह इस बात से सहमत हैं कि भ्रष्टाचार पर लगाम लगनी चाहिये, परंतु उनको इस बात का गिला अवश्य था कि जब वह या अन्य संगठन दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, गरीब या समाज के हाशिये पर डाले गये अन्य समूहों के हितों के लिये लाखों की संख्या में  देश की राजधानी दिल्ली में ही धरना-प्रदर्शन आदि करते हैं... तो यह तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया इन आंदोलनों को बिल्कुल नजरअंदाज कर देता है... किसी किस्म की कोई खबर नहीं लगाता... जबकि अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के इन आंदोलनों को महत्व मिलने में ९९ % तक भूमिका मीडिया कवरेज की ही रही है... मीडिया की कवरेज के कारण ही यह आंदोलन ज्यादा बड़े व व्यापक समर्थन-जनाधार प्राप्त लगते हैं... यदि यह सैकड़ों चैनल कवरेज करना बंद कर दें तो इन आंदोलनों का कोई असर नहीं बचेगा... उनका कहना है कि मुख्यधारा के मीडिया को यह सोचना चाहिये कि इसी तरह की पक्षपाती व बेईमान सोच-आचरण से भी भ्रष्टाचार पनपता है !


उदित राज जी के कहे मुताबिक ही मुझे तो अगले दिन कहीं भी उनके इस बयान का जिक्र प्रिंट मीडिया में नहीं दिखा...


अपने फेसबुक पेज (लिंक) पर उदित राज जी ने जो लिखा है वह आप उनकी Wall-दीवार(लिंक) पर लिखा पढ़ सकते हैं... जस का तस उतारा है नीचे...

If channels stop covering Anna Hazare and others, then what will happen? Thus role of the media is stretched to the extent of 99%.When we demonstrate in hundreds of thousands for the causes of poor, dalits and minorities , no channels and no news, such discriminations. Media person should know that the corruption is due to discriminatory and corrupt thinking.


Yadi channels aur news papers Anna Hazare aur unke sathiyon ko cover karana band kar den to kya hal hoga. 99% taq media ki bhumika hai.Jab hum lakhon ki sankhya me dalits, garib aur minorities etc ke bare me rally adi karate hain , kahan rahati hai yeh media. Media ke logon ko sochna chahiye ki isi bhedbhav ke karan bhrshatachar ka janm hua hai.


अपना आज का सवाल इसी बात पर है, बताइये कि ...


क्या उदित राज कुछ भी गलत कह रहे हैं यहाँ पर ?
 
 
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मंगलवार, 28 जून 2011

इसे 'बेशर्मी मोर्चा' भले ही कहा जा रहा हो पर बेशर्म नहीं है यह... बेशर्म तो वह समाज है जहाँ इस तरह के मोर्चे निकालने की जरूरत महसूस की जाती है!

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यॉर्क विश्व विद्मालय में हो रही एक चर्चा के दौरान टोरंटो पुलिस के कान्स्टेबल Micheal Sanguinetti ने सुझाव दिया  that, in order not to be victimized , " Women should avoid dressing like SLUTS. "


इस मानसिकता के जवाब में Sonya Barnett व Heather Jarvis के नेतृत्व में ३००० महिलाओं ने क्वीन्स पार्क से टोरंटो पुलिस हेडक्वार्टर्स तक मार्च किया व इस विरोध-मार्च को कहा SLUTWALK !(लिंक)


विरोध स्वरूप किया जा रहा यह मार्च इस बात के लिये कतई नहीं है कि स्त्रियों को अंग दिखाने वाले गहरे गले के वस्त्र या टांगें दिखाने वाली छोटी स्कर्ट पहनने की आजादी चाहिये... बल्कि यह मार्च सारे समाज को यह याद दिलाने के लिये है कि समाज की हर महिला को यह अधिकार है कि कोई भी उसके साथ अनुचित स्पर्श, शाब्दिक या शारीरिक कामुकतापूर्ण उत्पीड़न, बलात्कार यहाँ तक कि हत्या भी न करे, सिर्फ इसलिये कि वह एक स्त्री है, अपना खुद का एक दिमाग भी रखती है तथा समाज के थोड़े से पर अति मुखर एक वर्ग द्वारा प्रेस्क्राइब्ड एक तथाकथित आदर्श आचार-पहनावे को नकार अपनी पसंद , काम व सुविधा के अनुसार कपड़े पहने है !


दिल्ली में इस विरोध मार्च का आयोजन होगा बेशर्मी मोर्चा के नाम से २४ जुलाई को (लिंक)...

अपना सवाल सीधा-सादा है ...




क्या आप बेशर्मी मोर्चा के साथ हैं ? यदि नहीं तो अवश्य ही बतायें कि आखिर क्यों ?










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शनिवार, 25 जून 2011

संसद में एक तिहाई महिलाओं के आने से कौन सी अभूतपूर्व क्रांति आ जायेगी... महिला हितों की आड़ में राजनैतिक वंशवाद को बनाये रखने का प्रयास मात्र है यह !

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सबसे पहले तो मैं यह बता दूँ कि मैं महिला आरक्षण का कतई समर्थन नहीं करता... तकरीबन सवा साल पहले मैंने इस विषय पर एक पोस्ट भी लिखी थी   '१४११ बाघ बचे हैं आज और इतनी हायतौबा मचा रहे हो !... १५ साल बाद शायद १४ बेचारे_ _ _ भी न बचें हमारे सर्वोच्च सदन में...!!!'      समय हो तो देखियेगा और मेरे उठाये सवालों पर अपने विचार भी रखियेगा ।


आज फिर खबरें आ रही हैं कि संसद के मानसून सत्र में महिला आरक्षण बिल को पास कराने के प्रयास किये जा रहे हैं (लिंक)


पंचायत स्तर पर महिला आरक्षण लागू होने से जो हुआ वह सभी के सामने है, पहले से ही प्रधान रहे घरानों की महिलायें महिला सीट होने पर जीत कर आईं, उनका सारा काम परिवार के पुरूष ही करते हैं तथा 'प्रधान पति' नाम का एक ऐसा अनचाहा वर्ग पैदा हो गया जो बिना किसी जिम्मेदारी के सारे अधिकारों का लाभ लेता है...

यदि संसद में महिला आरक्षण लागू हुआ तो इसका सबसे बड़ा फायदा राजनैतिक वंशों को होगा... एक तिहाई सीटें उनके परिवार की महिलाओं के लिये मानो एलॉट सी हो जायेंगी... क्योंकि संसद का चुनाव लड़ने लायक धनबल उन्हीं के पास होगा तथा राजनीतिक पार्टियों में इन राज-वंशों की पकड़ होने के कारण उन्हीं परिवारों की महिलाओं को जिताऊ उम्मीदवार मान कर टिकट भी दिये जायेंगे...

सीधे साफ शब्दों में महिला आरक्षण बिल महिला हितों की आड़ में राजनैतिक वंशवाद को बनाये रखने का प्रयास मात्र है !


क्या आप इस आकलन से सहमत हैं ?


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मंगलवार, 21 जून 2011

अपने अपने 'कम्फर्ट जोन' में मगन सुविधाभोगी हिन्दुस्तान... क्या इस लड़ाई को लड़ने का दम है हम में ?

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सच कहूँ तो मुझे यह हाल के भ्रष्टावार विरोधी आंदोलन किसी भी एंगल से जनतंत्र की बुनियाद कहे जाने वाले  'जन ' के द्वारा किये जा रहे जनआंदोलन से नहीं दिखे... 


हाँ एक सुविधाभोगी व मुखर मध्यवर्ग, जो अपनी क्षमता व पहुंच से कहीं ज्यादा ऊपर जा हिट करने की हसरत रखता है, को अपने तरीके से देश के लिये कुछ करने का मौका जरूर इन्होंने दिया... चाहे वह मिस-कॉल करना रहा हो या फेसबुक पर पेज बनाना या चेन इ-मेल भेजना या रंग-बिरंगे नारे लिखे पोस्टर डिजाइन करना व टी शर्ट , टोपियाँ पहनना...


एक सबसे बड़ी हकीकत यह भी है कि अर्थव्यवस्था के लिबरलाइजेशन से शहरी मध्यवर्ग को ही सबसे ज्यादा फायदा हुआ है और इस लिबरलाईजेशन के कारण उत्पन्न हुई नियमों को बेंड करने की प्रवृत्ति भी इस वर्ग में बढ़ी है ...


अब यदि अचानक सभी को सीधे-सीधे चलने को कहा जायेगा तो अपने अपने 'कम्फर्ट जोन' में मगन सुविधाभोगी हिन्दुस्तान का यह मध्यवर्ग अपने नियमों को तोड़ अर्जित सुखों का त्याग करने का हौसला जुटा पायेगा क्या... 




मुझे तो इसमें संदेह है, आप क्या सोचते हैं ?








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बुधवार, 15 जून 2011

जन-लोकपाल विधेयक पर मामला अब यहाँ आकर अटका है... आप क्या सोचते हैं इस बारे में, बतायेंगे क्या हुजूर...!

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जन लोकपाल विधेयक की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल नागरिक समाज के प्रतिनिधियों व सरकार के बीच प्रधानमंत्री व उच्च न्याय पालिका को लोकपाल के दायरे में लाने को लेकर गतिरोध आ गया है...


उच्च न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में लाने पर अभी मैं कुछ नहीं कहना चाहता परंतु प्रधानमंत्री का पद संसदीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पद है वह एक तरह से हमारे लोकतंत्र का मुखिया है... अपने दायित्वों के तहत प्रधानमंत्री को देश की आंतरिक व वाह्य सुरक्षा से संबंधी मामले भी देखने होते हैं, जिसमें  देश की आंतरिक व वाह्य गुप्तचर एजंसियों पर नियंत्रण व विभिन्न स्थानों व देशों में बैठे सूचनास्रोतों व देशहितसाधकों का ख्याल रखना भी होता है... अंतर्राष्ट्रीय राजनय इतना जटिल है कि कुछ विशेष अनुग्रह भी देने ही पड़ते हैं कुछ को ,राष्ट्र के व्यापक हितों की रक्षा के लिये... इन जटिलताओं को वही समझ सकता है जिसने सत्ता के सर्वोच्च स्तर पर यह सब देखा हो... 


ऐसे में आप बताइये कि...




क्या लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को भी लाने का हठ उचित है ?




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शुक्रवार, 10 जून 2011

हाँ, उस दिन एक भारतीय रूपया पचास डॉलर के बराबर हो जायेगा, अमरीकन हिन्दुस्तान के गाँवों में लाईन लगाकर मजदूरी माँगेंगे, सोने की चिड़िया बस अब उड़ने ही वाली है... कल्पनालोक में जीता एक देश !!!

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सबसे पहले तो पढ़िये भारत डोगरा जी का अमर उजाला में छपा यह संपादकीय...


काले धन का ४०० लाख करोड़ का आंकड़ा कितना हकीकत के करीब है ? ... कोई नहीं जानता यह...


पर यह लुभावना सपना कि, ४०० लाख करोड़ रूपये भारत में वापस आयेंगे... ६२४ जिलों में हरेक को मिलेगा साठ हजार करोड़ से ज्यादा... हर गाँव को मिलेगा सौ करोड़... एक भारतीय रूपये की कीमत हो जायेगी ५० अमेरिकी डॉलर... औेर पूरा पश्चिमी विश्व व अमेरिकन हमारे यहाँ काम माँगने आने लगेंगे !... 

क्या यह एक जटिल मुद्दे का अति सरलीकरण  नहीं है... 


भारत डोगरा जी लिखते हैं...

"  जाहिर है, यह ‘अर्थशास्त्र’ तथ्यों पर आधारित नहीं है। यह ऐसी उम्मीदें पैदा करता है, जिसका कोई आधार नहीं है। इसमें विदेशों में जमा धन को जो निर्णायक भूमिका दी गई है, उससे देश में विभिन्न स्तरों पर मौजूद विषमता, अन्याय, शोषण आदि से ध्यान हट जाता है और हमारी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में जरूरी सुधार का मुद्दा कमजोर पड़ जाता है। ऐसा लगता है कि सारी समस्याएं काले धन के देश में आ जाने से ही दूर हो जाएंगी।
काले धन के विरोध का यह ‘अर्थशास्त्र’ उस समाज-दर्शन के बिलकुल अनुकूल बैठता है, जिसमें अपने समाज की कुरीतियों व अन्यायों की ओर ध्यान न देकर केवल विदेशी कारकों को जिम्मेदार माना जाता है। यह सामाजिक सोच उस गौरवशाली अतीत की कल्पना पर आधारित है, जिसमें सब कुछ अच्छा और महान था। आज जरूरत इस बात की है कि इस कल्पनालोक से बाहर निकल कर इतिहास का अध्ययन वैज्ञानिक, तार्किक दृष्टिकोण से किया जाए, ताकि समाज को कमजोर करने वाली जाति-प्रथा, अंधविश्वास जैसी कुरीतियों को खत्म किया जा सके। "


तो इसी पर अपना आज का सवाल भी है...


क्या आज का भारतीय जनमानस इस कल्पनालोक से बाहर आने की इच्छा व क्षमता रखता है ?





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गुरुवार, 9 जून 2011

कोई मुद्दा कितना ही बड़ा या सच्चा हो और उठाने वाला कितना ही कद्दावर भी... पर क्या आप इसे दरकिनार कर सकते हैं...

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पिछले कुछ समय से जो भी हो रहा है वह मुझे विस्तार से आपके सामने बताने की आवश्यकता नहीं लगती...

विगत कुछ समय से एक मनोवृत्ति सी विकसित हो रही है देश में... वह यह कि किसी भी मुद्दे पर जो भी व्यक्ति, संस्था या संगठन लोगों को जुटा पाने की क्षमता रखता है वह उस भीड़ की ताकत के जरिये लोकतंत्र को बंधक बना अपनी मांग पूरी करवाने का ख्वाब पालने लगा है...


हाल के गुर्जर आरक्षण आंदोलन, जाट आरक्षण आंदोलन या जनलोकपाल-काले धन वापसी-भ्रष्टाचार-मुक्ति आंदोलनों में भी यह प्रवृत्ति उभर कर आ रही है...


एक लोक तंत्र हैं हम... और किसी भी लोकतंत्र की दिशा निर्धारण उसका अपना संविधान करता है... और  संसद की सर्वोच्चता ( Supremacy of Parliament ) का सिद्धांत भी... यह सर्वोच्चता Non Negotiable है...

मेरा आज का सवाल है कि...




क्या किसी भी मुद्दे या व्यक्तित्व के लिये संसद की सर्वोच्चता ( Supremacy of Parliament ) के सिद्धांत से समझौता किया जा सकता है ?







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बुधवार, 8 जून 2011

कितना और पीटा जायेगा अब एक मरे हुऐ सांप को... और क्या फायदा होगा इससे किसी को भी...

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खुद योगऋषि रामदेव जी के ही शब्दों में ' सरकार उनकी ९९ प्रतिशत मांगें मान चुकी थी '... तीन जून को ही वह चार जून की शाम को अनशन समाप्त करने के आशय का लिखित सहमति पत्र भी सरकार के मंत्रियों को दे चुके थे... पर उन्होंने चार जून की शाम को अनशन समाप्त नहीं किया...


नतीजे के तौर पर सरकार ने भी रामलीला मैदान को खाली करा लिया व योगॠषि को विमान से देहरादून व फिर हरिद्वार स्थित पतंजलि आश्रम पहुंचा दिया गया...


अब योगऋषि बाबा रामदेव ने अपने समर्थकों से तो अनशन तोड़ने को कहा है पर उनका अनशन जारी रहेगा... दिल्ली के नजदीक नौएडा जाकर अनशन करने की इजाजत उ०प्र० सरकार ने दी नहीं...


तो कुल मिलाकर नतीजा यह कि हरिद्वार स्थित अपने योगपीठ पर योगऋषि बाबा रामदेव जी अभी भी अनशन पर हैं... मीडिया वहाँ जमा है... और रोजाना ही सरकार, सतारूढ़ पार्टी व अनशनकारियों द्वारा दूसरे को लक्षित करती हुई बयानबाजी बदस्तूर जारी है...


मेरा आज का सवाल  है कि...





अभी भी यह सब जारी रखने से क्या कुछ 
भी हासिल कर पायेंगे योगऋषि,
उनको फायदा होगा या नुकसान ?












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गुरुवार, 2 जून 2011

अब तो मान ही जाईये न बाबा, कुछ ऐसी ही गुजारिश करती सरकार...

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एक अभूतपूर्व घटनाक्रम में केंद्र सरकार के चार कैबिनेट मिनिस्टर प्रणव मुखर्जी, कपिल सिब्बल, पवन कुमार बंसल, सुबोध कांत सहाय तथा कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर उज्जैन से दिल्ली आ रहे बाबा रामदेव जी को एयरपोर्ट पर रिसीव करने गये (देखें यहाँ)... 

कुल ढाई घंटे तक बातें भी हुई... जाहिर है कि सरकार योगॠषि को चार जून के प्रस्तावित अनशन को न करने के लिये मनाने का हरसंभव प्रयास कर रही है... 


आज का सवाल इसी पर है...


कईयों को लगता है कि सरकार कुछ भी कर ले, कितनी ही गंभीरता दिखाये, बाबा मानेंगे नहीं क्योंकि उन्हें ठोस कार्य के बजाय खबरों में बने रहना ज्यादा रूचिकर लगता है...


आप ही बताइये...




क्या मान जायेंगे योगऋषि बाबा रामदेव ?










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बुधवार, 1 जून 2011

सोचो अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा...

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जन लोकपाल बिल पर बनी ड्राफ्टिंग कमेटी में सरकार तथा नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के बीच मामला गरमा गया है...

(Government strongly opposing proposals for inclusion of Prime Minister, higher judiciary and acts of Members of Parliament inside Parliament under its purview. (देखिये यहाँ )

बाबा रामदेव जी भी प्रधानमंत्री को लोकपाल के पद के दायरे में लाने के हक में नहीं हैं, (देखिये यहाँ)... 

इस पर अरविन्द केजरीवाल साहब कहते हैं... Kejriwal said if the Prime Minister was kept out of the Lokpal, then there could be ten departments under him which would straight away come out of the anti-corruption watchdog. Then other ministers can also ask the bribe-givers to pass on all the bribes to the Prime Minister who enjoys immunity. "If the Prime Minister becomes corrupt then nothing can be done about it," he said.

अब सवाल यह उठता है कि उच्च न्यायपालिका, प्रधान मंत्री व सांसद पूर्णरूपेण ईमानदार ही होंगे यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है...

अनाज घोटाला, २जी घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, जमीन घोटाला घोटाले ही घोटाले सुनाई देते हैं चारों ओर... सुप्रीम कोर्ट के जज भी न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार को स्वीकारते हैं...इन्हीं घोटालों में शामिल कोई राजनीतिज्ञ यदि घोटाले में ही अर्जित धन के बूते पर छूट कर अपने दल का सर्वमान्य नेता बन गया और चुनाव के उपरान्त वही दल सत्ता में आ गया...


तो क्या वही घोटालेबाज प्रधानमंत्री नहीं बन जायेगा...


एक कदम और आगे जाकर सोचिये यदि वही शख्स कहीं 'जन-लोकपाल' भी बन पाने में कामयाब रहा तो...




सोचो अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा...?








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मंगलवार, 31 मई 2011

कोई तो बताओ कि आखिर कब आयेगा यह वापिस यार !!!

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किसी भी हिन्दी ब्लॉगर के लिये वह दौर बहुत ही सुविधाजनक था... दो बड़े अच्छे संकलक चलते थे... दोनों में लगभग सभी हिन्दी के ब्लॉग शामिल भी थे...एक संकेत सभी को मिल जाता था कि जनता आज कहाँ बहसिया रही है, कहाँ मामला गर्म है, कहाँ कुछ बहुत ही बेहतरीन परोसा गया है, आदि आदि... 


अब उन दोनों में से ब्लॉगवाणी को तो उसके संचालकों ने बंद कर दिया... परंतु चिठ्ठाजगत का मामला कुछ अलग सा है... वैसे तो यह आज भी लिस्ट जैसी एक फीड दिखा रहा है, पर ब्लॉगवुड के ही कुछ ब्लॉगों से यह पता चला था कि यह अभी लैब में है और शीघ्र ही वापस आयेगा...


१६००० से भी ज्यादा हिन्दी ब्लॉगों को अपने में समेटे सर्वप्रिय और निर्विवाद इस संकलक के वापस आने का मुझे बेसब्री से इंतजार है... 


पर...




कोई मुझे यह तो बता दो कि आखिर कब आयेगा यह वापिस यार ?










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सोमवार, 30 मई 2011

यस सर ! विल डू सर !! सॉरी सर !!! आल्वेज एट युवर सर्विस सर !!!! And that too, without any hint of having even a single bone in my spine Sir !!!!!

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आज सबसे पहले तो एक  खबर देखिये यहाँ पर... 


पब्लिक सेक्टर ( सरकारी ) के एक बड़े बैंक ' इंडियन बैंक ' के मुम्बई जोन के जोनल मैनेजर बनबिहारी पान्डा जी को पहले निलंबित व फिर स्थानान्तरित किया गया... उनका अपराध यह था कि उनसे भूलवश अपने चेयरमैन व मैनेजिंग डायरेक्टर टी एम भसीन जी का 'लगेज' कार के अंदर बंद हो गया था... पान्डा जी अपने अधिकारी को एयरपोर्ट पर रिसीव करने गये थे...


पर यह पोस्ट पान्डा जी के समर्थन में नहीं है, मुझे उनसे कोई सहानुभूति भी नहीं, क्योंकि वह अपने सीएमडी को सीधे-सीधे "  भाड़ में जाओ और जो करना है कर लो, मैं कानून से न्याय ले लूंगा  "  कहने की बजाय मस्का लगाते स्पष्टीकरण व माफियाँ माँगने में लगे हैं... ( यहाँ देखें ) ... 


अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इन्डिया ने इस पूरे मामले पर संपादकीय लिखा है...

देखें  टाइम्स ऑफ इन्डिया का संपादकीय    "   Sarkari Scourge  "

अखबार लिखता है... " Democracy's representatives are expected to combat outdated ideas of domination and subservience, yet these have been institutionalized ".

यानी लोकतंत्र के प्रतिनिधियों से अपेक्षा तो यह थी कि वो प्रभुत्व व दासता जैसे पुराने विचारों से लड़ेंगे परंतु यह विचार हमारे समाज में संस्थापित हो गये हैं !


मेरा आज का सवाल इसी बात पर है... ऐसा क्यों हो गया है... 


क्यों आज हमारी राजनीति, नौकरशाही, मीडिया, उद्मोग-कॉरपोरेट जगत, साहित्य, कला,  लगभग हर क्षेत्र यहाँ तक कि फौज में भी  आगे बढ़ने के लिये अपने सुपीरियर की आँखें बंद कर बिना सवाल किये व अपनी गरिमा व सम्मान को गिरवी रखे हुऐ हुक्म बजाना व जी-हुजूरी करना जरूरी सा हो गया है ?

कहीं यह सब हमारे डीएनए, हमारी जीन संरचना में तो नहीं है ?







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शुक्रवार, 27 मई 2011

बस इतनी ही अकल पाई जाती है हम हिन्दी वालो में... :(

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डीटीएच प्लेटफार्म पर कब्जा किये बैठे २४ x ७ खबरिया हिन्दी चैनलों को आप एक बार एक दो घंटे लगातार देख लें, सिर में दर्द होने की पूरी गारंटी है...


खबर चाहे कोई भी हो ओसामा की मौत या भारत का विश्वकप जीतना या फरीदाबाद का प्लेनक्रैश... इन चैनलों के खबर देने का अंदाज वही है... अमेच्योर ग्राफिक, बेहूदे हेडिंग और चीख-चीख कर बातें करते न्यूज एंकर... जिनका एकमात्र उद्देश्य रहता है उस खबर को अलॉट किये गये टाईम ( जो कभी आधे घंटे से कम नहीं होता ) को किसी तरह पूरा करने के लिये साउंड बाइट देना... जिस तरह के मूर्खता भरे व बेहूदा सवाल यह एंकर करते हैं उसे देखने के बाद आप केवल सिर के बाल ही नोच सकते हैं...


फिर भी इन चैनलों को टीआरपी मिलती है, चैनल वाले कहते हैं कि वह वही दिखाते हैं जो देखा जाता है...

मैं यहाँ पर इन एंकरों की काबिलियत पर कुछ नहीं कहना चाहता ... ;) पर यदि यह बात सच है कि हिन्दी का दर्शक ही यही देखना चाहता है...


तो अपना आज का सवाल है...


क्या केवल इतनी ही अकल पाई जाती है हम हिन्दी वालो में..?










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मंगलवार, 24 मई 2011

चीन, रूस, कोरिया, ताईवान और जापान की तकनीकी महारत के पीछे क्या है....

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खबरें अक्सर मुझे बहुत निराश करती हैं... 

२१ वीं सदी के प्रथमार्ध में, १२१ करोड़ की आबादी वाला, तकरीबन ८-९ प्रतिशत की दर से साल दर साल अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाता, दुनिया के हर धंधेबाज के लिये संभावनापूर्ण बाजार बना हुआ तथा शीघ्र ही बदलते विश्व की एक महाशक्ति बन जाने के सपने पालता एक महादेश...


परंतु तकनीक के मामले में हम छोटे-छोटे देशों कोरिया, जापान, ताइवान यहाँ तक कि इजराईल से भी पिछड़े हैं...


चाहे उन्नत टैंक खरीदने हों या युद्धक विमान या पनडुब्बियाँ या मेट्रो के डिब्बे-इंजन या स्वदेश निर्मित लड़ाकू विमान ढांचे का एवियोनिक्स या तेल के कुंऐ खोदने की मशीनें या रेडीमेड कपड़े के कारखानों की मशीने या अल्ट्रासाउंड, सीटी-एमआरआई मशीनें... सब कुछ हमें विदेश से ही खरीदना होता है वह भी याचक मुद्रा में आकर...


अगर आजादी के तुरंत बाद हमारे नीति निर्धारकों ने उच्च व तकनीकी शिक्षा को देश की भाषा में दिये जाने की व्यवस्था की होती तो ऐसा नहीं होता... यह मेरा सोचना है...


कोई भी इन्सान अपनी मातृभाषा के जरिये काम करने पर बेहतर नतीजे निकालेगा बजाय थोप दी गई अंग्रेजी के... क्योंकि उस दशा में हर बार उसे 'अनुवाद मोड' में जाना होगा...



आपका क्या ख्याल है ?








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सोमवार, 23 मई 2011

कितनी चीयरफुल हैं यह लड़कियाँ...

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आईपीएल जिसके लीग मुकाबले कल रात खत्म हुऐ, निश्चित तौर पर एक ' दर्शनीय तमाशा ' है... प्रत्येक टीम में केवल चार ही विदेशी खिलाड़ी खिलाने की बाध्यता के कारण सभी टीमों में कुछ ऐसे भारतीय खिलाड़ी भी खेल रहे हैं जिनकी गेंदों पर आसान रन व जिनके बल्लेबाजी करने के दौरान विपक्षी गेंदबाज को कुछ बहुत ही आसान विकेट मिलते हैं... बाउन्ड्री अधिकतर मैदानों में बहुत छोटी कर दी गई है जिससे दर्शकों को खूब सारे चौक्के-छक्के देखने को मिलें... 


पर आज सवाल इस बारे में नहीं...


आईपीएल के नियमों के अनुसार हर टीम को एक निश्चित संख्या में  ' चीयर गर्ल्स ' मैदान में उतारना जरूरी है... अधिकाँश टीमों की चीयर गर्ल्स गोरी चमड़ी वाली व इम्पोर्टेड हैं...


आज का सवाल है...


आईपीएल के इस दर्शनीय तमाशे की सफलता में इन चीयरगर्ल्स का कितना योगदान है ?




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रविवार, 22 मई 2011

क्या योगऋषि रामदेव जी को भी वह सब सहज ही मिलेगा, जो अन्ना को मिला था ....

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चार जून से दिल्ली के रामलीला मैदान पर अनशन पर बैठने जा रहे हैं योगऋषि रामदेव...


माँग बस एक ही है... 

काले धन की अर्थव्यवस्था पर लगाम लगाने के लिये कारगर उपायों की तथा विदेश में जमा कालेधन को वापस लाने की...


अन्ना जब अनशन पर बैठे थे तो उनको अभूतपूर्व समर्थन मिला था इसी बहाने गंगा नहा अपने पर लगे दागों को मिटाने का प्रयास करते मेनस्ट्रीम मीडिया का, मोमबत्ती गैंग का, पेज थ्री क्राउड का तथा सत्ता व उद्योग जगत के बीच लाइजन का काम करने वालों का...

पहले लोकपाल बिल बनेगा, फिर लोकपाल, फिर तमाम निगरानी करने वाली संस्थाओं की तरह वह भी लग जायेगा दीवार पर एक ट्राफी की तरह... दंतहीन व बेअसर... यह सोच थी इन सब की...


पर जब आज सचमुच के ठोस उपायों की बात हो रही है... तो क्या यह सभी जो कालेधन की इकॉनामी के प्लेयर हैं कालिदास की तरह ही उस डाल पर कुल्हाड़ी चला पायेंगे जिस पर वह खड़े हैं...

मुझे लगता है नहीं ...


आप की क्या राय है ?






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मंगलवार, 17 मई 2011

हम एक व्यक्ति पूजक समाज हैं जो लोकतांत्रिकता का फटा हुआ लबादा ओढ़े है...

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पाँच राज्यों के चुनाव हुऐ...


बंगाल में जीतीं ममता बनर्जी...


आसाम में जीते तरूण गोगोई...


तमिलनाडु में जीतीं जयललिता...


पुडुचेरी में जीते रंगासामी... 


केरल में अच्युतानंदन भले ही बहुमत न ला पाये पर यह प्रदर्शन भी जीत के बराबर ही था...



इनमें से कोई भी जीत नीतियों, पार्टियों की विचारधारा या लोकतांत्रिकता की नहीं है...



यह जनता की ' व्यक्ति पूजा ' तथा पूज्य के प्रति आभार प्रदर्शन है ।




क्या मेरी तरह ही आप भी नहीं सोचते कि हम एक व्यक्ति पूजक समाज हैं जो लोकतांत्रिकता का फटा हुआ लबादा ओढ़े है ?










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सोमवार, 16 मई 2011

यूँ मुड़-मुड़ के ना देख... मुड़-मुड़ के !

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बड़े शहरों ( मेट्रो ) की तो कह नहीं सकता... पर भारत के अधिकाँश मझोले या छोटे शहरों, कस्बों व गाँवों में भी एक आम सा नजारा है... वह है ...

किसी सार्वजनिक जगह, उदाहरण के लिये बस स्टॉप ही ले लीजिये... आप नोटिस करेंगे कि काफी सारे लोग, पुरूष, महिलायें व बच्चे खड़े हैं... सब कुछ सामान्य सा ही चल रहा है... अचानक वहाँ पाश्चात्य परिधान में... जीन्स-टीशर्ट पहने कुछ महिलायें पहुंच जाती हैं... इससे भी कुछ फर्क नहीं पड़ता कि वे युवा हैं अथवा प्रौढ़...

आप पायेंगे कि वहाँ मौजूद अधिकाँश पुरूष आँखें फाड़ फाड़ उनको घूरने लगेंगे... जो ऐसा नहीं करेंगे वह भी कनखियों से उन्हीं को देखना जारी रखेंगे...

अगर आप ने भी यह व्यवहार देखा है तो बताइये...



ऐसा क्यों होता है ?




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