शुक्रवार, 16 मार्च 2012

हद है भाई, अब तो रीढ़ की हड्डी का होना भी अयोग्यता हो गयी है !

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वैसे तो हर पल हर दिन कुछ घटता ही रहता है भारतीय राजनीति में...


पर यह दो वाकये कुछ अलग से हैं...







 पहला

उत्तराखंड चुनाव में निर्दलीय व अन्यों के सहयोग से सरकार बनाने लायक सीट पाने के बाद कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी ने लगातार दूसरी बार हरीश रावत की दावेदारी को ठुकरा विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद पर आसीन कर दिया... नये मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण में मात्र ११ काँग्रेस विधायक पहुँचे और तो और १७ काँग्रेसी विधायकों ने तो विरोध स्वरूप अभी तक विधायक पद की शपथ भी नहीं ली... यह सब बताता है कि हरीश रावत की दावेदारी कितनी न्यायोचित व सशक्त थी... पूरी तरह संभव है कि काँग्रेस आलाकमान द्वारा की जा रही दबाव व प्रलोभन की रणनीति काम कर जाये और हरीश रावत को मना लिया जाये...

फिर भी शायद ही हरीश रावत को कभी समझ आये कि :-

१- उनमें ऐसा क्या  है...
२- ऐसा उनमें क्या नहीं है...

जो सोनिया गाँधी को उनका मुख्यमंत्री होना गवारा नहीं...


दूसरा

एक बेहतरीन व दूरगामी सोच वाला रेल बजट देने के बाद वरिष्ठ तृणमूल काँग्रेस नेता दिनेश त्रिवेदी की उनकी ही पार्टी अध्यक्षा ममता 'दीदी' बनर्जी जिस तरह से सार्वजनिक छीछालेदार कर रही हैं... जिस तरह से उन पर 'मीर जाफर' होने तक के इल्जाम लगाये जा रहे हैं... जिस तरह उन पर केन्द्रीय रेल मंत्री रहते हुऐ भी तृणमूल काँग्रेस का रेल बजट पेश करने की बजाय भारत का रेल बजट पेश कर एक अक्षम्य अपराध सा कर डालने की तोहमत दी जा रही है... ऐसे में लगता है कि देर-सबेर दिनेश त्रिवेदी जी को पद छोड़ना ही होगा...

फिर भी शायद ही दिनेश त्रिवेदी को कभी समझ आये कि :-

१- उनमें ऐसा क्या  है...
२- ऐसा उनमें क्या नहीं है...

जो अब ममता दीदी को उनका रेलमंत्री होना गवारा नहीं...



मैंने बहुत सोचा दोनों मामलों में और और जो उत्तर सोच पाया वह हैं ...



१- रीढ़ की हड्डी

२- दरबारी बन जयगान व चाटुकारिता करने की जन्मजात क्षमता



पाठक माईबाप यह तो बतायें कि क्या मेरे उत्तर सही हैं ?








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शुक्रवार, 9 मार्च 2012

क्या यही है अन्ना इफेक्ट ???

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 कुछ खबरे हैं :-


१- उत्तराखंड के विधानसभा चुनाओं से ऐन पहले 'टीम-अन्ना' ने मतदाताओं को जागरूक करने के लिये सघन प्रचार किया।

२- 'टीम-अन्ना' के सदस्यों ने राज्य में एक साफ सुथरा प्रशासन व टीम-अन्ना को मान्य लोकायुक्त कानून बनाने के लिये मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवनचंद्र खंडूरी की प्रशंसा की।

३- टीम अन्ना के ही कुछ सदस्यों ने भ्रष्टाचार के कथित आरोपों के चलते पद से मुक्त किये गये पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' पर निशाना भी साधा जिसके जवाब में 'निशंक' द्वारा उन पर मानहानि का मुकदमा ठोंकने की धमकी दी गई।





अब परिणाम देखिये क्या आता है :-


१- डोईवाला सीट से पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने शानदार जीत दर्ज की।

२- कोटद्वार सीट से अप्रत्याशित रूप से मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी चुनाव हार गये।





क्या यही है अन्ना इफेक्ट ?



(अच्छा ही है कि यह लोग ज्यादा जगहों पर नहीं गये लोगों को जागरूक करने)... :)





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शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

क्या यह साफ-सीधी बात समझने के लिये भी आपको 'जनमत संग्रह' की जरूरत है 'टीम अन्ना' ?

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एक बैनर-पोस्टर-टोपी-टीशर्ट-मोमबत्ती-एसएमएस-फेसबुक वॉल पोस्ट-मिस्ड कॉल आधारित आंदोलन,  तिरंगा लहराती व भजनों पर झूम-झूम नाचती खाई-पीयी-अघाई भीड़ जिसमें जन तंत्र का 'जन' गायब था व नीरा राडिया टेप मामले के सामने आने के बाद अपना मुँह छिपाते व साख को दोबारा हासिल करने को प्रयासरत मीडिया के कैमरो-माइक्रोफोनों व स्याही का अंधा, खुला व जरूरत से ज्यादा समर्थन... फिर क्या था रातोंरात बन गये चंद लोग इस महादेश के 'नागरिक समाज' के स्वयंभू प्रतिनिधि...

जनलोकपाल के मुद्दे पर अपने बनाये बिल पर बिना किसी संशोधन या सोच-विचार के भारतीय संसद की मोहर लगवाने में नाकामयाब रहने के बाद यह टीम किसी न किसी तरह चर्चा में बने रहना चाहती है ... इसिलिये कभी कभी अन्ना भ्रष्टों को चाँटा मारना ही एकमात्र उपलब्ध विकल्प बताने लगते हैं ... और आज टीम अन्ना ने एक विचित्र माँग रखी है जनसंग्रह आयोग बनाने की व ग्रामपंचायतों को संसद के ऊपर अधिकार देने की ...

टीम अन्ना को लगता है कि जो वह चाहते हैं वही देश की जनता भी चाहती है... और क्योंकि संसद उनसे सहमत नहीं इसलिये संसद को बाईपास कर अपने मन की करने के लिये इस महादेश के 'नागरिक समाज' की स्वयंभू प्रतिनिधि इस 'टीम' ने यह नया शगूफा छेड़ा है...

पर अपना आज का सवाल इस पर नहीं है...

मेरा सवाल तो सीधा सादा है...

अभी दिसंबर के महीने में मुंबई में तीन दिन का धरना व उसके बाद देशव्यापी जेलभरो अचानक बिना कुछ वजह बताये समेट दिया गया था क्योंकि मैदान में इज्जत बचाने लायक भीड़ भी नहीं जुट पायी थी...


पब्लिक अब आप लोगों की हकीकत जान आप लोगों से उब गयी है !

क्या यह साफ-सीधी बात समझने के लिये भी आपको जनमत संग्रह की जरूरत है टीम अन्ना ?









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बृहस्पतिवार, 29 दिसम्बर 2011

यह अचानक क्यों समेट लिये गये तम्बू-कनात... और लपेट लीं गई दरियाँ भी ?

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अपने इलेक्ट्रानिक मीडिया ने कमी तो नहीं छोड़ी थी कहीं से भी, किसी चैनल ने लगाये थे पचास कैमरे और पचास रिपोर्टर और किसी ने सौ कैमरे और पचास रिपोर्टर... हर पल की खबर भी दी जा रही थी... अन्ना को लगा जुकाम पूरे देश की चिन्ता बनता जा रहा था... चैनलों के क्रीपर दिखा रहे थे... अन्ना का पल्स रेट ७२ प्रति मिनट, ब्लड प्रेशर १५६/९० व तापमान १०० डिग्री फैरनहाइट... तीन दिन के अनशन के बाद सोनिया गाँधी के दरवाजे पर धरना देने की घोषणा भी की गयी थी... जेल भरो भी चलने वाला था...




पर अचानक ही समेट लिया गया सब कुछ... तम्बू, कनात व दरियाँ भी... बिना कुछ ठोस वजह बताये...




कुछ समझ सकें हों, तो आप ही बताइये कि क्यों किया गया ऐसा ?



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रविवार, 11 दिसम्बर 2011

'हिन्दी ब्लागिंग', बोले तो- निट्ठल्ले लोगों का आत्मालाप... समाज के दोयम दर्जा प्राप्त लोगों का प्रलाप ???

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सच कहूँ तो ब्लॉगवुड में एकदम खरी-खरी लिखने में अरविन्द मिश्र जी का कोई सानी नहीं... आदरणीय ज्ञानदत्त पान्डेय जी की इस पोस्ट पर लिखी गई उनकी इस टिप्पणी को देखिये जरा...


" हिन्दी ब्लागिंग दरअसल निट्ठल्ले लोगों का आत्मालाप है ..समाज के दोयम दर्जा प्राप्त लोगों का प्रलाप -काम काज के लोग कब का ब्लागिंग छोड़ चुके -कुछ तो काल के बियाबान में खो गए कुछ बेहया यहाँ दिख कर भी अब लिखते नहीं …एक अपरिपक्व पाठक वर्ग के लिए क्यों बहुमूल्य समय जाया किया जाये …"

एक निर्मम आकलन है यह, खास तौर से एक ऐसे ब्लॉगर की ओर से जो स्वयं  हिन्दी ब्लॉगिंग के एक बड़े नाम हैं और पाँच ब्लॉगों से सक्रिय तौर पर जुड़े हैं... और सबसे बड़ी बात यह भी है कि कुछ हद तक हकीकतबयानी भी है यह आकलन...


आज का अपना सवाल इसी बात पर है...




जो न निठल्ला है और न ही समाज से दोयम दर्जा प्राप्त... क्या उसके लिये नहीं है हिन्दी ब्लॉगिंग... और यह 'परिपक्व पाठक' कैसे और कब तक मिलेगा हिन्दी ब्लॉगिंग को ... :))




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शुक्रवार, 2 दिसम्बर 2011

FDI और लोकपाल मुद्दों के बीच में भुला दी गईं हमारी महिलायें... :(

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सच कहूँ तो मैं भारतीय संसद में महिलाओं के लिये तैंतीस फीसदी सीटें आरक्षित करने के कदम का कभी भी समर्थक नहीं रहा...


मैंने
यहाँ पर
और, एक बार फिर से
यहाँ पर भी...

इस कदम के विरोध में लिखा भी...

पर आज अचानक मैंने नोटिस किया कि...

संसद का शीतकालीन सत्र जारी है...

मल्टी ब्रान्ड खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर हंगामा बरपा हुआ है आजकल... जैसे तैसे यह मसला निपटेगा तो फिर लोकपाल-जोकपाल की नोंकझोंक शुरू हो जायेगी... और भी बहुत से मुद्दे हैं जो संसद की बहसों व हंगामों की वजह बनेंगे... पर यह तो बहुत ही आश्चर्यजनक है कि 'महिला आरक्षण बिल' की कोई भी बात तक नहीं कर रहा...



क्या यह मान लिया जाये कि महिला आरक्षण बिल को हमेशा-हमेशा के लिये दफन कर दिया गया है ? 

अगर ऐसा हुआ है तो सही हुआ या गलत,
क्या ख्याल है आपका ?





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शुक्रवार, 18 नवम्बर 2011

देश के हित में है उत्तर प्रदेश के चार हिस्से होना ! आप क्या कहते हैं ?

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 यद्मपि हर कोई अपनी अपनी समझ व सुविधा से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी के उत्तर प्रदेश का विभाजन कर उसके चार प्रदेश बनाने के प्रस्ताव के निहितार्थ तलाश-निकाल रहा है... फिर भी यह निश्वित रूप से एक दूरगामी व सकारात्मक सोच के साथ लिया गया फैसला है...


क्या यह सही नहीं है कि किसी भी प्रशासनिक इकाई का आकार थोड़ा छोटा ही होना चाहिये, जिससे कि सभी पर नियंत्रण व सभी का ख्याल रखा जा सके... चार अलग अलग प्रदेश होने से वहाँ का राजनीतिक नेतृत्व भी स्थानीय ही होगा जो स्थानीय समस्याओं, आकाँक्षाओं व जरूरतों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होगा... विकास की बयार पूरे के पूरे इलाके में एक ही रफ्तार से बहेगी... असमान विकास काफी हद तक रूक पायेगा... कुछ नये शहर, नई राजधानियाँ, नये संस्थान वजूद में आयेंगे... फायदे देखा जाये तो अनेकों हैं... और नुकसान एक भी नहीं...

आज का अपना सवाल है :-


"उत्तर प्रदेश का प्रस्तावित विभाजन निश्चित रूप से एक दूरगामी व सकारात्मक सोच के साथ लिया गया फैसला है" 
आप इस पर क्या कहते हैं ?










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